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"अगर कोई अभागा है, तो वह है जो भाग्यशाली होते हुए भी अपने आपको भाग्यशाली नहीं समझता क्योंकि वह सबसे पहले अपनी मुश्किलों को देखता है।" —प्रेम रावत


अधिक जानकारी के लिए, कृपया www.premrawat.com पर जाएँ श्री प्रेम रावत जी के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर सबस्काइब करें विस्तीर्ण सामग्री www.timelesstoday.tv पर उपलब्ध है इस कॉपीराइट सामग्री का पुनरुत्पादन या वितरण करना अवैध है।

साथ-साथ 5 : प्रेम रावत जी के साथ

प्रेम रावत जी: (वॉइस ओवर)

जो आप हैं, जैसे आप हैं, इस पृथ्वी पर ऐसा न कभी कोई था और न कभी कोई होगा। आप जिस प्रकार रोते हैं वह आपका रोना है। जब आप हंसते हैं तो जिस प्रकार आप हंसते हैं, वह आपका हंसना है। ये जो सिग्नेचर आ रहा है, यह फिर कभी नहीं होगा। आप जैसे बहुत हैं, पर आप जैसा कोई नहीं है।

प्रेम रावत जी:

हमारे सब श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार। मुझे आशा है आप कुशल-मंगल होंगे। और मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि यह जो जीवन मिला है यह सचमुच, आप कितने भाग्यशाली हैं कि आपको यह जीवन मिला। अब जब लोग यह शब्द सुनते हैं "भाग्यशाली" तो मेरे को एक प्रोग्राम मेरा याद आता है, जो नेपाल में हमने किया। काफी साल हो गए हैं उस प्रोग्राम को किये हुए। तो बहुत सारे लोग आए हुए थे और हम सुना रहे थे। और मैंने कहा कि, "कितने लोग हैं यहां, जो अपने आपको भाग्यशाली नहीं समझते हैं ?" तो मैं भी इस बात के लिए तैयार नहीं था कि कितने लोगों ने अपने हाथ ऊपर किए। और मैंने कहा कि "अगर कुछ ना भी हो मेरा काम यह है कि आज यहां जाने से पहले, आप अपने आपको भाग्यशाली समझें।"    

क्योंकि अगर कोई अभागा है तो वह है, जो भाग्यशाली होते हुए भी अपने आपको भाग्यशाली नहीं समझता। क्यों नहीं समझता ? क्योंकि सबसे पहले वह कौन-सी चीजों को देखता है ? अपनी समस्याओं को देखता है, अपनी मुश्किलों को देखता है। अब जब सारे, दिन-रात चिंता किस बात की है ? दिन-रात है चिंता अपनी समस्याओं की। सबेरे मनुष्य उठता है… और हिंदुस्तान में तो यह बात है कि — एक दिन एक राजा उठा अपने पलंग से, खिड़की के पास गया, खिड़की खोली और उसने देखा एक व्यक्ति नीचे खड़ा हुआ है तो दोनों की आंखें मिली और जो व्यक्ति था उसने राजा को प्रणाम किया और राजा वहां से चला गया। और वह दिन राजा का बहुत बुरा बीता, बहुत बुरा बीता। उसके पैसे भी खत्म हुए, राजा के और कई दरबारियों ने उस पर हमला बोलने की कोशिश की। उसका मतलब, सारा दिन उसका खराब गया। जब शाम का टाइम आया, तो राजा को सचमुच में बहुत गुस्सा आया कि "आज का दिन इतना खराब, इतनी मुश्किलें, इतनी मुश्किलें, इतनी मुश्किलें मेरे को झेलनी पड़ीं, जरूर इसके पीछे कोई कारण है!"

तो उसने सोचा, "हां, सबेरे जब मैं उठा था और मैंने खिड़की खोली, तो मैंने एक व्यक्ति को नीचे खड़ा देखा। तो राजा ने तुरंत सब जगह ऐलान करवाया कि वह जो व्यक्ति है वह सामने आए। तो गरीब ब्राह्मण था वो। वह आया राजा के सामने। राजा ने पूछा कि, "तुम वही व्यक्ति हो जिसकी नजर हमसे मिली आज सबेरे ?"

कहा — "हां महाराज, आपके दर्शन हुए सबेरे।"

राजा ने कहा, "ठीक है।"

अपने सिपाहियों को राजा ने संकेत किया "इसका सिर इसके धड़ से अलग कर दो। इसका सिर काट दो, इसको मार दो।"

 ब्राह्मण बोला, "महाराज, क्यों ?"

राजा ने कहा कि "जब मैं सबेरे-सबेरे उठा सबकुछ ठीक था। उसके बाद मैंने खिड़की खोली, तेरा चेहरा देखा और सारा दिन मेरा इतना खराब गया, इतना खराब गया, इतना खराब गया, इतना खराब गया कि मैं कह नहीं सकता। वह सब तेरे कारण हुआ। अगर मैं तेरा मुंह नहीं देखता, तो ये सबकुछ नहीं होता।"

ब्राह्मण बोला, "महाराज, ठीक है, आप राजा हैं। जैसा आप कहें। पर, जरा सोचिए कि मेरा दिन कैसे बीता। मेरा तो सिर मेरे धड़ से अलग होने जा रहा है। और वह सिर्फ इसलिए क्योंकि मैंने आपका चेहरा देखा। आपने मेरा चेहरा देखा, तो ठीक है आपको कुछ मुश्किलें हुईं आपके इस दिन में। परंतु मैंने आपका देखा और मैं मरने जा रहा हूं। तब राजा को समझ में आया, "अरे मैं किस चीज के पीछे पड़ा हूँ!" यह सब बकवास है। इसके पीछे नहीं पड़ना है।

तो कोई आता है, कोई कहता है कि सचमुच में तुम बहुत भाग्यशाली हो। तो लोग कहते हैं "नहीं।" क्यों नहीं ? "हमारा यह हो जाए, तब हम भाग्यशाली अपने आपको समझेंगे, जब यह हो जाए, तब समझेंगे, जब यह हो जाए, तब समझेंगे।" पर ये जितनी भी चीजें हैं, जिनके होने से तुम अपने आपको भाग्यशाली समझोगे, इन वजहों से तुम भाग्यशाली नहीं हो। तुम्हारी नौकरी में तरक्की हो जाए, इसकी वजह से तुम भाग्यशाली नहीं हो। क्योंकि जिस नौकरी में तुम तरक्की चाहते हो, एक दिन तुमको वही नौकरी छोड़नी पड़ेगी। उसे कहते हैं "रिटायरमेंट।"  

लोगों को यह है कि "अजी, हमारा लड़का नहीं हो रहा है।" लड़का चाहिए सबको हिन्दुस्तान में। और अब थोड़ा-थोड़ा बदल रहा है, कोई बात नहीं "हमारा बच्चा नहीं हो रहा है।" एक दिन तुमको भी अपने बच्चे को छोड़ना पड़ेगा। वह बच्चा नहीं रहेगा, तब वह भी बड़ा हो जाएगा और तुम भी वृद्ध हो जाओगे। और उसको छोड़ना पड़ेगा। "हमारा यह बिज़नेस रुका हुआ है।" बिज़नेस तो बिज़नेस है। कभी किसी का होता है, कभी किसी का होता है, कभी किसी का होता है।

तुम उसको अपना बनाना चाहते हो, वह तुम्हारा थोड़ी होगा। बिज़नेस का क्या है ?  

बड़े-बड़े सोचने वाले, बड़े-बड़े थिंक-टैंक वाले, बड़े-बड़े अपने कमरे में बैठ करके, सोच करके, विचार के, मीटिंग करके, यह करके, वह करके, इतना पैसा बनाएंगे, ये कर देंगे, वो कर देंगे। और एक ने यह नहीं सोचा कि ऐसी कोई वायरस आएगी, जो सबके-सबकी खड़ी कर देगी। बड़े-बड़े बिज़नेस, गए। कैसे ? क्योंकि.....भैया, इसी को माया कहते हैं। और माया के कारण तुम भाग्यशाली नहीं हो। तुम भाग्यशाली हो इसलिए कि तुमको यह मनुष्य शरीर मिला है और इसमें जो बनाने वाले की असली कृपा है — इस स्वांस  का आना-जाना, वह लगा हुआ है और क्योंकि तुम जीवित हो यह संभावना उत्पन्न होती है कि तुम अपने जीवन में आनंद को महसूस कर सको। तुम्हारा जीवन आनंद से भर सके। तुम्हारी इच्छाओं से नहीं। तुम्हारी इच्छापूर्ति के लिए नहीं, तुम्हारी इच्छापूर्ति के लिए यह जीवन तुमको नहीं मिला है। तुम्हारी इच्छापूर्ति के लिए यह जीवन तुमको नहीं मिला है। यह जीवन मिला है, यह मोक्ष का दरवाजा है। यह भवसागर को पार करने का साधन है —

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥

इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है। तो यह समझने की बात है। यह समझने की बात है। लोग तो लगे हुए हैं, "हां जी, हमारी इच्छापूर्ति होनी चाहिए।" अब कहां, कहां-कहां भागते रहोगे अपनी इच्छापूर्ति के लिए ?  कहां-कहां नहीं भागे! तुमको याद है कब से तुम्हारी इच्छाएं हैं ? कब से ? और भगवान से प्रार्थना करते थे, "भगवान मेरी यह इच्छा पूरी कर दे।" कितनी बार तुमने अपने पलंग पर बैठे-बैठे यह सोचा होगा, "भगवान आज किसी न किसी तरीके से छुट्टी कर दे, स्कूल में।" नहीं हुई। क्या करोगे ? नहीं हुई। "भगवान इस बार पास कर दे, अगले साल मैं और पढूंगा!" नहीं हुई। फेल हो गए। ये सारी चीजें, जो मनुष्य समझता है कि यह साधन है इच्छापूर्ति का। यह इच्छा पूर्ति का साधन नहीं है। कहीं नहीं कहा है कि यह इच्छापूर्ति का साधन है। बड़े-बड़े गुरु हैं, बड़े-बड़े स्वामी हैं यही लोगों को कहते है, "अच्छा, यह कर दो तो इच्छापूर्ति हो जाएगी तुम्हारी, यह कर दो तो इच्छापूर्ति......" लोगों को बहका रहे हैं। खुद तो उनकी होती नहीं है औरों के पीछे लगे हुए हैं कि उनकी इच्छा पूरी कर देंगे। और जहां देखो, कहा है क्या कि —

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो — यह भवसागर को पार करने का साधन है। इच्छापूर्ति का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। इच्छापूर्ति का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है।

मृग नाभि कुंडल बसे, मृग ढूंढ़े बन माहिं।

ऐसे घट घट ब्रह्म हैं, दुनिया जानत नाहिं।।

इच्छापूर्ति का तो सवाल ही नहीं पैदा होता है। क्या है कि —

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

सो मन तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।। 

और आखिरी में कि —

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी

तुम्हारे ही घट में है — जिस चीज की तुमको तलाश है, वह तुमसे दूर नहीं है, वह तुम्हारे पास है। इसलिए तुम भाग्यशाली हो। और तुम यह बात न भी जानो, अगर तुम यह बात न भी जानो, तब भी तुम भाग्यशाली हो। पर फ़र्क यह है तुम जानते नहीं कि तुम भाग्यशाली हो और एक व्यक्ति है जो इस बात को समझता है, उसको मालूम है कि वह भाग्यशाली है।

कहानी आती है ना वही कि एक आदमी जा रहा था, उसको एक कांच का टुकड़ा दिखाई दिया। तो वह, नीचे की तरफ उसने सोचा कि यह कांच का टुकड़ा है और किसी को लग जाएगा अच्छी बात नहीं है, अच्छा नहीं होगा। तो उसने उठा करके उसको फेंक दिया। भला ही काम किया उसने, उसको फेंक दिया। अब फेंक दिया, तो एक दूसरा आदमी आ रहा है पीछे। उसने देखा कांच का टुकड़ा नहीं है, हीरा है। उसने उठाकर अपनी जेब में रख लिया। अब जरा इन दो आदमियों के बारे में बात करते हैं। एक जो पहला वाला था, आदमी खराब है ? नहीं, आदमी अच्छा है। आदमी अच्छा है, क्योंकि वह भला चाहता है लोगों का कि इस कांच के टुकड़े से कोई घायल ना हो जाए, तो उसने उस कांच के टुकड़े को उठाकर फेंक दिया। दूसरा आता है, वह देखता है — वह देखता है तो उसको क्या दिखाई देता है ? वह कांच का टुकड़ा नहीं है, वह हीरा है। जो हीरे को काटते हैं, अभी कट नहीं किया गया है उसको, काटा नहीं गया है, पर हीरा है। और वो भी उसको उठाकर के अपनी जेब में डाल देता है। मतलब, क्या बड़ी चीज है इसमें ?   

सबसे बड़ी चीज इसमें यह है कि एक को परख है और एक को परख नहीं है। जिसको परख नहीं है, उसने तो सिर्फ एक ही काम किया कांच का टुकड़ा समझ के उसको रास्ते से उठाकर के फेंक दिया। दूसरे ने, अगर पहले वाला नहीं आता, दूसरा ही वाला आता और वह देखता कि हीरा पड़ा हुआ है तो वह भी तो उसको उठा करके अपनी जेब में डालता ताकि किसी को हानि नहीं पहुंचती। कैसे पहुंचती ? वह तो जेब में है। तो बात हानि पहुंचाने की अच्छे काम की नहीं हुई, बात है परख की। सोचिये आप, बात है परख की, जानने की।

तो सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आप जानते हैं, क्या मिला है आपको ? क्या है यह मनुष्य शरीर ? ठीक है, एक तरफ तो यह मिट्टी है, एक तरफ तो यह मिट्टी है। दो-तीन दिन पहले मैं किसी से बात कर रहा था, मैंने कहा कि "यह जो मेरी मिट्टी है यह वाली, यह साधारण मिट्टी नहीं है। यह इसलिए साधारण मिट्टी नहीं है, क्योंकि जब भी हम स्कूल जाते थे — मंडे, ट्यूजडे, वेनसडे, थर्सडे, फ्राईडे, सैटरडे, तो यह मिट्टी बनी है “बन-समोसे से।” इसमें है बन और समोसा। वो खाते थे लंच टाइम पर और शिकंजी — एक बोतल शिकंजी, गर्मियों में। तो ये हमारी जो खाल है, यह बनी हुई है बन-समोसे की। पर खैर, है यह मिट्टी। मज़ाक-मज़ाक में मैंने उससे कहा। पर है यह मिट्टी और मिट्टी में जाकर इसको मिलना है।  

तो फिर बड़ी बात क्या हुई ? वो परखने की! जानने की है, देखने की है, पहचानने की है। पहचान क्या होती है ? मां के सामने हजारों बच्चे रख दीजिए वह अपना पहचान लेगी। और बच्चे के सामने हजारों मां रख दीजिए वह अपनी पहचान लेगा, अपनी मां पहचान लेगा। बात है पहचानने की। क्या आप पहचानते हैं कि यह क्या है ? यह जो शरीर मिला है, यह क्या है ? इससे क्या संभव है ? इससे आप अपने जीवन में उस चीज का अनुभव कर सकते हैं, जो सब जगह है। जो सब जगह है। और आपके घट में भी है। उस चीज का अनुभव कर सकते हैं —

विधि हरि हर जाको ध्यान करत हैं, मुनि जन सहस अट्ठासी।

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

उसका अनुभव कर सकते हैं और उसका दर्शन करना, उसका अनुभव करना, वह एक ही व्यक्ति कर सकता है, जो सचमुच में, सचमुच में बहुत, बहुत भाग्यशाली है। है वह सबके घट में, पर वो समझने वाले बहुत कम हैं। वही वाली बात है —

गुरु बेचारा क्या करे शब्द न लगे अंग — कोई बात समझ में आती ही नहीं है। इतने पड़े हुए हैं अपनी समस्याओं के पीछे, इतने पड़े हुए हैं, दिन-रात उन्हीं का.... भजन भी किसका हो रहा है ? समस्याओं का हो रहा है। रात को उठे हैं, तो किसके बारे में सोच रहे हैं ? समस्याओं के बारे में सोच रहे हैं। तो तुम समस्याओं के अगर भक्त बन गए, तो समस्या तुम्हारी भगवान, तुम समस्या के भक्त। लगे रहो। और एक दिन वह समय आएगा कि तुमको जाना है और उस दिन क्या करोगे ? कुछ नहीं। उस दिन भी तुम रोओगे, "अभी नहीं, अभी नहीं, अभी नहीं।"  

मैं एक भजन सुन रहा था कि —

मानुष जन्म अनमोल रे माटी में न रोल रे।

अब तो मिला है फिर न मिलेगा कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं रे।

मत कर गर्व जवानी का तू है बुलबुला पानी का।

ये सारी चीजें हमारी मदद करने के लिए हैं कि हम समझ पाएं कि क्या हमको मिला है। और मैं तो यही समझता हूं कि सभी लोगों को यह देखना चाहिए, समझना चाहिए, परखना चाहिए कि आप सचमुच में कितने भाग्यशाली हैं।

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार।

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