लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #23 (15 अप्रैल, 2020) - Hindi

हर एक व्यक्ति को बनाने वाले ने एक उपहार दिया है। वह उपहार, जिससे तुमको आनंद मिल सकता है, तुम्हारा जीवन धन्य हो सकता है। क्या उपहार है वह — खोजो उसको जानो।" —प्रेम रावत (15 अप्रैल, 2020)

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

आज के दिन मैंने सोचा कि आपको एक कहानी सुनाते हैं और यह एक कहानी है, जो बहुत लोगों ने सुन भी रखी है। अगर आप नए-नए हैं तो यह आपके लिए नई कहानी होगी।

एक समय था, प्राचीन काल का समय और भगवान राम और लक्ष्मण, सीता वनवास पर थे। तो एक दिन भगवान राम ने कहा कि "भाई लक्ष्मण! चलो थोड़ा घूम आते हैं।" तो वह चल दिए और चलते-चलते-चलते-चलते वह एक नदी के पास पहुंचे। उसके तट पर वह चलने लगे। नदी के किनारे बड़ा शीतल वातावरण था — पेड़ थे, चिड़ियाएँ थीं, नदी बह रही थी तो बहुत ही सुंदर सबकुछ था। तो उनको एक आवाज आई और वह आवाज थी किसी के रोने की।

तो कहा — "लक्ष्मण तुमको भी यह आवाज सुनाई दे रही है?"

कहा — "हां! प्रभु मेरे को भी यह आवाज सुनाई दे रही है।"

तो भगवान राम ने कहा — "चलो देखते हैं कहां से यह आवाज आ रही है।"

तो आगे गए तो देखा कि एक बेचारा लकड़हारा नदी के किनारे बैठा हुआ है। दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ हुआ और खूब जोर-जोर से रो रहा है।

भगवान राम गये कहा कि " भाई! क्या बात है क्यों तुम रो रहे हो ? क्या दुःख है तुम्हें ?”

तो लकड़हारा कह रहा है — "प्रभु! मैं लकड़ी काटता हूं उसी से मेरा पेट पलता है और सबसे बड़ी चीज मेरे लिए है कुल्हाड़ी और मैंने कुल्हाड़ी एक पेड़ के सामने रखी थी संभालकर और मैं मुंह-हाथ धोने के लिए गया नदी में और वह कुल्हाड़ी जो है मेरी नदी में गिर गई। अब मिल ही नहीं रही है।"

तो भगवान को उस पर दया आई। दयालु भगवान राम तो थे ही। जब दया आई तो उन्होंने अपना हाथ पानी में डाला और एक बहुत सुंदर कुल्हाड़ी जो चांदी की बनी हुई थी निकाली और लकड़हारा की तरफ दी कि "भाई! यह तेरी है ?"

ऐसी कुल्हाड़ी उसने अपनी जिंदगी में कभी देखी नहीं थी तो उसने कहा "भगवान बहुत सुंदर कुल्हाड़ी है यह, पर यह मेरी नहीं है।"

भगवान मुस्कुराए उनको लगा कि यह सचमुच में अच्छा आदमी है। मैंने चांदी की कुल्हाड़ी निकाली और उसने मना कर दी। फिर अपना हाथ डाला नदी में और एक सोने की कुल्हाड़ी निकाली और उसमें तरह-तरह के जेवरात बने हुए थे, लगे हुए थे भगवान राम ने कहा कि "यह तुम्हारी है ?"

कहा प्रभु, "यह भी मेरी नहीं है। मेरी तो बड़ी साधारण-सी कुल्हाड़ी है।”

तो भगवान राम ने फिर हाथ डाला और उसकी कुल्हाड़ी निकाली जो बहुत ही पुरानी, उसमें जंग चढ़ा हुआ, लकड़ी जो उसमें लगी हुई और टेढ़ी-मेढ़ी ठीक ढंग से नहीं, देखने में भी अच्छी नहीं थी। कहा — "यह तुम्हारी है ?"

लकड़हारा बड़ा खुश हो गया कहा, "हां! प्रभु यह मेरी है!"

भगवान राम इतने खुश हुए, इतने खुश हुए उससे कि उन्होंने उसको चांदी की कुल्हाड़ी भी दे दी, सोने की कुल्हाड़ी भी दे दी और उसकी जो पुरानी टूटी-फूटी कुल्हाड़ी थी, वह भी उसको सौंप दी।

अब बात यह है कि ऐसी ईमानदारी इस संसार में आसानी से नहीं मिलती है। सभी एक ही चीज में लगे हुए हैं "और बढ़ाओ, और बढ़ाओ।" कोई धनी है उसके पास बेशुमार दौलत क्यों न हो वह दिन-रात इसी मेहनत में लगा रहता है कि "मेरे पास और हो, और हो, और हो!" चाहे छोटा से छोटा हो। कोई ऐसा भी है जिसको सिर्फ एक रुपए से ही उसका काम चल जाएगा जिसके पास सौ हैं उसको सौ और चाहिए, जिसके पास हजार हैं उसको हजार और चाहिए, जिसके पास लाख हैं उसको लाख और चाहिए, जिसके पास करोड़ हैं उसको करोड़ और चाहिए, जिसके पास अरबों हैं उसको अरबों और चाहिए।

यही माया की रीत है और ऐसा बड़ी मुश्किल से मिलता है कि जो ईमानदार आदमी हो, जो सोने की कुल्हाड़ी को भी देखे या चांदी की कुल्हाड़ी को भी देखे और यह कह दे कि “यह मेरी नहीं है।” बहुत मुश्किल से आपको ऐसा व्यक्ति मिलेगा।

समय गुजर गया। कुछ समय के बाद फिर वही बात हुई भगवान राम ने कहा "भाई लक्ष्मण! चलते हैं थोड़ा घूम लेते हैं अच्छा रहेगा।" तो फिर उसी नदी के पास पहुंच गए और वहां पर चलने लगे। बड़ा सुहाना मौसम था। पेड़, चिड़िया और नदी की आवाज — सबकुछ बहुत ही सुहाना था। चलते-चलते उनको फिर किसी के रोने की आवाज सुनाई दी तो रोने की आवाज सुनाई दी तो "कौन है!" तो जब गए आगे तो देखा कि वही लकड़ी काटने वाला लकड़हारा अपना सिर पकड़े हुए रो रहा है।

तो भगवान राम ने कहा, " भाई! अब तेरे को क्या दुःख है ? फिर तेरी कुल्हाड़ी खो गयी क्या ?"

कहा, "नहीं महाराज मेरी कुल्हाड़ी नहीं खोई। हम — मैं अपनी बीवी के साथ आया था यहां जंगल में और हमलोग लकड़ी इकट्ठा कर रहे थे, काट रहे थे। जब दोपहर हुई तो हम इस पेड़ पर चढ़ गये ऊपर जो, और बड़ा सुहाना था, क्योंकि नीचे पानी बह रहा था ऊपर पेड़ था। तो हमने सोचा कि इसी पेड़ पर चढ़ करके और खाना खा लेते हैं दोपहर का और फिर थोड़ा आराम भी कर लेंगे, बड़ा अच्छा रहेगा। तो सबकुछ बड़ा अच्छा चल रहा था। खा रहे थे खाना, आनंद ले रहे थे। इतने में मेरी बीवी फिसल करके नदी में पड़ गयी। और अब बहुत खोजा उसको मैंने वह मिल ही नहीं रही है। तो मैं क्या करूं ? वही एक है जो मेरे लिए खाना बनाती थी, मेरा घर रखती थी, सबकुछ करती थी मेरे लिए। अब वह चली गयी तो मेरी जिंदगी का क्या होगा!"

भगवान राम ने कहा, "ठीक है, अच्छी बात है!" तो उन्होंने अपना हाथ नदी में डाला और एक बहुत ही सुंदर लड़की को बाहर निकाला। अब लड़की इतनी सुंदर कि पूछिए मत। तो कहा, "भाई यह तेरी है ?"

तो उसने देखा उस लड़की की तरफ और तुरंत बोलता है “हां! प्रभु यह मेरी ही है!"

भगवान राम ने कहा, "बदमाश! जब तेरी कुल्हाड़ी की बारी थी, तो तू बड़ा ईमानदार था और अब बीवी की बारी हुई है — तेरी बीवी खो गयी है तो इस लड़की के साथ तू शादी रचाना चाहता है। तू बहुत ही बेईमान आदमी है तेरे को तो दंड मिलना चाहिए।"

कहा, "प्रभु मेरी भी तो सुन लीजिए आप!

कहा, "क्या ?"

कहा कि "जब मेरी कुल्हाड़ी खोयी थी तो आपने पहले चांदी की कुल्हाड़ी निकाली और मैंने कहा, वह मेरी नहीं है फिर आपने सोने की कुल्हाड़ी निकाली मैंने कहा कि वह भी मेरी नहीं है तब आपने मेरी कुल्हाड़ी निकाली और जब आप मेरे से खुश हो गए तो आपने वह तीनों की तीनों कुल्हाड़ी मेरे को दे दी। मैंने सोचा कि आपने यह पहली लड़की निकाली है फिर मैं कह दूंगा कि यह मेरी नहीं है फिर आप दूसरी लड़की निकालोगे वह इससे भी खूबसूरत होगी और मैं कह दूंगा यह भी मेरी नहीं है तब आप मेरी वाली निकालोगे और जब आप मेरी वाली निकालोगे तो मैं कहूंगा, हां यह मेरी है और आप तीनों के तीनों मेरे को सौंप देंगे। अब मेरे से एक तो संभाली नहीं जाती, मैं तीन-तीन कहां से संभालूंगा।" तो यह बात है।

तो सचमुच में सोचने की बात है कि इस माहौल में, जो यह कोरोना वायरस का माहौल है, यह सब माहौल है। यह एक हमारे पास समय है कि हम कुछ सीखें इससे, कुछ संभालें इससे। हमारे अंदर जो यह उद्गार होते हैं कि "और चाहिए, और चाहिए, और चाहिए।" जो यह कंजूसी होती है इसका हम क्या करें ? यह तो मनुष्य को शोभा नहीं देते। जैसे कि जब उसने कंजूसी नहीं दिखाई तो भगवान राम ने उसको और दिया। जब मनुष्य के अंदर (जो अंग्रेजी में जेनरॉसिटी generosity कहते हैं) कि हृदय से वह दे! तो देना किसी को — देखिये! बात पैसे की नहीं है, बात किसी चीज की नहीं है, कोई चीज और भी है जो आप दे सकते हैं। जैसे बाप अपने बेटों को, अपनी बेटियों को प्यार दे सकता है। पति अपनी पत्नी को प्रेम दे सकता है। पत्नी अपने पति को प्रेम दे सकती है — उपहार की बात नहीं कर रहा हूं मैं। यही, यह जो प्रेम है, यह जो समय है, यह सबसे बड़ा उपहार है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को क्या दे सकता है ? हम लोगों ने तो रीत बना ली है हमारे संसार के अंदर कि किसी को कुछ देना है।

सबसे बड़ी चीज देने कि वह है क्या — वह प्रेम, वह असली चीज है जो हम किसी को दे सकते हैं। अब जब लोग हैं इस सिचुएशन (situation) के अंदर, इस परिस्थिति में कि कहीं जा नहीं सकते बाहर, लॉकडाउन है, तो घर में बैठे हैं। अरे! इसका यह मतलब नहीं है कि आप किसी को प्रेम नहीं दे सकते हैं। प्यार नहीं दे सकते हैं। जो रिस्पेक्ट होती है, जो इज्जत होती है वह आप दे सकते हैं। इस संसार के अंदर सबसे बड़ी बुरी आदत हम लोगों की क्या है कि अब हम लोगों ने एक दूसरे को सुनना बंद कर दिया है। परिवार में बाप नहीं सुनता है, बेटा बाप की नहीं सुनता है, बाप बेटा की नहीं सुनता है। पति पत्नी की नहीं सुनता है, पत्नी पति की नहीं सुनती है, पत्नी बेटों की, लड़कियों की नहीं सुनती है। एक-दूसरे में कोई किसी की नहीं सुन रहा है। सुनना बंद कर दिया है। जो मैं सोच रहा हूं बस वही होना चाहिए, वैसा ही होना चाहिए और कुछ नहीं।

पर यह सच्चाई नहीं है! एक मनुष्य होने के नाते, एक परिवार के सदस्य होने के नाते सबसे बड़ा उपहार जो आप दे सकते हैं वह किसी वस्तु का नहीं है वह इन भावनाओं का है, वह इस प्यार का है, वह इस आनंद का है। और जब हम यह भाव देंगें कहा है कि —

तुलसी या संसार में कर लीजिए दो काम देने को टुकड़ा भला लेने को हरि नाम

तो अपने जिंदगी के अंदर अगर हम उस चीज को अपनाएं जो असली में मनुष्य की असली इंसानियत है तो क्या-क्या नहीं बदल सकते हैं हम अब। क्या-क्या हमारे जीवन के अंदर, हमारे इर्द-गिर्द परिस्थितियों में — अब कई प्रश्न हैं जो आते हैं "मैं इस चीज के बारे में क्या करूं मैं परेशान हो जाती हूं" यह — अरे! सिर तो परेशानी में डाला हुआ है। समस्या से आई परेशानी, सिर घुसाया हुआ है परेशानी में, परेशान हो रखें और समस्या क्या इसको कोई नहीं देख रहा है। क्या है समस्या ?

बेटा बोलता है, "मैं नहीं पढूंगा! मैं नहीं पढूंगा।" माँ-बाप परेशान होते हैं। उसको पीटते हैं, उसको मारते हैं, उसको गाली-गलौज देते हैं, उसको भला-बुरा कहते हैं। अगर, अगर सचमुच में दो मिनट बैठकर उस बेटे से बात की जाये — क्यों नहीं पढ़ना चाहता है, क्या दिक्कत है, क्या खराबी है। हो सकता है वह यह कहे कि "जो पढ़ाया जा रहा है वह मेरे को समझ में नहीं आ रहा है।" अगर उसके समझ में नहीं आ रहा है तो उसकी गलती थोड़ी है। समझने का कोई वॉल्व थोड़ी होता है, समझने का कोई स्विच थोड़ी होता है। जब नहीं आ रहा है तो नहीं आ रहा है उसकी मदद करनी पड़ेगी, उसके साथ बैठना पड़ेगा, उसको और समझाना पड़ेगा।

जब स्कूलों में भेजते हैं हम, कैसे स्कूलों में भेज जाता है हिन्दुस्तान में ? ऐसे-ऐसे स्कूलों में भेजा जाता है बच्चों को, जहां इतने-इतने विद्यार्थी हैं एक-एक कक्षा के अंदर — अगर किसी का प्रश्न भी है तो उसका उत्तर उनको नहीं मिलेगा। और मास्टर जी हैं उनको क्या है — “भाई सारी क्लास को पूरा करना है।” वह 45 मिनट उनके पास हैं, उसमें सारी क्लास को पूरा करना है, पढ़ाना है। वह पढ़ा रहे हैं इसका यह मतलब नहीं है कि — उनको यह भी देखना है कि किसी के दिमाग में जो पढ़ा रहे हैं वह जा भी रहा है या नहीं! बस बोले जा रहे हैं, बोले जा रहे हैं, 45 मिनट के लिए उनको कहना है, जो उनका करिक्यूलम (curriculum) है उसके हिसाब से उनको पढ़ाना है, पढ़ाया और उनका काम पूरा हुआ।

मेरे को कैसे मालूम ? 'भाई! मैं भी तो जाता था स्कूल में।' सारी यही बात होती थी और जो — रांची के अंदर जो जन-भोजन की योजना है, उसके तहत जो वहां बच्चे आते हैं उनसे मैंने एक दिन बात की इस बारे में। तो यह बात तो समझने की है कि अगर किसी की — हो सकता है कि किसी के जीवन के अंदर किसी प्रकार का कष्ट है इसलिए कोई काम नहीं कर रहा है तो इसका मतलब यह थोड़ी है कि गुस्सा हो जाने से कोई काम हल हो जाएगा। ईर्ष्या, द्वेष यह जब परिवार के अंदर आता है — यह परिवार के अंदर नहीं आना चाहिए परन्तु जब भी यह परिवार के अंदर आता है यह परिवार को तबाह कर देगा, यह परिवार को तबाह कर देगा। यह नहीं होना चाहिए कभी परिवार में। सभी लोग कहते हैं परिवार को मिलजुल कर रहना चाहिए। परन्तु परिवार मिलजुलकर क्यों नहीं रहता है ? क्योंकि एक को किसी से समस्या है, कोई किसी से समस्या है...

एक बार एक विद्यार्थी ने — एक बार गया था मैं कहीं, तो उसने कहा कि मेरे सारे परिवार में लोग लड़ते हैं, झगड़ते हैं। मैं इस लड़ने-झगड़ने को बंद कैसे करूं ? मैंने कहा कि तुम जब देखते हो कि सब लड़ रहे हैं, झगड़ रहे है, तुम्हारा उस लड़ने और झगड़ने में, तुम्हारे परिवार के लड़ने में और झगड़ने में तुम्हारा योगदान क्या है ? मतलब कि तुम क्या करते हो जब सब लोग लड़ रहे हैं और झगड़ रहे हैं — तुम उसका आनंद लेते हो, उसका मज़ा लेते हो ? यह भी होता है। यह भी होता है। यह सारी चीजें परिवार में नहीं होनी चाहियें। हर एक परिवार का सदस्य एक महत्वपूर्ण सदस्य है और उस महत्वपूर्ण सदस्य को वह दर्ज़ा मिलना चाहिए, उसकी बात सुननी चाहिए, उसकी बात समझनी चाहिए। यह नहीं कि मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं, मैं भी परेशान हूं। वही वाली बात होती है बाप परेशान है, काम के कारण परेशान है। उसको यह करना पड़ता है, वह करना पड़ता है इसलिए वह परेशान है। मां परेशान है क्योंकि बाप परेशान है। बच्चे परेशान हैं क्योंकि मां और बाप परेशान हैं। और उनको यह करना है, उनको यह चाहिए, उनको यह चाहिए, उनको यह चाहिए।

अब दुनिया आसान थोड़ी है कोई। दुनिया कहती है “मेरे पास यह है, मेरे पास यह है, मेरे पास यह है, तेरे पास नहीं है।” अरे! किसी के पास कुछ है, किसी के पास कुछ नहीं है का क्या मतलब हुआ ? कुछ मतलब नहीं हुआ। जिसके पास वह नहीं है, जो दूसरे के पास है तो इसका मतलब है कि उसके पास कुछ और है जो उसके पास नहीं है। क्या है उसके पास ? अगर उसके पास फोन नहीं है तो उसके पास परेशान होने की कोई चीज नहीं है। उसके पास भी कुछ है। वह सोच सकता है, वह विचार सकता है, क्योंकि जिसके पास वह फ़ोन है — जो हमेशा आता रहता है, टेक्स्ट करना है, यह करना है, ईमेल है, फ़ोन है, यह है, वह है। वह सोचता थोड़े ही है। सारे दिन उसके पास सोचने के लिए समय नहीं है। जिसके पास वह नहीं है उसके पास सोचने के लिए समय है। उसके पास आनंद लेने के लिए समय है। उसके पास — यह तो वह वाली बात आ जाये कि अगर किसी को भूख लगी हो और कोई जा रहा हो रोड पर और आम का पेड़ मिल जाए और आम के पेड़ पर स्वादिष्ट से स्वादिष्ट आम लगे हुए हैं। आप जानते हैं अच्छी तरीके से एक हाथ से तो आम खाया नहीं जाता। आम के लिए तो दो हाथ चाहिए। उसको मसल-मसलकर अंदर से उसका गूदा निकालकर जब मुंह में डालेंगे तब मजा आता है उसमें। तो जिसके पास फोन है वह उसका मज़ा थोड़ी ही ले सकता है। कैसे, कैसे — एक हाथ से उसको कभी फ़ोन यहां रखना पड़ेगा, कभी यहां करना पड़ेगा, फिर खाने की कोशिश करनी पड़ेगी तो उसके साथ दिक्कत हो जायेगी। पर जिसके पास नहीं है वह अपना ठाट से, दोनों हाथों से उस आम का आनंद ले सकता है, यह होता है। सबके लिए सबकुछ है। बनानेवाले ने सबको सबकुछ दिया है। कोई अपने आप को — किसी को नहीं समझना चाहिए कि वह अभागा है। ना! यह सारे जितने भी बना रखे हैं लैबल कि "तू पढ़ा-लिखा है, मैं अनपढ़ हूं!" ना, इसमें पढ़े-लिखे की बात नहीं है, अनपढ़ की बात नहीं है। पढ़ा-लिखा भी कोई हो इसका मतलब यह थोड़ी है कि वह दाल बना सकता है, रोटी बना सकता है और कोई ऐसा भी हो जो पढ़ा-लिखा ना हो पर वह दाल बना सकता है, रोटी बना सकता है।

यह तो वही वाली बात है — एक बार एक बहुत विद्वान पंडित एक नौका में सफर कर रहे थे। तो उन्होंने जो मांझी था उससे पूछा कि — "भाई! तुम कितने पढ़े-लिखे हो?"

कहा कि "मैं तो पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।"

कहा, “ओह! तुमने तो अपनी सारी जिंदगी बर्बाद कर दिया।"

वह नदी के बीच में — केवट जो है, वह नदी के बीच में नाव को ले जा रहा है। और पंडित जी पूछ रहे हैं "तुमने कहीं भ्रमण किया है, कहीं तीर्थ गए हो ?

कहा, “नहीं जी! मैं तो कहां जा सकता हूँ मैं तो इसी में लगा रहता हूं दिन-रात!”

कहा, "तुमने तो सचमुच में अपनी सारी जिंदगी खराब कर दी।" थोड़ा और आगे गए।

पंडित जी ने कहा — "और कुछ है तेरे पास जो तूने सीखा, जाना ?”

कहा, "जी मेरे को तो सिर्फ यह नौका ही चलानी आती है।"

पंडित जी ने कहा — "तूने तो अपनी सारी जिंदगी खराब कर दी। कुछ नहीं सीखा तूने, कुछ नहीं पढ़ा तूने, तू अनपढ़ है।"

तब वह केवट बोलता है कि "पंडित जी! मैं एक सवाल आपसे पूछ सकता हूं ?”

पंडित जी ने कहा — "क्या ?"

तो केवट ने कहा, "आपको तैरना आता है, आपको तैरना आता है ?"

तो पंडित जी ने कहा "नहीं भाई! हमको तो तैरना नहीं आता है। हमको तैरने की क्या जरूरत है। हमने वेद पढ़े हुए हैं, शास्त्र पढ़े हुए हैं, हमने रामायण का अध्ययन किया हुआ है, गीता का अध्ययन किया हुआ है, सब चीजों का अध्ययन किया हुआ है। हमको तैरना नहीं आता है तो क्या बड़ी बात है!"

कहा, "पंडित जी! तैरना नहीं आता है, यही आपने नहीं सीखा। मेरी तो जिंदगी होगी बर्बाद जब होगी पर, आपकी बर्बाद तो अब हो गई है, क्योंकि इस नौका में हो गया है छेद और यह नौका धीरे-धीरे पानी में डूब रही है और अगर आपको तैरना नहीं आता तो आप आज मरेंगे।"

बात यह नहीं है कि क्या सीखा हुआ है! हर एक व्यक्ति की जिंदगी के अंदर बनाने वाले ने एक उपहार दिया है, सबको एक उपहार दिया है। वह क्या उपहार है — यह नहीं है कि "तुम यह नहीं कह सकते हो कि तेरा उपहार बड़ा है या मेरा उपहार बड़ा है। ना! यह नहीं कर सकते, यह नहीं कह सकते। सबका अपना-अपना है। वह तुम्हारे लिए है। जिसको करने से तुमको आनंद मिल सकता है। तुम्हारा जीवन धन्य हो। तुम समझ पाओ बस! यह उपहार सबको मिला हुआ है क्या उपहार है वह — खोजो उसको जानो।”

कोई कविता लिख सकता है, कोई कविता सुन सकता है। अच्छा! "आप कहेंगे कि कविता सुनने वालों में क्या-क्या-क्या-क्या बड़ी बात है ?"

अजी! एक बात सुनिए आप! अगर कविता सुनने वाले नहीं होते तो कविता सुनाने वाले क्या करते ? किसको कविता सुनाते ? सुनाते हैं यह तो लोग समझते हैं कि एक उपहार है जो सुनते हैं उनको नहीं कहते हैं कि उपहार है। परन्तु कविता सुनने वाले नहीं होते तो कविता सुनाने वाले क्या करते ? कुछ नहीं करते, न कविता लिखते, क्योंकि कोई सुनने वाला था, कोई सुनने वाला है, तभी तो वह उठकर सुनाते हैं उसको कविता। जब कोई है ही नहीं तो क्या सुनाएंगे। तो सबको एक उपहार मिला हुआ है अपने जीवन के अंदर। उस उपहार को जानो और अपने जीवन को सफल बनाओ!

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!