लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #13 (5 अप्रैल, 2020) - Hindi

"हम सोचते हैं कि हमारी परिस्थितियां हमसे बलवान हैं, परन्तु हम भूल गए हैं कि हम अपनी परिस्थितयों से ज्यादा बलवान हैं। उड़ने के लिए तुमको परों की जरूरत नहीं है, यह रस्सियां और बंधन जो तुमको बांधे हुए हैं इसको काटो, और तुम अपने आप उड़ने लग जाओगे।" —प्रेम रावत (5 अप्रैल, 2020) 

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

क्योंकि यह वीकेंड आ गया है — शनिचर, इतवार का दिन है और प्रश्न पढ़ने का यह मौका है। तो आप लोगों ने जो प्रश्न भेजे हैं, उनका मैं जवाब देने की मैं कोशिश करूँगा।

"मैं अपने अंदर की अच्छाइयों को बाहर नहीं ला पा रही हूँ, क्योंकि मेरे अंदर इतनी कड़वाहट भर गयी है कि अब मुझे इस जीवन से उतना प्यार नहीं रहा, जितना पहले था। मैं भटक चुकी हूँ। मैं वापिस जाना चाहती हूँ पर कुछ तो है जो मुझे रोक रहा है और मैं चाहकर भी नहीं जा पा रही हूँ। मैं दिन भर परेशान रहती हूँ।"

देखिये! आपको परेशान — एक तो परेशान रहने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि जो कुछ भी हो रहा है, जो कुछ भी दुःखों का कारण है वह कितना बड़ा है ? इतना बड़ा है, इतना। जो कुछ भी हो रहा है वह यहां हो रहा है। बाहर की जो परिस्थिति है, वह तो हमेशा बदलती रहती है कभी कुछ है, कभी कुछ है, कभी कैसी है, कभी कैसी है। परन्तु यहां जो आवाज इन कानों के बीच में हो रही है, इसको कैसे रोका जाए ? प्रश्न का मूल जो सवाल है, वह मैं इस प्रकार देख रहा हूँ कि इसको कैसे रोका जाए ? परेशानी जिसकी आप बात कर रहे हैं वह यहां है। बाहर की परिस्थिति तो हमेशा बदलती रहेंगी — "कभी कुछ है, कभी कुछ है, कभी कैसा है, कभी कैसा है!" और अगर हम बाहर की परिस्थितयों में ही लगे रहे तो हमारे जीवन में हम कभी आनंद नहीं ले पाएंगे। जो सुख है, असली सुख है उसकी अनुभूति नहीं कर पाएंगे। लगे रहेंगे, लगे रहेंगे, जैसे वह बैल होता है, जो कुंए के पास चलता है — सारे दिन चलता रहता हैं, चलता रहता है, चलता रहता है, तो वह भी सोचता होगा पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुंच गया मैं! पर जब रात को या शाम को उसकी पट्टी खुलती है तो वह अपने आपको वहीं पाता है जहां वह पहले था। तो मनुष्य के साथ भी यही हाल है। हाल क्या है ? मैं फिर सुनाकर बताता हूँ कि —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

आपने देखा होगा भंवर — भैं, भैं, भैं, भैं कभी फूलों के इधर से आता है, कभी उधर से आता है, कभी यहां जाता है, कभी वहां जाता है, कभी इधर बैठता है, कभी उधर, बैठता है। तो वही बात —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो —

तीनों लोकों में — कौन-कौन से लोक हैं, एक पृथ्वी लोक है, पाताल लोक है और स्वर्ग लोक है — तीनों लोकों में वह दौड़ता रहता है। तो —

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

सभी का मन कभी इधर जाता है, कभी उधर जाता है, कभी इधर डोल रहा है, कभी उधर डोल रहा है और उसी के साथ सारे मनुष्य इस सारे संसार के अंदर कभी इधर डोल रहे हैं, कभी उधर डोल रहे हैं, कभी इधर जाते हैं, कभी उधर जाते हैं। यह हो रहा है। और आपके साथ जो हो रहा है — आप दुखी हो रहे हैं उससे। क्योंकि आपको मालूम है कि कोई ऐसी जगह है जहां शांति है, जहां सुख है और आप वहां पहुंचना चाहते है पर पहुंच नहीं सकते हैं। क्योंकि आप समझते हैं कि इन सारी चीजों ने आपको जकड़ा हुआ है।

एक कहावत है अंग्रेजी में कि — "तुमको पंखों की जरूरत नहीं है उड़ने के लिए, तुमको परों की जरूरत नहीं है उड़ने के लिए, यह जो रस्सियां तुमको बांधे हुए हैं, बंधन जो तुमको बांधे हुए हैं इसको काटने की जरूरत है, तुम अपने आप ही उड़ने लग जाओगे।"

एक कहानी भी है इसी प्रकार से — एक आदमी था उसने कभी अपने जीवन में हाथी को नहीं देखा था। तो वह हाथी देखना चाहता था। तो उसने इंटरनेट पर रिसर्च की कि कहाँ हाथी हैं ? तो उसको पता लगा कि साउथ में, दक्षिण की तरफ — वहां हाथी मिलेंगे, तो वह गया। एक गाँव में गया जहां बहुत सारे हाथी थे, तो उसने देखा कि बड़े-बड़े हाथी, सब एक जगह इकट्ठा हो रखे हैं और उन पर ऐसी छोटी-सी धागे की तरह रस्सी बांधी हुई है उनके पैर पर और उस रस्सी के होने से वह कहीं नहीं जा रहे हैं। वह अपने आपको बंधा हुआ पा रहे हैं। यह बड़ा अजीब दृश्य उसको दिखाई दिया कि "इतना बलवान, इतना बड़ा हाथी और इसको बाँध रखा है छोटी-सी कच्ची रस्सी से। यह कैसे बंध गया ?"

तो पहले तो उसने हाथी को देखा, खुश हुआ हाथी को देखकर के। फिर जो वहां प्रधान था उस गांव का, उसके पास वह गया कहा — भाई! एक बात बताइये कि बड़े -बड़े बलवान हाथी हैं, इनको आपने बाँध रखा है इस छोटी-सी रस्सी से, यह कैसे संभव है ? यह तो तोड़ देंगे। तो प्रधान ने कहा "जब यह बच्चे थे, तो ऐसी ही रस्सी से इनको बाँधा जाता था और तब ये उस रस्सी को तोड़ नहीं पाते थे। अब ये बड़े हो गए हैं, पर ये समझते है कि उनसे भी बलवान है यह रस्सी और ये रस्सी को तोड़ नहीं पाएंगे।

देखिये! वही बात है, वही बात है कि जिस चीज से हम बंधे हुए हैं, उससे ज्यादा बलवान हम हैं, अपनी परिस्थितयों से ज्यादा बलवान हम हैं। परन्तु हम भूल गए हैं कि हम ज्यादा बलवान हैं। हम सोचते हैं कि हमारी परिस्थितियां जो हैं, वह हमसे बलवान हैं। जबतक आपके अंदर, कैसा राम बैठा है ?

"एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा, एक राम का जगत पसारा, एक राम जगत से न्यारा!"

वह जो सबके घट में बैठता है, वह राम आपके अंदर है। और राम की बात मैंने क्यों कही ?

क्योंकि जब भगवान राम इस दुनिया में आये, जब उनका अवतार हुआ, तो उनके साथ क्या हुआ ? आप समझते हैं कि जो उनके साथ परिस्थितियां थीं, क्योंकि — मैं फिर याद दिला देता हूँ आपको कि उनके साथ क्या हुआ ?

उनका राज्याभिषेक होना था। और जिस दिन उनका राज्याभिषेक होना था, उनको राजा बनना था, इसके लिए उनको ट्रेंड किया हुआ था, इसके लिए वह समझते थे, वह जानते थे कि “ठीक है, हां! एक दिन मैं राजा बनूंगा।” सबसे बड़े पुत्र वही थे। तब जब समय आया, उनके राज्याभिषेक का, उस दिन जहां खुशियों की बात थी — सीता माता, उनकी अर्धांगिनी, देखने में अति खूबसूरत, सभी गुणों से संपन्न, सम्पूर्ण, वह सीता माता उनको भी खुशी कि आज राज्याभिषेक होगा हमारे पति का, राम का राज्याभिषेक होगा। लक्ष्मण बहुत खुश। उस दिन क्या हुआ ?

राज्याभिषेक नहीं हुआ, उस दिन उनको बताया गया कि "तुम चौदह साल के लिए वनवास जाओगे। एक साल नहीं, दो साल नहीं, तीन साल नहीं, चार साल नहीं, पांच साल नहीं, छः साल नहीं, सात साल नहीं, चौदह साल के लिए तुम वनवास जाओगे। और, और तुम्हारा राज्याभिषेक नहीं होगा। तुम राजा नहीं बनोगे, भरत राजा बनेगा।"

भगवान राम ने कहा — "ठीक है, जैसी उनके पिताजी की आज्ञा, उसी प्रकार से आगे होगा।" कोई बात नहीं — चले गए वह।

इतना ही बहुत था ? ना! राक्षस, राक्षसों को मारा जा रहा है जंगल में हैं — एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, तीन दिन नहीं, चौदह साल के लिए वह जंगल में हैं। उनकी अर्धांगिनी — उनके साथ वह अपना प्यार भी नहीं जता सकते, क्योंकि अगर वह गर्भवती हो जाएंगी, भगवान राम को अच्छी तरीके से मालूम है कि अगर वह गर्भवती हो जाएंगी तो जंगल में ही बच्चा का जन्म होगा और मुश्किलें और बढ़ जाएंगी, तो वह छू भी नहीं सकते। उनके साथ कौन है ? कभी तो भगवान राम बैठकर सोचते होंगे कि क्या दुर्भाग्य की बात है मेरे को भी जंगल में जाना पड़ा, मेरे भाई को भी जंगल में जाना पड़ा और सीता को भी जंगल में जाना पड़ा। अब एक जगह हैं नहीं टिके हुए — कभी किधर जाते हैं, कभी किधर जाते हैं, कभी किधर जाते हैं। खाने के लिए क्या है ? तुम समझते हो खाने के लिए शॉपिंग सेंटर है कोई ? ना! अपने पैरों पर, अपने हाथों से जो कुछ भी मिल जाए — जाना है, हर रोज जंगल में जाना है। जो कुछ भी मिल जाए उसको तोडक़र के लाना है और उससे खाना बनाना है।

उसके बाद सीता की भी चोरी हो जाती है। वह समय, यह समय जैसा आजकल होता है, ऐसा नहीं था। सचमुच में भगवान राम को दुःख हुआ। आज के कई पति हैं जिनको बड़ी खुशी होगी कि "चली गयी"! पर उस समय ऐसा नहीं था। उस समय उनको जेन्यूवाइन्ली (genuinely) दुःख हुआ। सचमुच में दुःख हुआ। सीता चली गयी उसको — किसी तरह से सीता को वापिस लाना है। उनके पास शस्त्र थे, अस्त्र थे सबकुछ था। पर, उनके पास कोई आदमी नहीं थे। कोई लड़ने के लिए सिपाही लोग नहीं थे। वही अकेले थे — सिर्फ लक्ष्मण, सीता और राम!

जो उन्होंने सेना तैयार की वह कैसी सेना थी ? वानरों की और भालुओं की! वानरों की और भालुओं की सेना उन्होंने तैयार की। और उस सेना को ले जाकर के लंका पर उन्होंने हमला बोला। उस समय लड़ाई चल रही है और लक्ष्मण को बाण लगा। और लक्ष्मण की जो लाइफ है, जो जिंदगी है वह मंडरा रही है — कितना दुःख हो रहा है भगवान राम को। मैं अवतार की बात कर रहा हूँ और इतना दुःख हो रहा है, इतना दुःख हो रहा है कि ऋषि-मुनि भगवान को समझा रहे हैं कि "आप विष्णु के अवतार हैं आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है।" ये हालात हैं और फिर भी वह आये और जब उन्होंने रावण को मार दिया और जब वापस वह अयोध्या आये, उनका फिर राज्याभिषेक हुआ, तो तुम समझते हो सारी उनकी परेशानियां खत्म हो गयीं ? नहीं! वह तो और बढ़ीं। कैसे ?

हम तो राम राज्य की बात करते हैं, पर क्या सीता के लिए भी वह राम राज्य था ? जब वह आ गए थे वापिस, तो अब सीता तो गर्भवती थी। किसी बेवकूफ धोबी ने यह कहा कि उसकी बीवी भाग गयी — "उसने कहा अगर मेरी बीवी होती तो मैं राम थोड़े हूँ जो सीता को वापिस ले आता!"

इतना सुनते ही भगवान राम ने कहा लक्ष्मण से — "ले जाओ सीता को, अलग कर दो!" क्या भगवान राम को दुःख नहीं हुआ होगा ? क्या उनको नहीं मालूम था कि सीता गर्भवती है। फिर वाल्मीकि के आश्रम में सीता रही। वहां लव और कुश को जन्म दिया। और जब — फिर भगवान राम ने कहा कि — "ठीक है! सीता तू आ जा, वापिस आ जा, पर एक बार और अग्नि परीक्षा कर ले। ताकि मैं सब से कह सकूं कि "तू पवित्र है!"

सीता ने कहा कि — "कितनी बार करती रहूंगी मैं यह ? धरती तू मेरे को वापिस ले ले।" धरती से ही उनका जन्म हुआ था। धरती फटी और भगवान राम की अर्धांगिनी — सीता हमेशा-हमेशा के लिए उनसे दूर हो गयी।

क्या यह समस्या नहीं है ?

इस समय — इन स्थितियों में कोई भी आपकी परिस्थिति हो, जरा ध्यान दें कि वही राम — "एक राम दशरथ का बेटा, एक राम घट-घट में बैठा, एक राम का जगत पसारा, एक राम जगत से न्यारा" — तुम्हारे घट में वह राम बैठा है। उसको समझो, उसको जानो, उसको पहचानो। अपने जीवन की कदर जानो। तुम्हारा यह संघर्ष, तुम्हारा यह जीवन जो है इन दुनिया की परिस्थितियों का सामना करने के लिए नहीं है। यह है सच्चिदानंद को जानने के लिए। यह है —

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

इस भवसागर को पार करने का यह साधन है। तो कुछ भी हो, कोई भी परिस्थिति हो हौसला कभी नहीं भूलना चाहिए, छोड़ना चाहिए।

दूसरा सवाल है — "मैं इतनी मेहनत करता हूँ अपने आपको जानने के लिए, लेकिन मैं अभी तक अपने आपको जान नहीं पाया।"

देखिये! आपकी दो आँखें हैं और यह सारी दुनिया को देखती हैं और सबकी आँखों को देखती हैं, पर अगर आप अपने आपको देखना चाहते हैं, तो ये आँखें अपने आपको तभी देख सकेंगी, जब आपके सामने एक दर्पण होगा, आईना होगा, मिरर (mirror) होगा। जबतक ज्ञान रूपी mirror आपके पास नहीं है, तबतक आप अपने आपको जान नहीं पाएंगे, पहचान नहीं पाएंगे। और अगर 'है', तो आपको अपनी आँखें खोलनी पड़ेंगी। तभी उस दर्पण में आप अपने आपको देख पाएंगे। क्योंकि कई लोग हैं जो ज्ञान लेकर भी अपनी आँख बंद रखते हैं और दर्पण को अपने आगे कर लेते हैं और कहते हैं, "मैं अपने आपको क्यों नहीं देख पा रहा हूँ!"

इसलिए नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि आँख अभी भी आपकी बंद हैं। आँखें खोलिये, जानिये, उस ज्ञान के अनुभव को स्वीकार कीजिये। जब आपका हृदय पूरी तरह से भरेगा, जब आप उस शांति का अनुभव करेंगे, तब आपके जीवन में वाह-वाह होगी। तब आप जान पाएंगे कि आप दरअसल में कौन हैं!

यह भी सवाल है कि — "मैं अपने आपको स्थिर नहीं कर पा रहा हूँ। जब भी ध्यान में बैठता हूं तो मन में इधर-उधर की बातें याद आती हैं।"

यह आपके साथ अकेला ही सम्बन्ध नहीं है, यह औरों के साथ भी होता है। क्योंकि यह मन है, त्रिलोक में भागता है — "कभी इधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है, कभी उधर जा रहा है।" तो इसके लिए मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ।

एक बार एक आदमी था। तो वह अपने गुरु के पास पहुंचा। उसने कहा कि "आपकी सेवा मैंने की है और मैं चाहता हूँ कि आप मेरे को कोई वरदान दें।"

गुरु महाराज जी ने कहा — ठीक है! क्या चाहते हो, क्या मांगते हो ?

कहा कि — "मेरे को ऐसा जिन्न दे दो, जो मेरी सारी इच्छाओं को पूरी कर दे। मैं चाहता हूँ कि मेरी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं।"

गुरु महाराज जी ने कहा — "ठीक है! हम जिन्न तो तुमको दे देंगे, पर एक बात याद रखना। जब भी तुम्हारे पास उस जिन्न के लिए कुछ नहीं होगा, तो वह जिन्न तुमको खाने के लिए आएगा। तो तुमको खा जाएगा, तुमको मार देगा।"

उसने कहा कि — "जी! आपको चिंता करने की जरूरत ही नहीं है। मेरी तो इतनी इच्छाएं हैं, इतनी इच्छाएं हैं, इतनी इच्छाएं हैं कि मैं उस जिन्न को पूरी तरीके से बिज़ी रखूँगा। उसको कभी मौका ही नहीं मिलेगा, आराम करने का।"

गुरु महाराज जी ने कहा — "देख ले भाई! जान ले, समझ ले नहीं तो फिर तेरे को पछताना पड़ेगा!”

उसने कहा — "नहीं! आप चिंता मत कीजिये, दे दीजिये मुझको !"

तो उसको जिन्न मिल गया। अब जिन्न आया और कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

कहा — नहीं! नहीं! अभी मेरी इच्छा है कि "तू मेरे लिए एक बड़ा सा महल बना।"

जब महल बन गया तो कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

कहा — नहीं! नहीं! मेरी इच्छा है — "तू अच्छे-अच्छे पकवान मेरे लिए तैयार कर!"

उसने पकवान तैयार कर दी तो कहा कि "मैं खाऊंगा।"

मेरे को नौकर-चाकर चाहिए, मेरे को धन चाहिए, मेरे को ये चाहिए, मेरे को वो चाहिए।

वह करता रहा, करता रहा, करता रहा, करता रहा। एक हफ्ता बीत गया और एक हफ्ते के बाद उसके पास कुछ बचा नहीं मांगने के लिए। सबकुछ, सारी उसकी इच्छाएं पूरी हो गयीं।

अब आया जिन्न कहा कि "मैं तेरे को खाऊंगा।"

तो भागा-भागा वह गया गुरु महाराज जी के पास कि "जी, अब मैं क्या करूँ ? मेरी इच्छाएं तो एक हफ्ते में ही पूरी हो गयीं और यह जिन्न मेरे को खाने के लिए आ रहा है।"

कहा, "हां! इस जिन्न को बैठकर कहो कि मेरा यह जो स्वांस अंदर आ रहा है, जा रहा है इस पर ध्यान दे!"

तो वह भी बैठ गया, जिन्न भी बैठ गया। और जो स्वांस आ रहा है, जा रहा है, उस पर जिन्न का ध्यान जाने लगा। जब जाने लगा तो मोह भी काबू में आ गया। यही बात है समझने कि —

कुंभ का बाँधा जल रहे, जल बिन कुंभ न होय,

ज्ञान का बाँधा मन रहे, गुरु बिन ज्ञान न होय।

तुम्हारे अंदर जो चीज है, जब तुम उसका अनुभव करोगे, अपने मन को उसमें एकाग्र करोगे, तब जाकर तुम्हारा मन उस चीज में लगेगा — उस जिन्न की तरह।

तो अभी काफी समय हो गया है। मुझे आशा है कि आप लोगों को, यह वीडियो जो हम बना रहे हैं, आप लोगों तक पहुंचा रहे हैं। यह आपको पसंद आ रही हैं। अगर आपको पसंद आ रही हैं तो, प्लीज हमें write कीजिए — जो अलग-अलग तरीके हैं लिखने के, वह भेजिए — जो आपको अच्छी लगीं तो, जो आपका अनुभव है उसको हमारे तक भेजिए। और प्रश्न भेजिए ताकि हम आपको इनके उत्तर दे सकें। सभी लोगों को, सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!