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प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (1 July, 2020)
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1320
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zUIvX2SR7UA
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"डरने से कुछ नहीं होता। हिम्मत से—और हिम्मत ऐसे ख्यालों से नहीं बननी चाहिए, कि 'क्या होगा!' पर उन चीज़ों से बननी चाहिए जो तुम्हारी अपनी शक्ति है। जो अंदर की शक्ति है।" — प्रेम रावत


प्रेम रावत जी "पीस एजुकेशन प्रोग्राम" कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे। 

प्रेम रावत जी:

हमारे सभी श्रोताओं को हमारा नमस्कार। काफी समय हो गया है। और धीरे-धीरे स्थिति भी बदल रही है। भारत में जो लॉकडाउन था, वह धीरे-धीरे खुल रहा है। जैसे-जैसे खुल रहा है, वैसे-वैसे यह बीमारी जो है, महामारी जो है यह और बढ़ रही है। क्योंकि जो लोग अब तक घर में बैठे हुए थे, अब वो इधर-उधर जा रहे हैं। तो जैसे-जैसे यह लॉकडाउन खुलेगा, वैसे-वैसे यह महामारी और बाहर आएगी।

पर सबसे बड़ी बात इस महामारी की नहीं है, इस बीमारी की नहीं है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आप जीवित हैं और आपके अंदर ये जो उपहार हैं, बनाने वाले ने जो आपके जीवन में ये उपहार दिये हैं — और किन उपहारों की बात कर रहा हूं मैं ? बीमारी की नहीं, चिंताओं की नहीं, जो आपके अंदर एक चीज है, जो शांति है, वह आपके अंदर है, बाहर किसी पेड़ पर नहीं है वह, वह आपके अंदर है। बनाने वाले ने वह भी आपको आपके अंदर दिए हैं। ये जो चीजें हैं, जो आपके अंदर हैं जबतक आप इनको अपने जीवन में स्वीकार नहीं करेंगे, जबतक इनको देखना नहीं शुरू करेंगे तब तक इन सारे चक्करों में आप पड़े रहेंगें और परेशान होंगें। बात है परेशान होने की। क्योंकि सबसे बड़ी बात इसमें बीमारी की नहीं है, इस कोविड-19 में सबसे बड़ी बात है इसमें लोग परेशान हो रहे हैं। घर में बैठे हैं तो परेशान हो रहे हैं, बाहर जाते हैं तो परेशान हो रहे हैं, सब परेशान हो रहे हैं।

नेता लोग लगे हुए हैं "कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ कह रहा है" और सब जगह यही हो रहा है। परन्तु बात इसकी नहीं है। इन सारी चीजों के बीच में — इन सारी चीजों के बीच में मुझे लगता है कि मनुष्य है, एक मनुष्य, चाहे वह अमीर हो; चाहे वह गरीब हो, फंसा हुआ है बेचारा क्या करे! यह तो है नहीं कि कोई मरना चाहता है, जीना चाहता है मनुष्य। एक तरफ यह बीमारी है, एक तरफ गरीबी है, एक तरफ समस्याएं हैं, क्या होगा; क्या नहीं होगा! अब इसमें सब आ गए — बड़े-बड़े देश, अमेरिका आ गया, इंग्लैंड आ गया, फ्रांस आ गया, स्पेन आ गया, ऑस्ट्रेलिया आ गया, हिन्दुस्तान आ गया। बड़े-बड़े देश इसमें आ गए हैं — रूस आ गया, चीन आ गया और यहीं सबकुछ हो रहा था। उससे पहले क्या था ? "पैसा बनाओ, पैसा बनाओ, कैसे पैसा बनाएंगे, यह करेंगे, वह करेंगे, इसको पैसा चाहिए, उसको पैसा चाहिए, यह कर जाएगा, यह कर जाएगा, यह हो गया, यह हो गया।" फिर धीरे, धीरे, धीरे करके यह वायरस चालू हुई, यह बीमारी चालू हुई। फिर वो पैसे-वैसे का चक्कर खत्म। अखबार में सारी की सारी खबरें बदलना शुरू हो गयीं। अब उन चीजों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा था जो पहले बात हो रही थी, "यह कर दो, वह कर दो, ऐसा कर दो, वैसा कर दो।"

अब हिन्दुस्तान में भी देखिए आप, जैसे-जैसे खुल रहा है यह बीमारी और बढ़ रही है। परन्तु यह तो कहना पड़ेगा हिन्दुस्तान के बारे में कि जो डेथ है, डेथ रेट है हिन्दुस्तान में वह बहुत कम है। यह तो बहुत सराहनीय बात है कि हिन्दुस्तान में ये डेथ रेट — क्योंकि वहां तो इतने लोग हैं, संसार की पॉपुलेशन जो है वह नंबर टू हिन्दुस्तान में है। तो ये हिन्दुस्तान ने किया, यह तो बहुत सराहनीय बात है। परन्तु उससे भी ज्यादा बड़ी बात वह तब हो कि लोग यह जानें, यह समझें कि उनका जो जीवन है वह क्या है, जो मौका मिला है, जो जीने का मौका मिला है। क्योंकि एक तरफ डर है। अब यह बात मैं डर की नहीं कह रहा हूँ, बात डर की नहीं है। बात है समझने की, बात है जानने की, बात है अनुभव करने की। मनुष्य अपने जीवन के अंदर उस बात का अनुभव करे, जो असली सच्चाई है। यह नहीं है कि इधर लगे हुए हैं, उधर लगे हुए हैं, यह हो रहा है, वह हो रहा है। नहीं, बात उस चीज की है कि असलियत क्या है ?

तो असलियत क्या है ? असलियत अगर बाहर देखे मनुष्य तो यह समझेगा कि ये जो बड़े-बड़े शहर हैं, सड़कें हैं, बड़े-बड़े साइन लगे हुए हैं, बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हुई हैं — यही सब कुछ असली है। यह असली नहीं है। एक समय था पृथ्वी थी, परन्तु ये कोई चीजें नहीं थीं। एक समय था कि मनुष्य भी था, पर ये चीजें नहीं थीं।

अब हिन्दुस्तान में जब 1957 में हमारा जन्म हुआ, वह एक ऐसा समय था कि और तो सब जगह काफी प्रोग्रेस हो रही थी — और तो सब जगह काफी प्रोग्रेस हो रही थी — जापान में, अमेरिका में, परंतु हिन्दुस्तान में ज्यादा प्रोग्रेस नहीं थी। अमेरिका में, जापान में, इन देशों में लोगों के पास रेफ्रिजरेटर हो गए थे, एयर कंडीशन हो गए थे, ये सारी चीजें — और ये सारी चीजें, ऑटोमेटिक फोन हो गए थे, परन्तु ये सारी चीजें उस समय कम से कम जहां हम थे, देहरादून में — वहां ये चीजें उपलब्ध नहीं थीं। और मेरे को याद है जब रेफ्रिजरेटर घर में आया, तो जब रेफ्रिजरेटर घर में आया — तो बात यह थी कि इसको रखे कहां ? मतलब, यह काहे के लिए आया है, यह किसी को मालूम नहीं था। होना चाहिए तो मंगवा लिया, खरीदवा लिया। परन्तु इसका करें क्या ?     

तो जहाँ किचन था, वहां भी इसको नहीं रखा, रेफ्रिजरेटर को। आजकल तो रेफ्रिजरेटर किचन में ही रखते हैं लोग। परन्तु उस समय किचन में भी नहीं रखा। तो उसको मेन हाउस में, मेन घर में उसको रखा और खाली पड़ा रहता था वह। तो किसी ने कहा, “कम से कम इसमें आप पानी रख दीजिये, ठंडा पानी मिल जायेगा आपको।” मतलब, यह भी नहीं मालूम था कि इसमें फल-फूल — अब इतनी महंगी चीज, इसमें फल रखेंगे; ये चीज रखने की थोड़ी ही है ? और दूध ताजा-ताजा आता था। अब दूध रेफ्रिजरेटर में रखेंगें इसका तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। उस समय की बात है जब उसको खोलते थे, तो उसमें बत्ती जलती थी। तो मेरे को हमेशा यह लगा रहता था कि यह बत्ती हमेशा जलती रहती है या तभी जलती है जब दरवाजा खुलता है। तो मैं अंदर बैठ गया और बंद कर ली और मेरे को पता लग गया कि जैसे ही दरवाजा बंद होता है, बत्ती भी बंद हो जाती है। और यह तो खुशकिस्मती की बात है कि कोई आया और उसने दरवाजा खोल दिया, नहीं तो मैं चला जाता।    

पर ये सारी चीजें उस समय नहीं थीं। आज सब जगह हैं हिन्दुस्तान में। परन्तु ये सारी चीजें जो आप देख रहे हैं, ये सारा चक्कर जो आप देख रहे हैं यह एक समय नहीं था। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें नहीं थीं। धीरे-धीरे करके ये सारी प्रगति हुई है। आज इस छोटी-सी वायरस की वजह से जिसको आंखों से देखा भी नहीं जा सकता, सारे लोग परेशान हैं, क्या करें ? परेशानी से पहले क्या ? घमंड, सबको घमंड — "हमने यह कर दिया, हमने वह कर दिया, हमने यह हासिल कर लिया, हमने यह बना दिया, हम वह बना देंगे, हम वह बना देंगे, हम ये कर देंगे, हम वो कर देंगें।" और सब "लगे हुए थे, लगे हुए थे, लगे हुए थे, लगे हुए थे, लगे हुए थे…, कुछ न कुछ करने में लगे हुए थे, हम इसका आविष्कार कर देंगे, हम ये कर देंगे, हम वो कर देंगें।"     

मैं हमेशा ही लोगों के पास एक ही बात ले जाता था कि "भाई, तुम अपनी जिंदगी के बारे में भी सोच रहे हो या नहीं ?" या तब सोचोगे जब यमदूत आ जायेगा लेने के लिए। क्योंकि उस समय तो फिर लोगों को इन सारी चीजों से कोई मतलब नहीं रहता उस समय तो यह मतलब हो जाता है कि "मैं कैसे जीयूं ?" एक-एक स्वांस के लिए मोहताज़ हो जाते हैं लोग। तो मैं लोगों को समझाता हूँ कि "भाई, अगर तुमको सचमुच में संतुलन बनाना है अपनी जिंदगी के अंदर, तो उसके बारे में भी सोचो, जो तुमको आज मिल रहा है, जो तुम्हारे अंदर आ रहा है, जा रहा है, इसके बारे में भी तुम सोचो।"

तो अब बात मेरा, क्योंकि मैं यही कहना चाहता हूं सबसे कि घबराने की बात नहीं है। जो कुछ भी थोड़ा-बहुत आपको इसके बारे में विशेष ध्यान देना है वह यही है कि "आप ऐसी जगह मत जाएं जहां लोग इसका पालन नहीं कर रहे हैं और जहां जायें, मास्क पहनकर जाएं, अपने हाथ धोएं और इस बात का ख्याल रखें कि किसी को देना नहीं है, किसी से लेना नहीं है।" तो इसमें सब ठीक है। परंतु ये चीज तो इस समय बहुत जरूरी है और यह भी जरूरी है कि हमारे अंदर वह जो चीज है उससे भी हम अपने संपर्क में रहें। क्योंकि यह जो जादू है इस स्वांस का आना-जाना, तुम्हारा जिंदा होना, तुम्हारे अंदर शांति का होना, तुम्हारे अंदर — "है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी।" तो वह जो चीज है, जो हृदय चाहता है, मन को तो — मन को तो कोई भी यह कह सकता है "तेरे को यह चाहिए, तेरे को यह चाहिए, तेरे को यह चाहिए, तेरे को यह चाहिए।" और हृदय को क्या चाहिए ? हृदय को बस एक ही चीज चाहिए कि वह उस परमानंद के आनंद में लीन रहे। क्योंकि तब मनुष्य का असली संतुलन बनता है। घबराने की बात नहीं है, डरने की बात नहीं है, डरने से कुछ नहीं होता। बात है उस हिम्मत से और वह हिम्मत कोई ऐसे ख्यालों से नहीं बननी चाहिए कि क्या होगा। पर वह उन चीजों से बननी चाहिए जो तुम्हारी अपनी शक्ति है, जो अंदर की शक्ति है, उन चीजों से। वह शक्ति, जैसे मैंने पहले भी भगवान राम के बारे में कहा।     

क्या हुआ उनके साथ, क्या हुआ उनके साथ ? तो बात यह नहीं है कि उनको कहा गया कि "तुम जाओ, चौदह वर्ष के लिए वनवास जाओ।" खुशी तो उनको उस दिन हुई होगी कि "उठेंगें आज राज्याभिषेक होगा।” तो भगवान राम यह भी तो कर सकते थे कि अपना एक हाथ ऐसे हिलाया और सबकुछ बदल दिया। उधर कोई सोच ही नहीं रहा है वनवास जाने की। और यह भी वह कर सकते थे कि जब चले गए वनवास, तो हाथ ऐसे हिलाया और पूरा राजमहल वहां बना हुआ है। ये नहीं किया। जो भी उनके कपड़े थे, उनको त्याग करके जो लकड़ी के बार्क से (बाहर की जो होती है लकड़ी में, पेड़ों में) उनसे बने हुए जो वस्त्र थे, वो धारण किए। और कहां गए ? उन्हीं जंगलों में गए जिन जंगलों में वह पहले जा चुके थे — राक्षसों को मारने के लिए जा चुके थे। उन्हीं जंगलों में वह गए और आप यह सोचिए कि एक दुश्मन नहीं, दो दुश्मन नहीं, कितने उन्होंने दुश्मन बनाए होंगे और उन्हीं जंगलों में वह जाते हैं।  

अब सेना नहीं है। अब कुछ नहीं है। अब है सिर्फ कौन — लक्ष्मण, राम और सीता। सीता उनको बचाना है, उनकी रक्षा करनी है। लक्ष्मण है साथ में, भगवान राम हैं। जहां तक भगवान राम का सवाल है वह ये है कि उनको रक्षा करनी है लक्ष्मण की भी और सीता की भी। क्योंकि प्रेम जो है उनको लक्ष्मण से वह इजाज़त नहीं देगा, अगर कुछ हो जाए लक्ष्मण को और कुछ हो जाए सीता को। जहां तक सीता की बात है, जो कुछ भी दुख है वह सहने के लिए तैयार हैं, बस यह होना चाहिए कि उनका साथ भगवान राम के साथ हो, जो उनके पति हैं। जहां तक लक्ष्मण की बात है तो राम उनके स्वामी हैं; स्वामी की रक्षा करनी है, सीता की रक्षा करनी है, भाभी हैं वह, उनकी रक्षा करनी है। यह तीनों के साथ है।

फिर होता क्या है ? वही जिसके बारे में सोचा नहीं जा सकता। रावण आता है; सीता को ले जाता है। अब क्या करें, अब क्या करें ? कैसी सेना बनाएं ? तो सेना बनाई। कैसी सेना बनाई ? बंदरों की और भालुओं की सेना। वहां लंका में जो सेना है, वहां उनके पास तरह-तरह के हथियार हैं, उनके पास तरह-तरह के सिपाही हैं, उनके पास सबकुछ है। और यहां क्या सेना बना रखी है, भालुओं की और बंदरों की। और उससे क्या करेंगे ? चढ़ाई करेंगें। समुद्र को पार करने के लिए नौका भी नहीं है, समुद्र को पार करने के लिए नौका भी नहीं है तो पत्थरों को तैराया जा रहा है, उसका पुल बनाया जा रहा है। पुल बनाने का साधन भी उनके पास नहीं है, पुल बनाया जा रहा है, पत्थरों को तैराया जा रहा है और उससे अपनी सेना को वहां ले जायेंगें।

और छोटा-मोटा युद्ध नहीं, यह नहीं है कि वह हिन्दुस्तान के तट पर रहकर के रावण को ललकार रहे हैं। नहीं! उसी के द्वीप में जा करके उनको ललकार रहे हैं कि — "आजा!" और लड़ रहे हैं। यह होती है शक्ति। और यह बात — मेरे कहने का मतलब है कि ठीक है, वह अवतार थे, परंतु उन्होंने कभी अपना हाथ हिलाकर यह नहीं किया कि "मैं अवतार हूं, तो मैंने यह कर दिया।" ना! मनुष्य के नाते; मनुष्य की तरह। यहां तक कि जब वह कई बार निराश हो गए, तब ऋषि-मुनियों ने ही उनको कहा कि "आप भूल चुके हैं कि आप विष्णु के अवतार हैं और इसकी चिंता मत कीजिए आप, सब ठीक हो जाएगा।" 

मतलब, एक कहानी ही नहीं है, एक चीज है यह देखने के लिए कि जब कुछ नहीं है तब भी वह लड़ाई जीती जा सकती है। वह लड़ाई जीती जा सकती है। अगर अंदर हिम्मत है तो कोई भी लड़ाई मनुष्य जीत सकता है। पर लड़ाई ऐसी नहीं कि किसी बुरे समझ से हो। ना! ऐसी लड़ाई जो सचमुच में सही लड़ाई है, वह मनुष्य जीत सकता है। अपने जीवन के अंदर, दूसरों की नहीं, अपने से। क्योंकि वो जो बुरे ख्याल हैं, वही रावण है उसके ही दस सिर हैं। जो नासमझ है, जो अज्ञानता है, उससे बड़ा रावण क्या मिलेगा आपको! सीता यह आपकी शांति है, यह आपका सुख है और इसी को वह रावण ले जाता है। अज्ञानता उस सीता को ले जाती है। तो हां, उस सीता को वापस लाने के लिए लड़ाई अगर लड़नी है, तो वह लड़ाई मनुष्य लड़ सकता है। वह जान सकता है; पहचान सकता है।

मैं संक्षेप में यही बात कहना चाहता था। आनंद से रहें; खुश रहो। जो कुछ भी हो रहा है, हो रहा है पर खुश रहो, खुश रहो। और अब धीरे-धीरे, जैसे-जैसे सबकुछ खुल रहा है, तो हम अपना टूर बनाने में लगे हुए हैं। हमको आशा है कि हिन्दुस्तान भी आने का मौका मिलेगा, तो बड़ा अच्छा रहेगा। जैसा भी होगा, जो कुछ भी होगा वह देखना पड़ेगा जब समय आएगा। तो तब तक हम वीडियो आपको बनाकर भेजते रहेंगे धीरे-धीरे। आप देखिये; आनंद में रहिये और खुश रहिए — और आपके अंदर जिनको ज्ञान है, उस ज्ञान का पूरा-पूरा फायदा उठाएं और आनंद में रहें।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!