लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #25 (17 अप्रैल, 2020) - Hindi

"धर्म आप सीखते हैं, समझते हैं, पर जो भी आप करते हैं वह आपका कर्म है। धर्म करवाता नहीं है, कर्म आप करते हैं, और उस कर्म को वापिस नहीं लिया जा सकता।" —प्रेम रावत (17 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

मेरे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज का दिन है प्रश्नों का उत्तर देने का तो पहला प्रश्न है। साधना — जब कभी भी — उन्होंने पूछा है कि "जब कभी भी मनुष्य के ऊपर आपदा आती है तो मूर्खता भी उतनी ही तेजी से आती है क्या यह मन की वजह से होता है ?"

नहीं! देखिए, जब मनुष्य के ऊपर आफत आती है तो सबसे पहले आफत के कारण उसकी आंखें बंद होती हैं, उसके कान बंद होते हैं, आफत के कारण उसकी आंखें बंद होती हैं, आफत के कारण वह किसी की सुनना नहीं चाहता है, आफत के कारण वह किसी की, कुछ नहीं करना चाहता है और इसी वजह से मूर्खता भी आती है क्योंकि जब आंख ही बंद कर ली तब कहां जा रहे हैं क्या दिखाई देगा ? क्या पता है ? कुछ पता नहीं। तो मुझे यही आशा है कि आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिला होगा।

"मैं अपनी जिंदगी से हार चुका हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जहां भी मैं जाता हूं सब मुझे अपने काम के लिए इस्तेमाल करते हैं — प्रमोद।"

देखिए! आप किसी से भी लड़ सकते हैं। आप अपने भाई से लड़ सकते हैं और मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपनी बहन से लड़ सकते हैं, मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपने पिताजी से लड़ सकते हैं, मैं समझ सकता हूं क्यों। आप अपनी माताजी से लड़ सकते हैं, मैं समझ — मैं यह नहीं कह रहा कि लड़ना चाहिए, पर आप लड़ सकते हैं और मैं समझ सकता हूँ क्यों। पर आप अपनी ही जिंदगी से लड़ रहे हैं, यह मैं नहीं समझ सकता। यही तो है आपके पास और क्या है आपके पास ? अगर आपका जीवन ही नहीं रहा तो आपके पास क्या रहेगा, कुछ भी नहीं रहेगा। तो इससे मत हारिये। इससे नहीं लड़ना है। इस जिंदगी में तो जीत ही जीत करनी है, हारना नहीं है। जो लोग आपको इस्तेमाल कर रहे हैं वह आपका फायदा उठा रहे हैं। आप अपने लिए भी तो जीना सीखिए। औरों के लिए नहीं, अपने — जब आप अपने लिए ही जीना नहीं सीखेंगे तो फिर आप औरों के लिए कैसे जी पायेंगे ? जो दिया खुद ही नहीं जला हुआ है वह और दीयों को कैसे जलायेगा ? जो मोमबत्ती खुद ही नहीं जली हुई है, वह और मोमबत्तियों को कैसे जलायेगी ?

लोग कहते हैं कि औरों के लिए जीना चाहिए। पर एक बुझा हुआ दिया औरों के लिए कैसे जीएगा ? कैसे जी सकता है ? जबतक वह खुद ही नहीं प्रकाशित है, जबतक वह खुद ही नहीं जल रहा है तो वह और किसी दीये को कैसे जलाएगा ? मजबूती आप में होनी चाहिए। देखिये! उस मकान का क्या फायदा, जिस मकान की छत इतनी कमजोर है कि आप उसको — आप छत को उठा रहे हैं, तो वह कैसी छत हुई ? कम से कम आपके मकान को इतना तो मजबूत होना चाहिए कि कुछ भी आए, ऊपर से आये, साइड से आए, वह उसको थोड़ा-बहुत तो झेल सके। जब उसी में वह शक्ति नहीं है, तो वह आपका कैसा घर हुआ ? आपकी रक्षा कैसे करेगा ? तो सबसे बड़ी बात है कि आप अपने में, जो करेज़ (courage) होना चाहिए, जो मजबूती होनी चाहिए, वह लाएं। और जब वह होगी, तब लोग आपका फायदा नहीं उठाएंगे।

यह प्रश्न आया है — पुष्पा देवी, पीलीभीत उत्तर प्रदेश से, आप कहते हैं कि "मनुष्य जब परेशान होता है तब वह भगवान की याद करता है पर जब मैं परेशान होती हूँ तो मेरा भगवान पर विश्वास नहीं रह जाता है, ऐसा क्यों ?"

अच्छा! एक बात मैं आपसे कहना चाहता हूं। यह एक, बात तो बिल्कुल स्पष्ट है आपने पहले ही एक अपने मन में, अपनी बुद्धि में, अपने दिमाग में एक चित्र बना रखा है और उस चित्र में यह है कि "भगवान यह करेगा; भगवान आपकी यह करेगा; भगवान आपके लिए यह करेगा; भगवान आपके लिए यह करेगा" और आपको सिर्फ यह कहना है, हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो। हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो। हे भगवान जी! अब मेरे लिए यह कर दो!" आप भगवान की बात कर रहे हैं या नौकर की बात कर रहे हैं। आप कह रहे हैं कि "आपका विश्वास उठ जाता है भगवान से जब आप परेशान होते हैं" — आप नौकर की बात कर रहे हो या भगवान की बात कर रहे हो ? आप, अगर नौकर को आवाज दी जाए — किसी का नाम, किसी का नौकर है प्रकाश, "हे प्रकाश कहां है तू, कहां है, जल्दी आ!" नहीं आ रहा है वह, तो ठीक है आप उससे निराश हो जाइए। परंतु, जिस भगवान की आप बात कर रहे हैं वह आपका नौकर थोड़ी है। वह — आप परेशान हों या ना हों, वह आपको थोड़े ही परेशान कर रहा है।

आप समझते हैं कि भगवान का और कोई काम नहीं है सिर्फ आपको परेशान करने के। परेशान मैं बताऊं आपको कौन कर रहा है, आपको दुनिया परेशान नहीं कर रही है, आपको परेशान अगर कोई कर रहा है तो वह हैं "आप" — आप अपने आपको परेशान कर रहे हैं यह मैं आपसे कह रहा हूं क्योंकि यह मेरा अनुभव है। जब मैं परेशान होता हूं तो बड़ी साधारण-सी चीज है, "उसकी गलती है, उसकी गलती है, उसकी गलती है,उसकी गलती है।” मैं कितने ही, हजारों लोगों को जानता हूँ "यह उसने किया, यह उसने किया, यह उसने ठीक नहीं किया, यह उसने ठीक नहीं किया।" परन्तु यह सचमुच में जब मैं अपनी तरफ देखता हूं तो मेरे को यही एहसास होता है कि दरअसल में, सच्ची में मैं अपने आपको परेशान कर रहा हूं ये लोग परेशान नहीं कर रहे हैं, मैं अपने आपको परेशान कर रहा हूं और मेरे को इस परेशानी से अगर ऊपर उठना है तो मेरे को उठना है। यह नहीं है कि "इसको मेरे को ठीक करना है, इसको मेरे को ठीक करना है, इसको मेरे को ठीक करना!" वह ठीक हों या ना हों परेशान मैं खुद अपने आप को कर रहा हूं।

इसका यह मतलब नहीं कि मैं उसको छोड़ दूंगा, अगर उन्होंने कोई गलती की है तो मैं उनको कहूंगा कि “तुमने यह गलती की है, यह तुम्हारा ठीक — यह ठीक नहीं किया तुमने।” परन्तु जहां तक बात है भगवान की, कि आपका उनसे विश्वास उठ जाता है यह ठीक बात नहीं है। वही, सबको बनाने वाला ही एक ऐसा है जो विश्वसनीय है और सारा संसार आपको धोखा दे सकता है, परंतु वह जो आपके हृदय में विराजमान है वही है एक जो आपको कभी धोखा नहीं देगा।

"मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता है किसी तरह अगर अपने मन को कंट्रोल कर भी लूं तो 2 या 3 दिन से ज्यादा नहीं कर पाता हूं इसके लिए मैं क्या करूं ?" — देखिये — यह प्रकाश, मेडिकल छात्र हैं नेपाल से, उनका यह प्रश्न है! मन तो आपका लग रहा है पर कहीं और लग रहा है यह बात नहीं है कि आपका मन नहीं लग रहा है, मन तो आपका लग रहा है पर कहीं और लग रहा है और आप चाहते हैं कि वह पढ़ाई में लगे।

देखिये, सबसे बड़ी बात यह है कि जो आप पढ़ रहे हैं इस समय, यह आप अपनी सारी जिंदगी भर नहीं पढ़ते रहेंगे। इसका एक निश्चित समय है उसके बाद आप ग्रेजुएट होंगे, उसके बाद अगर आप डॉक्टर बनना चाहते हैं तो आप डॉक्टर बन जाएंगे। उसके बाद आपको बहुत स्वतंत्रता मिलेगी आप जो भी करना चाहे कर पाएंगे। पहले कुछ साल में तो आपको खूब मेहनत करनी पड़ेगी। तो जो भी यह हो रहा है, यह हमेशा के लिए नहीं हो रहा है। हर एक चीज, हर एक दिन जो आता है वह वापिस कभी नहीं आएगा। अगर आप कुछ सीख जाएं, कुछ समझ जाएं इससे आपका भी भला है, औरों का भी भला है।

सबसे बड़ी बात तो यही है कि मन तो आपका कहीं लग रहा है बस यह बात है कि पढ़ाई में नहीं लग रहा है। वहां से निकालकर आप अपना मन पढ़ाई में भी लगाएं। इसका यह मतलब नहीं है कि जहां अब लग रहा है — अगर आप अपने लिए यह बना लें कि या तो वहां लगे या यहां लगे तो बात बहुत मुश्किल बन जाएगी। नहीं, यहां भी लगाइये, वहां भी लगाइये। जब यहां लगाने का समय हो तो मन को एकाग्र करके यहां लगाइये। जब वहां लगाने का समय हो तो वहां लगाइये। यह तो आपके ऊपर निर्भर है। इसका यह मतलब थोड़े ही है कि अगर आप 2 दिन लगा सकते हैं, 3 दिन लगा सकते हैं तो आप 4 दिन भी लगा सकते हैं, 5 दिन भी लगा सकते हैं, 6 दिन भी लगा सकते हैं, 7 दिन भी लगा सकते हैं, हफ्ता भी लगा सकते हैं, हफ्ता लगा सकते हैं तो महीना भी लगा सकते हैं, महीना लगा सकते हैं तो दूसरा महीना भी लगा सकते हैं, दूसरा महीना लगा सकते हैं तो साल भी लगा सकते हैं, 2 साल भी लगा सकते हैं, 3 साल भी लगा सकते हैं, 4 साल भी लगा सकते हैं। उसके बाद तो आपको ग्रेजुएट हो जाना चाहिए। तो मतलब, मेरा यही कहने का मतलब है कि मन तो आपका कहीं ना कहीं लग रहा है बात यह है कहां लग रहा है! तो मेरे को आशा है कि आपको इसका जवाब मिला होगा।

जय श्री विश्वकर्मा, धनबाद झारखंड, वह लिखती हैं कि — "मेरे मन में बहुत अशांति रहती है, मैं कभी खुश नहीं रह पाती हूं। जिस वजह से मैं अपने परिवार को भी खुश नहीं रख पाती हूं। मैं बहुत डिप्रेशन में हूं कृपया इससे निकलने का रास्ता बताएं।"

देखिये एक तो, डिप्रेशन मेडिकल के कारण हो सकता है। इसके लिए आपको डॉक्टर को दिखाना चाहिए ताकि कम से कम अगर कोई ऐसी चीज है, केमिकल इम्बैलेंस (chemical imbalance) है तो वह, आप उसको देख पाएं। और अगर केमिकल इम्बैलेंस नहीं है और आप, अशांति रहती है आप खुश नहीं रह पाते हैं, आप चीजों में देखते हैं कि क्या-क्या गलत हो रहा है तो यह सारी चीजें यह तो आपके ऊपर निर्भर है आप क्या देखें! हर एक चीज के अंदर अच्छाई भी है, हर एक चीज के अंदर बुराई भी है। अगर आप देखें जो पौधा गुलाब के फूल देता है उसमें गुलाब का फूल भी है ऊपर और कांटे भी हैं उसमें। तो कांटे चाहिए आपको या गुलाब का फूल चाहिए आपको। सुंदरता तो आपको गुलाब के फूल में मिलेगी, कांटों में नहीं मिलेगी। कांटों में दर्द मिलेगा, दुख मिलेगा और गुलाब के फूल में आपको बहुत अच्छी खुशबू मिलेगी, आनंद मिलेगा, कोमलता मिलेगी, बहुत सुंदर रंग मिलेगा, यह सारी चीजें आपको मिलेंगी और हर एक चीज में यह है। यह आपके ऊपर निर्भर है कि आपको क्या चाहिए और अगर यह चाहिए तो बड़ी आसानी से उस तरफ हर दिन थोड़ा-थोड़ा परिश्रम कीजिए कि आप चीजों की अच्छाइयों को देखें, बुराइयों को नहीं। जब कोई चीज किसी भी चीज की बुराइयों को देखने लगे अपने आप से कहिए "रुको-रुको मैं यह नहीं देखना चाहती मैं देखना चाहता हूँ या देखना चाहती हूं जो अच्छाई है इसमें।" तो ऐसे-ऐसे, धीरे-धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा करके आपके जीवन में परिवर्तन जरूर आएगा।

अगला प्रश्न , मेरा प्रश्न है कि "कर्म और कर्तव्य बड़ा है या धर्म बड़ा है ? मेरा मार्गदर्शन करें।"

धर्म आप सीखते हैं, समझते हैं, पर जो भी आप करते हैं वह आपका कर्म है। मैंने अपने जीवन के अंदर किसी भी चीज की कल्पना की, कोई भी ख्याल मेरे मन में आया पर मैंने अगर कुछ उसके बारे में नहीं किया तो वह ख्याल किसी भी काम का नहीं है। एक बार जब मैं कोई चीज कर देता हूं उसको मैं वापिस नहीं ले सकता। ख्याल को मैं वापिस ले सकता हूं पर अगर एक बार मैंने कोई चीज कर दी तो उसको मैं वापिस नहीं ले सकता, कर दी तो कर दी उसमें फिर समय शामिल है। एक बार किसी चीज में समय शामिल हो जाता है तो उसको वापिस नहीं लिया जा सकता। सबसे बड़ा कर्म है। कर्त्तव्य समझने की चीज है कि आपका कर्तव्य क्या है किसी-किसी चीज के भी प्रति। और धर्म आपको बताता है कि कैसे आपको रहना चाहिए, कैसे आपको होना चाहिए, क्या आपको करना चाहिए, परंतु धर्म करवाता नहीं है। कर्म आप करते हैं, कोई भी कर्म आप करते हैं, धर्म नहीं। धर्म समझाता है क्या ठीक है, क्या अच्छा है! कर्तव्य समझाता है कि क्या ठीक है, क्या अच्छा है, परंतु कर्म आप करते हैं।

तो यह सबसे बड़ी चीज है कि बड़ा नहीं, छोटा नहीं सबसे बड़ी बात है कर्म आप करते हैं और उस कर्म को जो आपके समझ है उसको तो आप वापिस ले सकते हैं, परंतु जो कर्म आप करते हैं उसको आप वापिस नहीं ले सकते। यह एक कहानी है न वही वाली कि एक बार अकबर इंतजार कर रहा था बीरबल की। तो बीरबल नहीं आया उनके दरबार में तो अकबर गुस्सा हो गए। बीरबल को बुलाया तो बीरबल आया।

तो बीरबल से कहा कि "क्यों तुम आज लेट हो गए आये नहीं समय पर ?"

बीरबल ने कहा "जी! मेरा पोता आया हुआ है और उसको खुश करने में मैं लगा हुआ था। वह खुश ही नहीं हो रहा था।"

राजा ने कहा, "ऐसी क्या बड़ी बात है छोटा-सा बच्चा ही तो है उसको तो बड़ी आसानी से खुश किया जा सकता है।"

तो कहा कि "हुजूर! यह तो ठीक बात नहीं है। यह सच बात नहीं है — बच्चे को बड़ी आसानी से खुश नहीं किया जा सकता है!"

तो अकबर ने कहा — "बुलाओ अपने पोते को!" तो पोते को बुलाया गया।

तो पोते को पहले ही बीरबल ने कहा था "क्या-क्या माँगना राजा से!"

तो अकबर ने पूछा, "क्या चाहिए तुमको?"

पोते ने कहा , "जी!, मेरे को गन्ना चाहिये।" तो गन्ना मंगवाया।

तो बीरबल की तरफ देखा अकबर ने कि "देख! बड़ी आसान बात है यह, इसको खुश करना कोई बड़ी बात नहीं है।"

बीरबल थोड़ा मुस्कुराया, क्योंकि उसको समझाया हुआ था तो बच्चा फिर रोने लगा।

तो कहा कि "अब क्यों रो रहा है ?"

कहा, "मेरे को पूरा गन्ना नहीं चाहिए, मेरे को छोटे-छोटे टुकड़ों में यह गन्ना चाहिए।"

तो राजा ने कहा "यह तो बड़ी आसान बात है।" सिपाही को बुलाया कि इसको काट दो अपनी तलवार से। तो उसने उसकी गँड़ेरी काट दी।

तो जब गँड़ेरी काट दी तो राजा ने देखा बीरबल की तरफ कि "यह तो बड़ी आसान बात है। क्या मुश्किल बात है इसको खुश करने में।"

तो फिर बच्चा रोने लगा।

कहा, "अब क्या हो गया, अब क्या बात है ?"

तो कहा कि नहीं "मेरे को साबुत, पूरा का पूरा साबुत गन्ना चाहिए अब।"

तो फिर अकबर ने देखा बीरबल की तरफ कि क्या बड़ी बात है। तो उसको बुलाया कहा, "लाओ दूसरा गन्ना लाओ, साबुत गन्ना लाओ!"

तो जब साबुत गन्ना आया तो बच्चा और जोर से रोने लगा।

कहा, "अब क्या हुआ, अब क्या बात है ?"

कहा, "मेरे को वही गन्ना साबुत चाहिए, जो छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा था।

क्योंकि वह फिर साबुत नहीं होगा कभी भी।

तो देखने की बात है कि जो आप करते हैं एक बार जो किया उसमें समय इनवॉल्वड है। जब समय इनवॉल्वड है तो उसको फिर वापिस नहीं लिया जा सकता इसलिए सचेत रहने की बहुत जरूरत है।

तो सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!