लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #53 (17 मई,, 2020) - Hindi

"ईंटों की संख्या से बिल्डिंग की मजबूती नहीं आती है। ईटों की मजबूती से बिल्डिंग की मजबूती आती है। इसी प्रकार, हर एक व्यक्ति की मजबूती से शांति स्थापित हो सकती है।" —प्रेम रावत

प्रेम रावत:

We came here to talk about peace.

पीस, शांति कोई किसी देश, किसी कल्चर, किसी धर्म की exclusive नहीं है। ये सारे विश्व को चाहिए। इसकी जरूरत सारे विश्व को है। शांति के बारे में अगर बात करें तो दो-तीन प्रश्न पहले उठते हैं। एक, तो यह कि शांति के बारे में तो बहुत समय से सुनते आ रहे हैं। मतलब, मैं दो साल, तीन साल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं हजारों सालों की। हजारों सालों की! और अगर शांति की परिभाषा आगे रखी जाए तो ये तो सबको चाहिए! किसी भी धर्म का हो, कोई भी हो, सबको यह बात पसंद है कि शांति होनी चाहिए। 

प्रश्न ये उठता है कि ‘‘हो क्यों नहीं रही है ?’’ बजाय इसके कि हम शांति के और करीब जाएं, हम शांति से और दूर जा रहे हैं। लड़ाइयां हो रही हैं और सभी लोग बैठे-बैठे तमाशा देख रहे हैं, क्या हो रहा है ? बड़े-बड़े भाषण होते हैं शांति के ऊपर, पर शांति का कहीं नामो-निशान ही नहीं है। क्यों ? क्यों ? आखिर शांति है क्या ? अगर लड़ाइयां बंद हो जाएं तो शांति हो जाएगी ? तो समय तो ऐसा पहले भी रहा है, जब लड़ाइयां नहीं हो रही थीं। तो जब लड़ाइयां नहीं हो रही थीं, तो शांति थी ? अगर शांति थी, तो फिर लड़ाइयां क्यों चालू हो गईं दुबारा ? शांति तो लड़ाइयों को जन्म दे नहीं सकती! तो शांति है क्या ? 

हम सबके दिमाग में एक विचार है और वो विचार है — यूटोपिया का। अब आप समझते हैं यूटोपिया ? एक ऐसा हमने दृश्य बना रखा है अपने दिमाग में कि ऐसा समय आएगा, कुछ ऐसा होगा कि न ज्यादा गर्मी होगी, न ज्यादा ठंडी होगी। न कोई भूखा होगा, न कोई प्यासा होगा। न कोई चोर होगा, न कोई चोरी होगी। सब लोग, जितने दुनिया के लोग हैं, सब आपस में मिलजुल के रहेंगे। 

पर यूटोपिया की परिभाषा क्या है ? यूटोपिया का मतलब क्या है ? असली मतलब क्या है यूटोपिया का ? क्या आप जानते हैं ? 

यूटोपिया का असली मतलब है — ये ग्रीक से हुआ। और जो उसके दो पहले शब्द हैं, उनका मतलब है — नॉट! नहीं! नहीं! और टोपिया आया — टोपोग्राफी से! टोपोग्राफी का मतलब हुआ — कोई जगह! तो जिसने इस शब्द को coin किया, phrase किया, उसका ये कहना है कि कोई ऐसी जगह नहीं है और हम उसी चित्र को लेकर के बैठ गए। अगर हम देखें कि हो क्या रहा है ? दूर से देखेंगे — एक दूसरा दृश्य नजर आएगा। नजदीक से देखेंगे — एक दूसरा दृश्य नजर आएगा। नजदीक से देखेंगे, आपको कौन लड़ता हुआ मिलेगा ? दूर से देखेंगे तो हो सकता है, सिर्फ धुआं दिखाई दे! लड़ाई का धुआं दिखाई दे। नजदीक से देखेंगे तो आप देखेंगे कि लोग लड़ रहे हैं। लोग लड़ रहे हैं। धुआं लड़ाई नहीं पैदा करता, घर लड़ाई नहीं पैदा करते, लोग लड़ाई पैदा करते हैं। और लोगों को चाहिए शांति! अगर कहीं परिवर्तन आना है तो लोगों में आना है। 

अब मैं आपको दूसरी दिशा में ले जाता हूं। आपने microscope का नाम तो सुना होगा। Magnifying glass का नाम सुना होगा। उससे हम नजदीक से देख सकते हैं, उस चीज को बड़े रूप में देख सकते हैं नजदीक से और मालूम कर सकते हैं कि ये असली में क्या है ? तो कहां ले जा रहा हूं मैं आपको कि — 

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हांसी। 

आतमज्ञान — सेल्फ नॉलेज! Without knowing yourself! 

आतमज्ञान बिना नर भटके — सॉक्रटीज़ भी कहता है क्या ? ‘‘know thyself’’ यहां भी कहा जा रहा है — 

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी। 

कहीं भी चले जाओ। 

मृग नाभि में है कस्तूरी, बन बन फिरै उदासी।। 

मोहे सुन सुन आवे हांसी।। 

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।। 

सुना ? हां! 

जानते हो क्या है ? 

हां! हमारे अंदर है। और फिर लड़ाई-झगड़े के लिए चल दिए। फिर लड़ाई-झगड़े के लिए चल दिए! फिर झगड़ा हो रहा है। झगड़ा कहां हो रहा है ? बाहर से, बाहर झगड़ा तो बाद में होता है भाई! झगड़ा पहले तुम्हारे अंदर हो रहा है। तो समझने की बात है कि वो शांति, शांति का स्रोत भी हमारे अंदर है। 

हृदय के बारे में तो आपने सुना होगा, पर हृदय होता क्या है ? जो भी आपमें अच्छाई है, आप जानते हैं कि आपमें क्या-क्या चीज अच्छी नहीं हैं। आप जानते हैं कि आपमें क्रोध है। क्रोध बाहर से नहीं आता है। क्रोध आपके अंदर से आता है और जहां आप जाते हैं, आपका क्रोध आपके साथ जाता है। आपका संशय भी आपके साथ जाता है। परंतु जैसे सिक्के का एक side नहीं हो सकता। एक तरफ अंधेरा है तो दूसरी तरफ उजाला है। एक तरफ अगर doubt है तो दूसरी तरफ clarity है। एक तरफ अगर anger है तो दूसरी तरफ compassion है। इन सारे attributes को आप जानते हैं ये आपके अंदर है। जब आपको कहीं गुस्सा होना पड़ता है तो ये थोड़े ही है कि वो एस.एम.एस. के रूप में आपके फोन में आता है ? नहीं! वो तो आपके अंदर है! कहींभी। पर क्या आप जानते हैं कि उसके दूसरी तरफ क्या है ? उस गुस्से के दूसरी तरफ compassion है। पर हम अपने जीवन में इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते हैं। 

है घट में पर दूर बतावें — हा, हा! 

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निराशी। 

इसीलिए सारा संसार निराश होता है — दूर की बात निराशी।। 

कहे कबीर — गुरु के बिना — 

कहे कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।।

तो शुरू से अगर लिया जाए इसको तो कहा जा रहा है कि जिस चीज की हमको तलाश है, वो हमारे अंदर है। पर आज मनुष्य के ऊपर focus नहीं है, सोसाइटी के ऊपर focus है। सोसाइटी को बदलना चाहिए। सोसाइटी की वजह से गड़बड़ हो रही है। सोसाइटी की वजह से ये हो रहा है। गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए, गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए। गवर्नमेंट्स को बदलना चाहिए। लीडर्स को बदलना चाहिए। पर लीडर हैं कौन ? वो भी मनुष्य हैं। सोसाइटी के सदस्य हैं कौन ? वो भी मनुष्य हैं। तो बात सोसाइटी की हो रही है, मनुष्य की नहीं हो रही है। change गवर्नमेंट की हो रही है, मनुष्य की नहीं हो रही है। मनुष्य को बदलने में कोई interested ही नहीं है।

देखिए! लगभग दो हजार कुछ साल पहले इस भारतवर्ष पर एक लड़ाई हुई थी, जिस लड़ाई का नाम था महाभारत! हुई थी, नहीं हुई थी, पर उसका वर्णन जरूर है। और क्या हुआ था उस लड़ाई के अंदर ? क्या हुआ था उस लड़ाई के अंदर ? किस बारे में थी वो लड़ाई ? कहां —हजारों कहानियां हैं — किस बारे में थी! छोड़िए कहानियों को। पर मूल में क्या है ? क्या चीज थी ? जब मनुष्य के — मनुष्य, मनुष्य के विपरीत हो गया तो वो लड़ाई हुई। जब मनुष्य, मनुष्य के विपरीत हो गया, तब वो लड़ाई हुई। कारण बड़े बन गए, खून बहना कम हो गया। खून का महत्व कम हो गया, मनुष्यों की जिंदगी का महत्व कम हो गया और जो कारण थे, उनका महत्व ज्यादा हो गया। दो हजार कुछ साल पहले। 

और आज ? मनुष्य का महत्व कम हो गया, खून का महत्व कम हो गया — बिल्कुल वही हाल है। और कारणों का महत्व ज्यादा हो गया। और महाभारत हो रही है। पर सबसे बड़ी महाभारत होती कहां है ? 

सबसे बड़ी महाभारत बाहर नहीं होती है, वो तो सिर्फ 18 दिन की लड़ाई थी। वो तो थी जो लड़ाई, वो अलग बात है, परंतु यहां ये लड़ाई होती है — पच्चीस हजार, पांच सौ पचास दिन। अगर आपकी उम्र 70 साल की — 70 साल आप जीएंगे तो उसका calculate कर लीजिए! कितने दिन आपको जीना है! ये लड़ाई चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है, चलती रहती है और बहुत खूंखार रूप ले लेती है। 

तो मेरा कहने का मतलब यह है सार में कि अगर किसी भी चीज को बदलना है तो, उसके लिए आपको मनुष्य को भी देखना पड़ेगा। ईंटों की संख्या से बिल्डिंग की मजबूती नहीं आती है। ईटों की मजबूती से बिल्डिंग की मजबूती आती है। संख्या से नहीं। इसी प्रकार — in the same way — हर एक व्यक्ति की मजबूती से शांति स्थापित हो सकती है। जो बिल्डिंग हम लोग, सभी लोग, इस दुनिया के सभी लोग, जो बिल्डिंग बनाना चाहते हैं, उसकी मजबूती depend करेगी हर एक individual पर, हर एक व्यक्ति पर, जो उस बिल्डिंग की ईंट होगी, जो उस बिल्डिंग की बुनियाद होगी। न कि उस बिल्डिंग की ऊंचाई होगी। कितना भी उसको ऊंचा बनाना है, पर ईंट को उतना ही मजबूत होना चाहिए। ये मेरा कहना है। 

मेरी कोई philosophy नहीं है। मैं मनुष्य हूं। मुझे भी अपने जीवन के अंदर शांति की जरूरत है। जैसे आपको जरूरत है, मेरे को भी जरूरत है। मैं वो मृग नहीं बनना चाहता, जो जंगलों में भागता रहता है और जो चीज उसके अंदर है, वही उसको मालूम नहीं है। क्योंकि जिस चीज की मेरे को तलाश है, उसी चीज की आपको भी तलाश है। जिस चीज को मेरा हृदय चाहता है, उसी चीज को आपका हृदय चाहता है। हृदय वो जगह है, जहां मेरी अच्छाई बसती है। हृदय वो जगह है, जहां मेरी वो कस्तूरी बसती है। हृदय वो चीज है, जहां मेरे जीवन के अंदर प्रकाश बसता है, अंधेरा नहीं। जहां ज्ञान बसता है, अज्ञान नहीं। जहां करुणा बसती है, खौफ नहीं। उस जगह को मैं हृदय कहता हूं। वह सबके अंदर है। 

देखिए! आपकी आंख हैं। इन आंखों से आप सबकी आंखें देख सकते हैं, पर अपनी आंख नहीं देख सकते हैं। उसके लिए आपको आईने की जरूरत है। अपनी आंखें देखने के लिए आपको आइने की जरूरत है, दूसरे लोगों की आंखें देखने के लिए आपको आइने की जरूरत नहीं है। 

तो समझने की बात है कि अगर मैं अपने आपको देख सकूं तो मुझे क्या दिखाई देगा उस आईने में ? मेरी अच्छाई ? अरे! कम से कम अगर दोनों चीजें दिखाई दे जाएं मेरे को कि मेरी अच्छाई भी है, मेरे में बुराई भी है। तो मैं कम से कम चूज़ तो कर सकता हूं अपनी अच्छाई ? पर जब मेरे को मालूम ही नहीं है कि वो क्या है — अगर — अब मैं आखिरी बात कहूंगा कि अगर इस दुनिया के अंदर कोई hope है, आशा है — क्योंकि कई लोग यहां बैठे हुए हैं और मैं अच्छी तरीके से जानता हूं कि वो ये कहेंगे कि शांति कभी हो ही नहीं सकती। 

क्योंकि कई लोग मेरे से ये कहते हैं। ‘‘हो नहीं सकती, हो नहीं सकती!’’ 

आखिरी बात मैं ये कहना चाहूंगा कि यहां ऊपर आने से पहले हम लोगों ने — जो यहां पैनल बैठी है, उन्होंने ये दीया जलाया। आपने देखा होगा। जलाया। आपने कुछ ध्यान दिया, कैसे हुआ ये ? क्योंकि जब हम आए दीये के पास तो सारी जो बत्तियां हैं, वो बुझी हुई थीं। और दीप जलाने का ये मौका था। 

तो हुआ क्या ? 

तो ये एक मोमबत्ती लाए, जो जल रही थी। समझ रहे हैं, अब मैं कहां जा रहा हूं इसको लेकर कि एक जलती हुई मोमबत्ती में एक शक्ति है और उस मोमबत्ती में ये शक्ति है कि वो बुझी हुई बत्ती को जला सकती है। ये कानून प्रकृति का कानून है! और ये कानून हम सबको आशा देता है कि जलती हुई मोमबत्ती बुझी हुई मोमबत्ती को जला सकती है। बुझी हुई मोमबत्ती जलती हुई मोमबत्ती को बुझा नहीं सकती। कोशिश भी करेगी तो जलने लगेगी। नजदीक भी आएगी तो जलने लगेगी। क्योंकि ये कानून है और ये कानून कायम है। ये कानून आज भी कायम है। ये सब हम लोगों को आशा देता है कि जो बदलाव हम लाना चाहते हैं, जिस अंधेरे में हम प्रकाश लाना चाहते हैं, ये हो सकता है क्योंकि ये कानून है। अगर हम लोगों को उस मोमबत्ती की तरह जलाना शुरू करें तो एक मोमबत्ती बताइए, कितनी मोमबत्तियों को जला सकती है ? एक-एक का रेसियो नहीं है। एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी, चौथी के बाद — अब यहां कितनी बत्तियां हैं ? एक, दो, तीन, चार, पांच! एक ही मोमबत्ती ने पांचों को जला दिया। 

तो ये एक चीज है। इसे हम लोग समझें। इसको लेकर के आगे बढ़ें तो सचमुच में हम अपने जीवन के अंदर इस शांति को स्थापित कर सकते हैं। मैं ये मानता हूं। क्योंकि लोग चाहते हैं इस शांति को। ये ऐसी बात नहीं है कि ये फॉरेन आइडिया है। अगर हम ऊपर देखना बंद करें और अपनी तरफ देखना शुरू करें तो बहुत-कुछ परिवर्तन आ सकता है। जब मैंने ये prisons में देखा हुआ है, जब जेलों में देखा हुआ है, soldiers में देखा हुआ है, veterans में देखा हुआ है, hospice में देखा हुआ है, hospitals में देखा हुआ है — हर एक वर्ग में। Libraries में देखा हुआ है, schools में देखा हुआ है, universities में देखा हुआ है। तो लोग अपनी तरफ देखना शुरू करते हैं, बजाय ऊपर के। क्योंकि हर एक चीज ऊपर, ऊपर, ऊपर। ऊपर से आएगी। ऊपर से आएगी। ऊपर से नहीं आ रही है। नहीं आ रही है।

कितनी देर इंतजार करोगे ? आप बस का इंतजार करोगे। कितनी देर करोगे बस का इंतजार ? हैं जी ? आप कितनी देर करते हैं बस का इंतजार ? एक साल ? अगर आप बस अड्डे पर खड़े हुए हैं, बस नहीं आई तो एक साल इंतजार करेंगे ? चलिए, दो साल खड़े रहेंगे वहीं ? तीन साल ? चार साल ? पांच साल ? या मैं उल्टी तरफ जा रहा हूं ? 15 मिनट, 20 मिनट ? 20 मिनट में तो उतावले हो ही जाएंगे आप! आधा घंटा ? पैंतालिस मिनट ? और मनुष्य कितनी साल से इंतजार कर रहा है कि कोई आएगा, फिर सबकुछ बदलेगा। 

जब बदलने की शक्ति हम सबको मिली हुई है! और बदलना क्या है ? बदलना क्या है ? बदलना कुछ नहीं है! जो अच्छाई है, उसको उभरना है। कहां से चालू होगा ये ? आप अपने घर से चालू कीजिए। आप अपने परिवार से चालू कीजिए। आपको बाहर जाकर भाषण देने की जरूरत नहीं है, अपने घर से चालू कर लीजिए। वहां सबेरे-सबेरे जब आप उठते हैं, आपका बेटा या आपकी बेटी, जो सबेरे-सबेरे आपको देखने के लिए मिलती है तो क्या कहते हैं उनको ? 

‘‘तू लेट हो गई! तू लेट हो गई! जल्दी तैयार हो, तेरी बस आ गई है!’’ 

ये कोई मिलने का तरीका है ? कितने दोस्त बचेंगे आपके, अगर इस तरीके से मिलने लगे, ‘‘तू लेट हो गया! तू लेट हो गया!’’ 

दुनिया को तो गुड-मॉर्निंग कहने के लिए तैयार हैं और जिनसे प्रेम करते हैं, उनका नाम ही नहीं है। ऐसी हालत में क्या बदला जाएगा ? धीरे-धीरे ये सारी चीजें — यूटोपिया नहीं, असली शांति की बात कर रहा हूं मैं, तब स्थापित होगी। जब हम इस चीज को समझेंगे कि एक जलती हुई मोमबत्ती, एक बुझी हुई बत्ती को जला सकती है।