लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #33 (25 अप्रैल, 2020) - Hindi

"अभिमानी का मतलब आप अपने आपको बढ़े-चढ़े महसूस करते हैं, जो सत्य नहीं होता है। स्वाभिमान हुआ आपकी यह ताकत कि आप अपने पैरों पर खड़े हो सकें और किसी परनिर्भर नहीं होना पड़े।" —प्रेम रावत (25 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज का दिन फिर प्रश्नों और उत्तरों का दिन है। तो आप लोगों ने प्रश्न भेजे हैं। कई बार मैं प्रश्न पढ़ता हूं फिर उनका उत्तर एक साथ ही दे देता हूं तो आप जब सुन रहे हैं तो हो सकता है कि आपका उत्तर उसी में हो जाए। पर कुछ ऐसे सवाल हैं जैसे यह है और यह आदित्य नारायण दुबे ने लिखा है, वेस्ट बंगाल से —"प्रेम रावत जी! मैं अभी जिज्ञासु हूँ और मैं भी अपनी जिंदगी का आनंद लेना चाहता हूँ। मैं अपने अशांत और विचलित मन को शांति देना चाहता हूँ। कृपया मेरी मदद करें।"

देखिए! (आपकी मदद करने के लिए ही तो हैं हम यहां मदद करेंगे जरूर करेंगे) — पर बात है समझने की क्योंकि जब हम किसी चीज को अच्छी तरीके से समझते नहीं हैं क्या होना है तो बहुत उल्टा-सीधा हो जाता है। अब मैं आपको उदाहरण देता हूं कि आप रोटी बनाना चाहते हैं, फुल्का और मैंने कई बार कहा है कि "मेरे को रोटी बनानी नहीं आती है" तो अभी मैं Rucsio में गया था तो वहां खाना बनाने वाला कोई नहीं था तो मेरे को ही खाना बनाना पड़ा तो मैंने बनाया, पर हिन्दुस्तानी खाना बनाया और मैंने फुल्का पहले कभी नहीं बनाया था पर इस बार परांठा जरूर बनाया। तो उसका एक तरीका है मतलब, पहले आटा लिया और आटे में पानी डाला, उसको गूँधा। अगर मैं आटे को तवे पर डाल दूं बिना गूंधे और तवे को गरम करूं और तवे से फिर आटा निकालूं, फिर उसमें पानी डालूं, फिर उसमें घी डालूं, फिर उसमें नमक डालूं और फिर उसको कोशिश करूं कि यह परांठा बन जाए तो परांठा तो नहीं बनेगा। उसका एक नियम है और उस नियम का अगर पालन किया जाए तब जाकर वह परांठा बनाएगा। ठीक इसी प्रकार से अगर आप भात बनाना चाहते हैं, तो चावल को धोइये, धोने के बाद उसको डालिए, फिर उसमें पानी डालिए फिर जब उसमें उबाला जाये फिर उसकी आंच धीमी करके उसको पकने दीजिये।

परंतु अगर आप उल्टा करें मतलब, पतीले को पहले गर्म कर लिया, फिर उसको थोड़ा नीचे कर लिया, फिर उसमें पानी डाला, फिर उसमें चावल डाल दिए, फिर उसको निकाल दिया, तो वह चावल कच्चे ही रहेंगे, पकेंगे नहीं। उसका भी एक नियम है, हर एक चीज का एक नियम है। अपने आप को समझने का एक नियम है, शांति का नियम है तो अगर आप अपने हृदय में अगर शांति का अनुभव करना चाहते हैं (तो जरा ध्यान दीजिए विशेष रूप से मैंने क्या कहा अभी) आप अपने हृदय में अगर शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो आपको वह शांति का अनुभव हो सकता है। आप कहते हैं कि "मैं अपने अशांत और विचलित मन को शांति देना चाहता हूं।" मन आपकी शांति को समझेगा नहीं जिस शांति की मैं बात कर रहा हूं उसको वह समझेगा नहीं। मन के लिए, जहां मन की बात है मन — वह जो आपका यह प्रिंटर है, प्रिंटर, यह फोटो बना रहता है आपके लिए, आपके लिए कहता रहता है "यह ऐसा करो, यह ऐसा करो, वहां जाओ, ऐसा करो”, दुनिया भर में भगाता रहता है —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

इसमें सब के सब आ गए। और मन तो घूमता रहता है, घूमता रहता है, कभी यहां जाओ, कभी वहां जाओ, कभी यह करो, कभी वह करो और अच्छे-अच्छों को, अच्छे-अच्छों को पकड़ता है। बात ही मन की है तो मन का क्या स्वभाव है ? मन के क्या नियम हैं ? मन आपको कहेगा कि आपको क्या चाहिए! आप मन से नहीं कह सकते कि आपको यह चाहिए। मन आपसे कहेगा कि यह आपको चाहिए। इस बात का आप ख्याल रखिये। मन कहेगा कि "तुमको यह पेन चाहिए, तुमको यह पेन चाहिए, मन कहेगा कि तुमको यह फिल्म देखनी है" मन कहेगा, तुम नहीं कहोगे। मन कहेगा और मन इन्हीं चीजों में भागता रहता है कि "मेरे को यह करना है, मेरे को वह करना है, मेरे को उससे यह कहना है, मेरे को उससे यह कहना है — झंझट।" और दूसरी चीज, मन के जो रास्ते हैं वह अधिकांश रूप में आपको अशांति लाते हैं, आपको दुखी करते हैं तो जब वह पेन जिसके लिए मन ने कहा "तेरे को यह पेन चाहिए" जब आपको वह पेन नहीं मिलेगा तो आप दुखी होंगे, आप परेशान होंगे। दुनिया के साथ यही होता है।

दुनिया में कोई लड़का है, वह लड़की से प्यार करना चाहता है, लड़की है, लड़के से प्यार करना चाहती है। मन ने कहा "हां यह तेरे लिए ठीक रहेगा, यह ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा करो!" जब वह बात बनती नहीं है तो फिर बहुत गड़बड़ होती है। दुःख होता है, दर्द होता है। ऐसे ही मन घूमता रहता है मतलब, मन का काम है उसका चरित्र है "घूमना।" जैसे भजन में कहा कि —

पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवे हासी जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी। सो मन तिरलोक भयो सब

तीनों लोकों में घूमता रहता है। तीनों लोकों में घूमता रहता है। स्वर्गलोक आपको नहीं लगती है बात कि "स्वर्ग जाना है, स्वर्ग अच्छा होगा, स्वर्ग ऐसा होगा, स्वर्ग ऐसा होगा" — तीनों लोकों में भागता रहता है। पृथ्वीलोक में तो भागता ही है और पाताललोक में भी भागता है — "वहां का यह धन मिल जाए, वहां का यह सोना है, वहां का यह रखा हुआ है, वहां का यह रखा हुआ है, वहां से यह कर लेंगें, वहां से यह कर लेंगें!" परन्तु मन की एक और चीज है उसका एक और नियम है वह क्या है ? जब भी कोई चीज उसको मिल जाती है तो वह उससे तृप्त नहीं रहता है उससे फिर ऊब जाता है और आपको फिर प्रेरणा करता है कि आप किसी दूसरी चीज को ढूंढो। तो मन के लिए ऐसी कोई चीज नहीं है कि उसको कोई चीज मिल गई तो उसके लिए उतना ही अच्छा है, उतना ही ठीक है।

ना! उसके बाद वह फिर दूसरी चीज को खोजेगा, फिर तीसरी चीज को खोजेगा, फिर पांचवी चीज को खोजेगा। अगर आपको विश्वास नहीं है तो आप अपने जूतों को देख लीजिये। "नहीं! मेरे को ऐसे जूते चाहिए! फिर उनसे जब मन ऊब जाता है तो फिर दूसरे जूते चाहिए, ऐसे जूते चाहिए, मैंने यह देखा।" चश्मे देख लीजिये लोगों के पास — "धूप के चश्मे, कभी यह खरीदते हैं, कभी वह खरीदते हैं, कभी यहां जा रहे हैं, कभी यहां जा रहे हैं" तो यह मन का जो चरित्र है वह इस प्रकार है यह उसका कानून है कि उसको एक जगह कहीं टिकना नहीं है। घूमता रहता है, घूमता रहता है, भ्रमण करता रहता है, भ्रमण करता रहता है और उसका भ्रमण करना ही, मन का भ्रमण करना ही भ्रमित होना है। आदमी कहता है फिर मेरे को यह क्यों नहीं मिल रहा है, मेरे को वह क्यों नहीं मिल रहा है, मेरे को यह क्यों नहीं संभव हुआ, यह क्यों नहीं संभव हुआ। फिर —

सो परत्र दुख पावहि सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।

जब उनके प्लान — प्लान बन गया, प्रिंटर ने बनाई फोटो और मन ने कहा "हां! ऐसी फोटो चाहिए तेरे को” और फिर उसके पीछे लग गया और जब वह फोटो साक्षात् नहीं हुई, उस फोटो का साक्षात्कार नहीं हुआ तो फिर दुख आता है और फिर आदमी पछताता है कि मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा है ? क्या नहीं हो रहा है वह फोटो जो बनाई हुई है वह साक्षात्कार उसका क्यों नहीं हो रहा है ?

यह समझने की बात है। तो जिस शांति की बात आप कर रहे हैं उसका अनुभव आपके हृदय में होगा, क्योंकि हृदय का स्वभाव, हृदय का नियम बिल्कुल मन से अलग है, मन से अलग है। हृदय संतुष्ट होता है, हृदय भ्रमण नहीं कर रहा है, वह तीनों लोकों में नहीं जा रहा है। वह एक जगह है। उसको मालूम है कि वह एक जगह कौन-सी है जो उसको अच्छी लगती है। वह एक जगह है वही जगह जहां वह वह शक्ति जो आपको यह जीवन दे रही है, जहां इस स्वांस का आना-जाना हो रहा है वहां हृदय की लगन है और शांति भी वहीं है।

तो सोचिये और मैंने जो कहा है इसके बारे में सोचिये। शांति आपको चाहिए, वह आपको मिल जायेगी, वह आपको मिल जायेगी। पर वह हृदय में मिलेगी। मन इसके पीछे जितना आप लगेंगे इसको जितना आप खाना खिलाएंगे यह उतना ही दूर भागेगा आपसे। इसको खाना खिलाना थोड़ा कम कीजिए और कैसे होगा ? जब आप अपनी जिंदगी के अंदर उन छोटी-छोटी चीजों का आनंद लेने लगेंगे जो आपके सामने हैं और उससे फिर इस मन को इतनी दूर भागने की जरूरत नहीं पड़ती है।

मां-बाप हैं — मां-बाप अच्छा भी बोलते हैं, बुरा भी बोलते हैं और कई-कई नौजवानों के लिए तो जनरेशन गैप है। मां-बाप के सोचने का तरीका अलग है, बच्चे का सोचने का तरीका अलग है और दोनों की आपस में मिलती नहीं है। देखिये! अब यह किसी ने सवाल भी पूछा है कि "मेरी और मेरे पिता की, मेरी मां की और मेरे परिवार की हमसे मिलती नहीं है।"

देखो! मां-बाप का आदर करो। जब उनके पास जाओ, वह तुम्हारे दुश्मन नहीं है वह सिर्फ यह चाहते हैं कि कम से कम तुम उनकी बात सुनो, उनसे बहस मत करो उनकी बात सुनो। जैसे कोई जाता है बाहर कई लोग हैं हमने देखा कि कोई बंदर को खाना खिलाने के लिए जाता है, कोई कबूतरों को खाना खिलाने के लिए जाता है, तो ले जाता है हाथ में खाना और चचचचच....करके ऐसे खाना देता है। हमने देखा है जो गौ पालते हैं, भैंस पालते हैं तो कई बार भैंस को बुलाना हुआ तो चचचचच....ऐसे करते हैं तो हाथ में भैंस देखती है और आ जाती है, खा लेती है।

ठीक इसी प्रकार जब माँ-बाप से मिलने जाओ तो यह समझ कर जाओ कि सुनना है — सुनाना नहीं है, सुनना है। वह जो कहें सुनो उनकी बात। उनके पास एक्सपीरियंस है जो तुम्हारे पास नहीं है और एक्सपीरियंस की वैल्यू क्या है ? एक्सपीरियंस की वैल्यू बहुत ज्यादा है। जो तुम्हारे पास है, तुम्हारे पास हो सकता है कि नई-नई इन्फॉर्मेशन हो पर उनके पास एक्सपीरियंस है। यह नई जो इन्फॉर्मेशन है यह गलत हो सकती है पर एक्सपीरियंस जो है बहुत कम गलत होता है। यह मैं नहीं कह रहा कि गलत नहीं हो सकता है बहुत कम गलत होता है। पर चक्कर यह है कि मां-बाप तुम्हारा भला चाहते हैं, तुमसे प्यार करते हैं, तुम्हारा भला चाहते हैं, तुमसे दुश्मनी नहीं चाहते, परंतु अगर तुम उनकी बात नहीं सुनोगे तो वह गड़बड़ जरूर होगी। तो जब जाओ उनके पास तो उनकी बात सुनो। इसका यह मतलब नहीं है कि तुमको वह सारी चीजें करनी है जो वह कह रहे हैं। परन्तु कम से कम उनकी बात सुनो। भगवान ने दो कान दिए हैं — एक से सुनो, एक से बाहर। अगर वह भी अपनी रट में लगे हुए हैं क्योंकि माँ-बाप को भी समझना चाहिए कि बच्चे को पढ़ाया है, लिखाया है, खिलाया है, बड़ा हुआ है यह और जैसा उनके साथ हुआ था जब वह जवान हुए तो वह भी किसी की नहीं सुनते थे। यह आप भी कर रहे हो, इसीलिए यह हो रहा है।

इस बात को समझो यह परिवार में — मैं तो हमेशा कहता हूं कि आज यह जो देशों की समस्या है वह क्या समस्या है ? क्योंकि उनके लीडर जो हैं वह उनके जो नागरिक हैं उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। तो लीडर उनकी नहीं सुन रहे हैं, पति पत्नी की बात नहीं सुन रहा है — दो मिनट की बात है, दो मिनट की बात है। बस सुनना है, सुनना है, सुनाना नहीं है, सुनना है! सुनाने के लिए सब तैयार हैं, सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। सुनाना और सुनना ज्यादा अंतर नहीं है, सुनना और सुनाना, परन्तु दिन और रात का अंतर है और इसमें कितनी रिलेशनशिपस, इसने कितने संबंध तोड़ दिए हैं क्योंकि कोई चला गया सुनाने के लिए पर सुनने के लिए तैयार नहीं था। कम से कम इस लॉकडाउन में अगर आपको प्रैक्टिस करनी है तो आप सुनने की प्रैक्टिस कीजिए। सुनाने की नहीं, सुनने की प्रैक्टिस कीजिए। आपका सारा माहौल बदल जाएगा, आपका सारा माहौल बदल जाएगा।

परिवार क्या चाहता है ? इस दुनिया में परिवार की बात छोड़िए, इस दुनिया में सब यही चाहते हैं कि कोई उनकी दो बात सुन ले, कोई उनकी दो बात सुन ले। सुन लो! तुम्हारा क्या जाता है ? सुनाने की क्या बात है सुन लो! सुन लो! क्या कहेगा कोई या तुम उससे सहमत होगे या उससे सहमत नहीं होगे। तो वह बात जो वह तुमको सुनाने जा रहा है वह तो उसके दिमाग में पहले से ही थी और तुमको कोई फर्क़ नहीं पड़ा। अब अगर तुम सुन लोगे तो तुमको क्या फर्क़ पड़ जाएगा! एक कान से सुना, दूसरे कान से निकाल दिया। कोई बात नहीं। परन्तु यही छोटी-छोटी चीजें हम नहीं करते हैं एक दूसरे के लिए। लीडर नागरिकों की बात नहीं सुनते हैं, पति-पत्नी की बात नहीं सुन रहा है और पत्नी पति की बात नहीं सुन रही है और बच्चे मां-बाप की बात नहीं सुन रहे हैं और मां-बाप बच्चों की बात नहीं सुन रहे हैं। सुनो! थोड़ा-सा ध्यान दो! उससे बहुत कुछ परिवर्तन हो सकता है, उससे बहुत कुछ बदल सकता है तुम्हारे संसार के अंदर। तो इस पर जरा ध्यान दीजिए!

दूसरा है रोशनी रस्तोगी, बेगूसराय, बिहार से — "प्रेम रावत जी! स्वाभिमान और अभिमान में क्या अंतर है। हम यह कैसे मालूम करें कि हम स्वाभिमानी हैं या अभिमानी हैं ?"

अभिमानी इसका मतलब आप बढ़े-चढ़े अपने आपको महसूस करते हैं वह है अभिमान, जो सत्य नहीं होता है, जो सत्य नहीं होता है। स्वाभिमान हुआ आपकी यह ताकत कि आप अपने पैरों पर खड़े हो सकें यह अच्छी बात है कि आप अपने पैरों पर खड़े हो सकें और किसी के ऊपर आपको रीलाइ नहीं करना पड़े आपको किसी के ऊपर यह नहीं करना पड़े कि इनके बजाय — जबतक यह हैं तब तक मैं हूं, जबतक यह नहीं हैं तब फिर मैं भी नहीं हो सकता। ना ऐसा नहीं! स्वाभिमान मनुष्य के लिए जरूरी है पर अभिमान जो मन करता है कि "तू यह है, तैनें यह कर लिया, तैनें यह कर लिया, तैनें यह कर लिया, तैनें यह कर लिया, तैनें यह कर लिया!" याद रखना एक दिन आएगा, एक दिन आएगा कानों में डालेंगे रुई, नाक में डालेंगे रुई, अगर आँख बंद नहीं हैं तो आँख बंद कर देंगे और खाट पर नहीं रखेंगे, नीचे कर देंगे और काहे पर ले जाएंगे ? चार बांस की लकड़ियों पर ले जाएंगे और ऊपर चादर डालेंगे और सारे के सारे शरीर को गंगा में डालकर के आग के ऊपर चढ़ाकर के और आग लगा देंगे। यह सबके साथ होना, यह सबके साथ होना है। उस बात को मद्देनजर रखते हुए कितना अभिमान करना है उतना कर लो। क्योंकि एक दिन तुमको यहां नहीं रहना है, एक दिन तुम्हारे साथ ऐसा हाल किया जाएगा कि तुम सोच भी नहीं सकते हो। यह तुम्हारे साथ होना है। अब यह तुम पर निर्भर है। जो गलत अभिमान है, वह गलत अभिमान है।

मेरा प्रश्न है और यह लिखते हैं अमित कुमार, हरदोई, उत्तर प्रदेश से (अच्छे प्रश्न हैं) मेरा प्रश्न है कि — "सत्य क्यों मारा जाता है और असत्य हमेशा बलवान बनकर क्यों रह जाता है ?"

उल्टा! उल्टी बात है! सत्य कभी नहीं मारा जा सकता है। अगर सत्य मारा जा सकता तो बहुत पहले ही मर जाता। पर आज भी सत्य है और सत्य रहेगा, सत्य था, सत्य है, सत्य रहेगा! असत्य वह बलवान लगता है, पर है नहीं। असत्य बलवान लगता है, पर है नहीं। सत्य बलवान है और उसको बलवान लगने की कोई जरूरत नहीं है। पर सत्य, सत्य है और असत्य, सत्य को छुपाने की कोशिश करता है। पर सत्य, असत्य से छुप नहीं सकता। और वह सत्य ही आखिर में बाहर आता है, तो यही बात हुई।

अब भगवान राम के रामायण को देख लीजिए या महाभारत को देख लीजिए तो क्या हुआ ? अंत में सत्य जो था वही बाहर आया। हमारी जिंदगी के अंदर भी जिस दिन हमको यह समझ में आ जाता है कि हम कौन हैं। जिस दिन हम यह समझ पाते हैं कि हमारे अंदर क्या है तो यही होता है कि जो हमारा सत्य है वह जीत गया और जो असत्य है वह हार गया।

अपने आपको जानना और इस जिंदगी को सचेत बनकर रहना और इस हृदय को आभार से भरना यह सत्य है। यह सत्य है! और जब यह होगा तो कम से कम आपकी जिंदगी के अंदर जो असत्य है वह हार जाएगा और सत्य जीत जाएगा। इसी के लिए हम यह सबकुछ करते हैं जो कर रहे हैं।

मेरे को आशा है कि आप सब ठीक-ठाक रहेंगे, कुशल-मंगल रहेंगे और सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!