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"जब तक हम अपने आप को नहीं समझेंगे, हम किसी और को कैसे समझ पाएंगे ? जब तक हम अपने आप को नहीं समझेंगे, तब तक हम कैसे समझ पाएंगे कि हमारे लिए इस जीवन में क्या संभावना है ?" —प्रेम रावत


अधिक जानकारी के लिए, कृपया www.premrawat.com पर जाएँ श्री प्रेम रावत जी के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर सबस्काइब करें विस्तीर्ण सामग्री www.timelesstoday.tv पर उपलब्ध है इस कॉपीराइट सामग्री का पुनरुत्पादन या वितरण करना अवैध है।

साथ-साथ: 1 हम कौन हैं!

प्रेम रावत जी: (वॉइस ओवर)

जो आप हैं, जैसे आप हैं, इस पृथ्वी पर ऐसा न कभी कोई था और न कभी कोई होगा। आप जिस प्रकार रोते हैं वह आपका रोना है। जब आप हंसते हैं तो जिस प्रकार आप हंसते हैं वह आपका हंसना है। ये जो सिग्नेचर आपका है यह फिर कभी नहीं होगा। आप जैसे बहुत हैं पर आप जैसा कोई नहीं।

प्रेम रावत जी:

हमारे सभी श्रोताओं को हमारा बहुत-बहुत नमस्कार।

आज मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूं और कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक औरत थी और उसका एक मकान था। काफी बूढ़ी हो चली थी वह और उसके मकान के आसपास उसकी एक जमीन भी थी उसमें वह कुछ जानवरों को पालती थी। तो उसके मकान में एक छोटी-सी चुहिया भी रहती थी और उस औरत को शक था कि उसके घर में कोई चूहा जरूर रहता है। तो एक दिन वह बाजार गई और उसने एक चूहे का जो पिंजरा होता है जिससे चूहे को पकड़ लेते हैं वह खरीदा और घर ले आई। तो जब चूहे ने देखा कि वह पिंजरा, बड़ा खतरनाक पिंजरा वह लाई है, तो चुहिया को बहुत घबराहट हुई। उसने सोचा कि यह कुछ ना कुछ रखेगी खाने के लिए और जब मेरे को भूख लगेगी तो मैं वो सूंघूंगी और मैं पिंजरे में जाऊंगी खाने के लिए और पकड़ी जाऊंगी। तो यह तो अच्छा नहीं हुआ।

तो वह बाहर गई चुहिया और एक मुर्गा था बाहर, तो वह मुर्गे के पास गई कि "भैया मुझे बचा लो!"

मुर्गे ने कहा "क्या बात है ? क्यों तेरे को क्या आपत्ति है ? क्या दुविधा आई है तेरे सिर पर ?"

तो चुहिया ने कहा कि "वह औरत जो है, मकान मालकिन जो है, वह एक पिंजरा लाई है चूहों को पकड़ने का और उसमें अगर वह खाना रखेगी और मेरे को भूख लगी तो मैं अगर गई खाने के लिए तो पकड़ी जाऊंगी और वह मेरे को मार देगी। मेरे को बचा लो।"

तो मुर्गे ने कहा, "तो मैं क्या करूं ? मेरे लिए तो लाई नहीं है वो। मैं तो फंसूगा नहीं उसमें। फंसना तो तेरे को ही है। यह तो तेरी समस्या है, मेरी समस्या थोड़े ही है। यह तो तेरी समस्या है, मेरी समस्या थोड़े ही है। तू संभाल, मैं नहीं संभाल सकता; मैं कुछ नहीं कर सकता तेरे लिए।"

तो निराश हो गयी चुहिया। फिर गई वह, एक बकरी उस औरत ने पाल रखी थी तो वह बकरी के पास गयी। 

बकरी से उसने कहा कि "मेरे को बचा लो!"

बकरी ने कहा "क्या बात है ?"  

कहा कि "ऐसे-ऐसे वह पिंजरा लाई है और उसमें वह खाना रखेगी और मेरे को अगर भूख लगी तो मैं फंस जाऊंगी और वह मेरे को मार देगी।"

बकरी ने कहा, "मैं तो उसमें फिट भी नहीं होउंगी। मैं तो बहुत बड़ी हूँ। मेरे को तो खतरा है नहीं, तो मैं तेरी मदद क्यों करूं ? भाई, खतरा तो तेरे को है, मेरे को थोड़े ही है, मैं काहे के लिए तेरी मदद करूँ।"

तो जब बहुत ही निराश हो गई वह, तो कुछ दिनों के बाद फिर वह गधे के पास गयी। गधे से उसने कहा "तुम तो बहुत बड़े हो, बलवान हो मेरी मदद करो।"

गधे ने कहा "क्या बात है ?"

कहा कि "ऐसे-ऐसे वह पिंजरा लाई है और मेरे को पकड़ेगी और मेरे को मार देगी।"

तो गधे ने कहा कि "मैं क्या करूँ ? मैं तेरे लिए सिर्फ एक प्रार्थना कर सकता हूँ भगवान से कि तेरे को बचाये और मैं क्या करूँ! मेरे लिए तो वो लाई नहीं है। मैं तो उसमें फिट भी नहीं होऊंगा। मेरे को तो कोई दिक्कत है नहीं। यह तो तेरी समस्या है, तू संभाल। मैं क्यों संभालूं!"

खैर! चुहिया सचमुच में बहुत ही निराश हो गई कि कोई उसके लिए, कोई बचाने वाला नहीं है। 

एक दिन क्या हुआ कि एक सांप उधर से गुजर रहा था और वह उस पिंजरे में जाकर फँस गया। अब फँस गया तो सांप ने वहां से चलने की कोशिश की तो आवाज आने लगी। रात का समय था, बहुत अंधेरा था, तो जो औरत है उसने जब आवाज सुनी तो उसने सोचा कि चूहा फँस गया। वह बाहर आयी अपने कमरे से। बाहर आई और वह टटोलने लगी और सांप ने उस औरत को डस लिया। जब सांप ने डस लिया तो वह चिल्लाई और उसका पड़ोसी आया, तो पड़ोसी आया तो उसने देखा कि यह हो रखा है कि उसको सांप ने डस लिया है। तो वह उसको अस्पताल ले गया। अब अस्पताल ले गया, वहां उसका इलाज हुआ तो ज्यादा गंभीर तरीके से नहीं काटा था सांप ने, तो थोड़े दिन के बाद वह घर आई। जब घर आई तो डॉक्टर ने कहा "इसको घर ले जाओ, ये वहां आराम कर लेगी।"

जब घर आई वह, तो बिल भी आया अस्पताल से। बिल तो आता ही है अस्पताल से, तो बिल आया अस्पताल से, तो उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे। तो पैसे न होने के कारण जो मुर्गा था उसको बेच दिया गया और किसने खरीदा उस मुर्गे को ? कसाई ने खरीदा। और उससे भी उसका जो बिल था वह पूरा नहीं हुआ, जो अस्पताल को देना था उसने पैसा। तो जो बकरी थी उसको भी बेच दिया गया, उसको भी कसाई ने खरीदा। चुहिया अभी मरी नहीं है। मुर्गा और बकरी जिन्होंने कहा कि “ये उसकी समस्या नहीं है।” कारण तो वही है, परंतु उनको कसाई को बेच दिया गया। अब जो कुछ भी था उसका बिल वो पूरा किया, औरत आराम करने लगी। कुछ दिन बीते पर उसकी हालत अच्छी नहीं हुई। कुछ दिनों के बाद वह औरत मर गई। मर गई तो उसके सारे परिवार के लोग आए, उसका अंतिम-संस्कार करने के लिए। अब जब वो सब आए तो उनके खाने का प्रबंध करना था ये सबकुछ करना था, तो उसके लिए काफी पैसे की जरूरत थी। तो वो कहां से पैसा लाएं ? उसके पास तो थे नहीं, तो जो गधा था उसको बेच दिया गया और उससे जो पैसे मिले उससे उसका अंतिम-संस्कार, खाना-पीना लोगों का जो कुछ भी करना था वो हुआ। पर जिसने उस गधे को खरीदा वह बहुत ही अत्याचारी था। और खूब — उसको मालूम था कि वह खूब काम करवाएगा उस गधे से। पीटेगा उसको, मारेगा उसको।

तो यह हुआ। अब इसमें है क्या कि अगर वह सचमुच में उस छोटी-सी चुहिया की मदद कर देते, उस छोटी-सी चुहिया की मदद कर देते, तो वह सांप उसमें नहीं फंसता और अगर जो सांप उसमें फंसा वह नहीं फंसता, तो कोई उस औरत को नहीं डसता और अगर औरत को नहीं डसता, तो न तो मुर्गा, न बकरी और न गधे को, जो कुछ भी उनके साथ था वह खोना नहीं पड़ता। तो मैंने आपको यह कहानी क्यों सुनाई ?

इसका मतलब — इसका मतलब है कि कई बार हम यह समझते हैं कि जो हमारे साथ हो रहा है, वह हमारे साथ हो रहा है या कोई किसी के साथ कुछ हो रहा है वह हमारी समस्या नहीं है। परंतु जबतक हम इस संसार के अंदर हैं तो हमको यह देखना है कि जो औरों के साथ हो रहा है, वह हमारे साथ भी हो सकता है। जो औरों के साथ हो रहा है, वह हमारे साथ भी हो सकता है। जो अत्याचार हम औरों की तरफ देखते हैं, वह हमारे साथ भी हो सकता है। तो सबसे बड़ी बात यह बन जाती है कि हम अपने में क्या कर सकते हैं! और क्या कर सकते हैं ? हम अपने को जानने की कोशिश करें। अपने आपको समझने की कोशिश करें कि हम कौन हैं। क्या हमको यह जो मनुष्य शरीर मिला है, जो कुछ भी हमारे सामने है इसका हमारे लिए महत्व क्या है ? क्या हम इसमें से निचोड़ सकते हैं! क्या हम इसमें से पा सकते हैं! किस तरीके से हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है! दुखी होना, दुख में लगे रहना, चिंता करना, चिंता में लगे रहना, दिन-रात एक ही बात "अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा, अब क्या होगा" या इस जिंदगी के अंदर इससे भी बढ़कर कोई चीज है!

लोग कहते हैं कि "भाई जो तुम भोग रहे हो इस जीवन में यह तुम्हारे पिछले कर्मों का फल है। मानते हैं लोग, बहुत मानते हैं। परन्तु वो समझाने वाले ये नहीं समझाते हैं कि हमने किया क्या! क्या किया पिछले जन्म में कि ये जो चिंता हैं, जो बोझ हैं हमारे ऊपर यह हम भोग रहे हैं उन कर्मों की वजह से, तो वो कर्म क्या थे ताकि हम उनको आगे ना करें! जबतक हम अपने आपको नहीं समझेंगे, हम किसी और को कैसे समझ पाएंगे। जबतक हम अपने आपको नहीं समझेंगे, तबतक हम यह कैसे समझ पाएंगे कि हमारे लिए इस जीवन में क्या संभावना है, क्या संभव है! अगर हम लगे रहेंगे — भोग रहे हैं, भोग रहे हैं, भोग रहे हैं, भोग रहे हैं और यह कभी ख्याल नहीं आ रहा है कि "क्या यह इस जीवन का लक्ष्य है ?"  क्योंकि संत-महात्माओं ने जो कहा है, वो यह नहीं कहा है, वो यह कहा है कि “यह जो मनुष्य शरीर तुमको मिला है, यह मोक्ष का दरवाजा है।”

बड़े भाग्य पाइये — यह मनुष्य शरीर जो मिला है, बड़े भाग्य से मिला है और यह मोक्ष का दरवाजा है। और अगर यह सचमुच में मोक्ष का दरवाजा है, तो क्या हम — क्योंकि मोक्ष भी, इसकी भी, यह भी बहुत बड़ी बात है। एक यह मोक्ष है कि हम फिर — हमारा यहां आना-जाना न रहे इससे हमको मोक्ष मिले। पर एक छोटा-सा मोक्ष जिसकी हमको जरूरत है कि हमको अपनी चिंताओं से मुक्ति मिले। हमको अपने दुखों से मुक्ति मिले। वह भी तो मोक्ष है। तो जबतक हम उस चीज को सोचेंगे नहीं, जबतक उस चीज को हम समझेंगे नहीं तबतक आगे जाएंगे कैसे, आगे बढ़ेंगे कैसे ? और तभी यह संभव है। क्योंकि सारी चीजें जो हमारे सामने इस समय हैं "यह मुसीबत है, यह मुसीबत है, अब क्या होगा, यह क्या होगा, यह क्या होगा” इन सारी चीजों को लेकर के जो आज हो रही हैं लोग डरेंगे। और मैं लोगों से यही कहता हूं कि डरने से कुछ नहीं होगा, डरने से कोई चीज कम नहीं होगी, समझना जरूरी है। यह भी, जो है, यह भी बीतेगा। यह भी बीतेगा। परन्तु वो जो चिंताएं हैं, वो जो मुसीबतें हैं, जो आती रहती हैं, आती रहती हैं, आती रहती हैं, आती रहती हैं और मनुष्य परेशान होता रहता है उससे मोक्ष कैसे मिले ?

उससे मोक्ष मिलने के लिए आपको अपने आपको समझना बहुत जरूरी है। आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते हैं! चाहे इन चिंताओं से आपको मोक्ष मिल सकता है या नहीं मिलेगा, यह सब आपके ऊपर निर्भर है — डर पर नहीं, आप पर निर्भर है। और हर एक चीज, हर एक चीज से मिली हुई है, जुड़ी हुई है — हर एक चीज। वही जो मैंने पहले कहा जो गड़बड़ और लोगों के साथ होती है हम तो देखते हैं — यह है, यह है — हमारे साथ नहीं होगी! क्यों नहीं हो सकती ? जब उनके साथ हो गयी, हमारे साथ भी हो जायेगी। परन्तु जबतक हम इसमें से अपने आपको किसी तरीके से उभारेंगे नहीं, ऊपर नहीं लायेंगे और इस भवसागर में डूबते ही रहेंगे, डूबते ही रहेंगे, डूबते ही रहेंगे, डूबते ही रहेंगे। भवसागर की जब बात आती है तो यह नहीं है तुम भवसागर में जाकर तैरो या भवसागर में जाकर तुम आनंद लो। ना! यह कहा है कि भवसागर को, इसको पार करना है — इसको पार करना है, यहां रहना नहीं है। इस भवसागर में रहना नहीं है।  

तो हम समझें इस बात को और कुछ ऐसा हो गया है कि हम इस भवसागर में अटके हुए हैं। जहां देखते हैं भवसागर है, भवसागर है, भवसागर है, भवसागर है, भवसागर है। क्या है भवसागर ? जो चिंताएं, जिनमें हम डूबे हुए हैं जो सच नहीं हैं, पर सच लगती हैं। उनमें हम डूबे हुए हैं और उसी में डूब रहे हैं। भवसागर की बहुत ही व्याख्यान हो सकती हैं, परन्तु एक तो यह व्याख्या जरूर होगी कि यह असली नहीं है, माया है। सत्य नहीं है, असत्य है और असत्य में हम डूब रहे हैं। और जबतक हम अपने आपको नहीं समझेंगे तबतक इस असत्य में डूबते रहेंगे, बाहर नहीं निकलेंगे।

तो सबसे बड़ी बात यह मैं कहना चाहता था आपसे कि डर से नहीं, जो अंदर से शक्ति है उससे, समझ से, हम इस चीज का सामना करें। जो हमारे अंदर असली ताकत है उससे हम इस चीज का सामना करें। और अगर उस शक्ति से, जो सचमुच में मनुष्य की अंदर की शक्ति है उससे अगर हम सामना करेंगे तो जीत भी हमारी होगी। यह मैं कहना चाहता था।  

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

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