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लॉकडाउन 48 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित ( 12 मई, 2020)
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अगर आप अपने आपको नहीं जानते हैं तो ये समझिए कि आपके पास नक्शा है, कहाँ जाना है वो तो आपको मालूम है, पर आप कहां हैं उस नक्शे में, ये मालूम होना बहुत जरूरी!" —प्रेम रावत


प्रेम रावत जी "पीस एजुकेशन प्रोग्राम" कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे। 

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ऐंकर : आज मेरा सौभाग्य है कि इस कार्यक्रम में मैं शांतिदूत, लेखक और मानवतावादी श्री प्रेम रावत जी का स्वागत करने जा रही हूं और साथ ही साथ उनसे बातचीत करने का मौका मिला है।

आपको बता दें कि प्रेम रावत जी ने अपना पूरा जीवन मनुष्यों के जीवन में सुख-शांति लाने के लिए समर्पित किया है। प्रेम रावत जी हमारे साथ हैं। आपका बहुत-बहुत स्वागत है। नमस्कार।

प्रेम रावत जी : आपको भी नमस्कार। आपके श्रोताओं को भी नमस्कार।

ऐंकर : तो ये आपको हजारों लोग, लाखों लोग सुनने आते हैं और आप उनको शांति का, प्रेम का, मानवता का संदेश दे रहे हैं। क्या कुछ ऐसे उदाहरण आप हमारे सामने रख सकते हैं कि आपकी बात से, आपकी सोच के कारण कई लोगों के जीवन में बदलाव आया ?

प्रेम रावत जी : देखिए! मैं अपनी प्रशंसा अपने मुंह से नहीं करना चाहता हूं। पर मैं आपको एक बात बताता हूं, जो मैंने देखा है कि बहुत सारे जेलों में हमारे वीडियोज़ जाते हैं और ‘पीस एजुकेशन प्रोग्राम’ एक हमारा है, जो कि जेलों में दिखाया जाता है।

ऐंकर : अच्छा!

प्रेम रावत जी : अब ये क्यों ?

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : हम धर्म की बात नहीं करते हैं। हम कर्म की बात नहीं करते हैं। हम विचारने की बात करते हैं, क्योंकि एक बार आप सोचें, फिर क्या करना है, ये आप अपने जीवन में निर्णय ले सकेंगे और सही निर्णय ले सकेंगे। अब अगर उसको देखा जाए, जेलों को देखा जाए कि वो भी एक रणभूमि है, जिसमें लोग अंदर — क्योंकि उन्होंने कुछ गलत किया, उसकी वजह से वो बंद हैं। अब उनके जीवन में आशा कहां से आयेगी ? क्योंकि अगर एक दिन वो निकलेंगे बाहर और फिर सोसाइटी में आएंगे तो वो किस तरीके से आएंगे ? और क्या फिर वो दुबारा दोहराएंगे उन्हीं गलतियों को और फिर वापस जाएंगे ?

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : और विदेश में कई जगह — हिन्दुस्तान में भी यही होता है। लोग जेल से बाहर निकलते हैं और दोष तो वो सभी को दे रहे हैं। अपने को तो देते नहीं हैं, सभी को दे रहे हैं। अपने को तो देखते नहीं हैं, सभी को देख रहे हैं। "उसकी वजह से मैं जेल गया। उसकी वजह से मैं जेल गया।"

जेल से बाहर निकलते हैं और उसके बाद फिर गलत करते हैं...

ऐंकर : फिर और बदला लेने की प्रवृत्ति।

प्रेम रावत जी : और फिर वापिस जाते हैं।

ऐंकर : जी, जी!

प्रेम रावत जी : तो यूनिवर्सिटी ऑफ सैन एन्टोनियो, टेक्सस में एक डिपार्टमेन्ट है, जो मॉनिटर करता है कि ये जो प्रोग्राम, जितने भी जेलों में आ रहे हैं, ये कितने सक्सेसफुल हैं।

ऐंकर : जी, जी, जी!

प्रेम रावत जी : तो उनकी स्टडी में ये आया कि यह जो प्रोग्राम है, जो हमारा प्रोग्राम है — "पीस एजुकेशन प्रोग्राम", यह सबसे सक्सेसफुल है।

ऐंकर : क्या बात है!

प्रेम रावत जी : जो लोग इस प्रोग्राम को देखते हैं, उसमें से सबसे कम लोग जेल में वापिस आते हैं।

ऐंकर : वापिस आते हैं। मतलब, एक सकारात्मक परिवर्तन...

प्रेम रावत जी : बिलकुल।

ऐंकर : ...उनकी सोच में, उनके जीवन-शैली में!

प्रेम रावत जी : हां!

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : तो जब उनके जीवन के अंदर परिवर्तन हो सकता है और वो शांति का अनुभव जेल के अंदर रहते हुए कर सकते हैं...

ऐंकर : जी, जी, जी! बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : तो आप, ये ज़रा सोचिए कि जो लोग स्वतंत्र हैं, उनके जीवन में कितना और बड़ा परिवर्तन आ सकता है! और वो परिवर्तन, जो परिवर्तन स्वाभाविक है। मतलब, मैं नहीं कह रहा हूं कि तुमको मनुष्य नहीं होना चाहिए।

ऐंकर : हां, हां, हां!

प्रेम रावत जी : मैं नहीं कह रहा हूं कि तुम 110 प्रतिशत अपने जीवन में चीजों को दो। ना, ना, ना, ना, ना! मैं कह रहा हूं कि तुम मनुष्य हो! सबसे पहले तुम जो हो, उसको जानो, उसको सीखो!

ऐंकर : बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : क्योंकि तुम्हारी जो सक्सेस है, वहां से शुरू होती है।

ऐंकर : बिल्कुल सही बात है। मतलब, अपने अंदर की जो भावना है, मानवता का जो संदेश आप देते हैं, खुद मनुष्य होने का जो एक हमें गर्व है, वो मनुष्यता को हम बनाएं रखें।

प्रेम रावत जी : बिल्कुल!

ऐंकर : प्रेम जी! एक और सवाल मेरे जे़हन में आ रहा है कि आप पिछले 51 वर्षों से भी अधिक समय से लोगों के बीच शांति का संदेश पहुंचा रहे हैं। जबकि हम सभी जानते हैं कि हमारे आस-पास का जो वातावरण है, उसमें हिंसा है, अज्ञानता है — अहिंसा कहीं है, लेकिन अधिकतर जगह पर हिंसा देखने में आता है। तो कैसे आप अपने इस मिशन को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, इसमें सफलता हासिल कर रहे हैं जबकि हम देखते हैं अगर इसके मार्ग को, तो भारी बाधाएं दिखाई पड़ती हैं ?

प्रेम रावत जी : बाधाएं तो हैं, पर देखिए! ये जो कुछ भी इस संसार के अंदर हो रहा है — लड़ाइयां हो रही हैं। जो कुछ भी हो रहा है, ये बनाया हुआ किसका है ? मैं उदाहरण देता हूं कि पपीता तो बम बनाता नहीं है।

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : आम का पेड़ तो बम बनाता नहीं है।

ऐंकर : बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : आम का पेड़ बंदूक नहीं बनाता है। कोई कोयल कहीं से आके, बैठकर के कभी ये नहीं कहती है कि उसके साथ लड़ाई करो, उसके साथ लड़ाई करो! चक्कर ये है कि हम ये नहीं देखते हैं कि ये जो कुछ भी हो रहा है इस संसार में, ये सब मनुष्य का बनाया हुआ है। रोड भी मनुष्य की बनाई हुई है, कार भी मनुष्य की बनाई हुई है, ट्रैफिक जाम भी मनुष्य का बनाया हुआ है और ट्रैफिक जाम को कोसने वाला भी मनुष्य है।

ऐंकर : जी, बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : ये सब मनुष्य की लीला है। एक तो भगवान की लीला की बात होती है। ये मनुष्य की लीला है। पॉल्यूशन होता है, प्रदूषण होता है, उससे लोग बीमार होते हैं, परंतु ये प्रदूषण बनाया हुआ किसका है ? ये भी मनुष्य का बनाया हुआ है। और इस प्रदूषण से जो दुःखी होता है, वो कौन होता है ? वो भी मनुष्य ही होता है।

भगवान ने तो — प्रकृति ने तो साफ पानी बनाया और उसको गंदा करने वाला कौन है ? वो भी मनुष्य है। और फिर गंदे पानी को पीने के बाद जो उसकी दशा होती है, उससे जो उसको दुःख होता है, वो भी मनुष्य ही है। तो ये सारा साइकल जो है, इसको समझना है, क्योंकि ये सब मनुष्य का ही बनाया हुआ है। और इसको तोड़ा जा सकता है क्योंकि ये मनुष्य का बनाया हुआ है। अब लोग समझते हैं कि ये भगवान की देन है। ना! ये भगवान की देन नहीं है।

ऐंकर : मतलब, प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं तो वो भगवान की देन है।

प्रेम रावत जी : भगवान ने जो बनाया है, वो मनुष्य की भलाई के लिए बनाया है।

ऐंकर : जी, बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : अगर नहीं बनाया होता तो मनुष्य इस पृथ्वी पर जी नहीं सकता। जैसे चन्द्रमा पर नहीं जी सकता है, जैसे सूरज पर नहीं जी सकता है, उसी प्रकार वो मनुष्य, इस पृथ्वी पर नहीं जी सकता। परंतु इस प्रकृति ने उन सब चीजों का प्रबंध किया है। पानी का प्रबंध किया है, भोजन का प्रबंध किया है, हवा का प्रबंध किया है। और गरमी चाहिए मनुष्य को, नहीं तो हाइपोथर्मिया हो जाएगा। उसका भी प्रबंध किया है। सब चीजों का प्रबंध है। इसीलिए मनुष्य इस पृथ्वी के ऊपर जीवित है। परंतु उसी को बिगाड़ने में लगा हुआ है और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है।

ऐंकर : बिल्कुल! तो इन सबसे मतलब, कैसे आप निकल पाते हैं ? लोगों को क्या समझाते हैं ? आप लोगों को क्या दे रहे हैं कि कैसे हम करें, ताकि हम जो ये शांति का मिशन लेकर चलें हैं, वो अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे ? कैसे इसका तोड़ निकाल रहे हैं आप?

प्रेम रावत जी : चार बातें हैं मूल में।

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : एक तो आप अपने आपको जानो! अगर आप अपने आपको नहीं जानते हैं तो ये समझिए कि आपके पास नक्शा है, जहां जाना है वो जगह आपको मालूम है, पर आप कहां हैं उस नक्शे में, ये आपको नहीं मालूम। अगर ये नहीं मालूम है कि आप कहां हैं, तो जहां जाना है, वहां तक कैसे पहुंचेंगे ? कौन-सा मार्ग लेंगे ? कब दायें मुड़ेंगे ? कब बायें मुड़ेंगे ? ये बहुत जरूरी है मालूम होना कि आप उस नक्शे पर कहां हैं! तो पहले, अपने आपको जानो!

ऐंकर : बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : और दूसरी चीज कि जब आप अपने जीवन के अंदर उस परमानन्द के आनंद को महसूस करें तो आपका हृदय आभार से भरेगा। आपके जीवन में आभार होना बहुत जरूरी है।

ऐंकर : जी, बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : आभार होना चाहिए। अगर नहीं है आभार — अब जैसे लालच है। सारी दुनिया को लालच खाए जा रहा है।

ऐंकर : बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : पर जो लालच नाम का जो रोग है, उसकी एक दवाई है।

ऐंकर : जरूर! आप बताइए उसको।

प्रेम रावत जी : और वो दवाई है — किसी चीज को इन्जॉय करना। उसका आनंद लेना। क्योंकि जो लालची है, वो किसी चीज का आनंद नहीं ले सकता।

ऐंकर : अच्छा ?

प्रेम रावत जी : आनंद अगर लेने लगेगा वो, तो जैसे होता है न — अगर कोई चीज आपको पसंद आई, जैसे अगर रेडियो पर ही कोई गाना चल रहा है, आपको पसंद आया तो क्या करेंगे आप ? उस रेडियो का वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

ऐंकर : बढ़ा देते हैं।

प्रेम रावत जी : बढ़ा देते हैं, ताकि और लोग भी सुनें। अगर आप खाना बना रहे हैं और कोई ऐसा पदार्थ आपने बनाया, जो कि आपको बहुत अच्छा लगा तो आप क्या कहेंगे ? ‘‘आओ! चखो!’’

ऐंकर : चखो! जी, जी! बिल्कुल!

प्रेम रावत जी : ये स्वयं बात है। और जहां मनुष्य अपने जीवन का आनंद लेने लगे तो वो लालच नहीं रहेगा। तो एक तो अपने आपको जानो! एक, आपके जीवन में आभार होना चाहिए। और ये बहुत जरूरी बातें हैं। और एक ये कि एक तो आवाज दुनिया की जो है, बाहर की आवाज है। और वो आपके कानों तक आ रही है। आप उस आवाज से बच सकते हैं। कानों में इयर-प्लग लगा सकते हैं या कोई ऐसी जगह चले गए, जहां वो आवाज न हो। परंतु आपके कानों के बीच में जो आवाज है, उसके लिए कौन-सा इयर-प्लग लगाएंगे ?

ऐंकर : बिल्कुल! उससे कैसे बचेंगे ?

प्रेम रावत जी : उससे कैसे बचेंगे ? उससे बचना है। क्योंकि वो आवाज, आपकी आवाज नहीं है। जो कुछ भी आपको सिखाया गया है, वो आवाज है।

और वो कहती है, ‘‘तुम ऐसा करो! तुम वैसा करो!’’

क्यों करो ? ये किसी को नहीं मालूम। पर करो।

ऐंकर : कई बार जो बहुत लालची हो जाते हैं, उनके बीच रहते हुए भी — जिनके पास कुछ नहीं होता है, तो क्या उनकी ये प्रवृत्ति जो है, वो यही कारण है उसका ? यही वजह है उसकी ?

प्रेम रावत जी : यही जब लालच होने लगता है क्योंकि आदमी कहता है, ‘‘मेरे को चाहिए, मेरे को चाहिए, मेरे को चाहिए, मेरे को चाहिए।’’ और कभी भी खुश नहीं है। जितना भी उसके पास है, उसका वो आनंद नहीं उठा सकता। क्योंकि वो उसके लिए हमेशा कम है। उसको और चाहिए। यही तो लालच है!

ऐंकर : यही लालच है!

प्रेम रावत जी : यही लालच है कि और चाहिए! और चाहिए! और मिलता है, फिर और चाहिए। फिर और मिलता है, फिर और चाहिए। और ऐसे मनुष्य रह जाता है, इसी लालच में। परंतु उसका आनंद लेना, वो नहीं जानता है। अपने जीवन का आनंद लेना मनुष्य नहीं जानता है। सबेरे-सबेरे उठता है और चिंता में पड़ता है, ‘‘मैं लेट हो गया, मैं लेट हो गया, मैं लेट हो गया।’’

ऐंकर : सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक।

प्रेम रावत जी : चिंता, चिंता, चिंता, चिंता, चिंता, और आगे कैसे बढ़ूं, और आगे कैसे बढ़ूं ? और जो है, जो तुमको मिला हुआ है, तुम्हारे अंदर स्वांस आ रही है, जा रही है, जिसका कोई मोल नहीं है। अनमोल है! जिसको आप किसी को बेच नहीं सकते हैं। अगर हम अपनी स्वांस को बेच सकते तो करोड़पति, जो इस संसार में हैं, वो स्वांस खरीदने के लिए आ जाते और इस संसार में गरीब कोई नहीं रहता।

ऐंकर : बिल्कुल, बिल्कुल! सही बात आप बोल रहे हैं।

प्रेम रावत जी : परंतु हम बेच नहीं सकते हैं। यह एक ऐसी चीज है, इतनी प्राइसलेस है, अनमोल है, परंतु उसको नहीं जानते हैं। है! फिर भी नहीं जानते हैं।

ऐंकर : बिल्कुल! और आज के समय में हमारी युवा पीढ़ी भी इस शांति से दूर होती जा रही है। अशांति का दौर-सा आ गया है। आपको क्या लगता है कि जीवन में ऐसा क्या है, जो मनुष्य खोता जा रहा है ?

प्रेम रावत जी : अपने आपको! अपने आपको खोता जा रहा है। और जब से ये खोता जा रहा है मनुष्य अपने आपको, तब से ये समझ नहीं पा रहा है कि मैं क्या हूं ? मैं कौन हूं ? इसीलिए मैं कहता हूं, पहले अपने आपको जानो! और अपने जीवन के अंदर आभार प्रकट करो! और तीसरी चीज, जो आवाज है तुम्हारे कानों के बीच में...

ऐंकर : अपने अंदर की आवाज ?

प्रेम रावत जी : कानों के बीच में।

ऐंकर : कानों के बीच की आवाज!

प्रेम रावत जी : ‘‘तू लेट हो गयी, ये हो गया, वो हो गया, अब नहीं होगा, तू पास नहीं होगी, ये नहीं होगा, वो नहीं’’ — ये सारी जो आवाज गरजती रहती है — ‘‘तू गया’’!

ऐंकर : हां, हां, हां!

प्रेम रावत जी : ये कहां से आयी ? और ये हर दिन मनुष्य को डिस्ट्रॉय कर रही है, खत्म कर रही है और उसको अपने से ही दूर ले जा रही है। परंतु इसका कोई इलाज नहीं है लोगों के पास। पर इसका इलाज है।

ऐंकर : जी!

प्रेम रावत जी : अपने अंदर जो हृदय में स्थित बात है, उसको सुनो! वो कहती है कि तुम शांति में हो और अपने जीवन का पूरा-पूरा लाभ उठाओ! और चौथी चीज जो है, जो मैं लोगों से कहता हूं कि अगर तुम जिंदगी के अंदर फेल भी हो गये तो फेलियर को कभी मत एक्सेप्ट करो!

ऐंकर : कई लोग निराश हो जाते हैं।

प्रेम रावत जी : हां! एक तो फेल होना और एक उस फेलियर को एक्सेप्ट करना, उस फेलियर को लेना। वो कभी नहीं होना चाहिए। क्योंकि जब हम बच्चे थे तो हम चलने की कोशिश करते थे और कई बार फेल होते थे। क्योंकि खड़े हुए और फिर गिर गये।

ऐंकर : फिर गिर गये।

प्रेम रावत जी : पर कभी निराश नहीं हुए। फिर उठे और फिर चल दिये। परंतु आज क्या होता है कि अगर थोड़ी भी हमको ये भनक पड़ जाए कि हम हो सकता है कि पास न हों या सक्सेसफुल न हों, तो पहले ही उसको छोड़ देते हैं।

ऐंकर : कई लोग तो आजकल आत्महत्या तक कर रहे हैं। बच्चे बहुत छोटी उम्र में हताश, निराश होकर।

प्रेम रावत जी : बिल्कुल! यही तो कारण है। यही तो कारण है। पर ये कभी अपने जीवन के अंदर फेलियर को नहीं एक्सेप्ट करना चाहिए।

ऐंकर : बस, एक और सवाल जो मेरे ज़ेहन में आ रहा है, वो है कि दूसरों के — जो भी आपका संदेश हमने सुना, मैंने भी सुना अभी, तो दूसरों के अंदर दया का, प्रेम का जो संदेश आप पहुंचाना चाहते हैं, वो बहुत जरूरी है। और आप क्या समझते हैं कि ये जो दोनों गुण हैं, वो कितना जरूरी है हमारे लिए ?

प्रेम रावत जी : बहुत ही जरूरी है। इसीलिए जो-जो चीज — देखिए! हमारे अंदर गुस्सा भी है और दया भी है। दोनों ही हैं। हमारे अंदर ज्ञान भी है और अज्ञान भी है। और हमारे अंदर दया है, पर उसको हम उभरने का मौका नहीं देते हैं।

ऐंकर : नहीं देते हैं।

प्रेम रावत जी : ‘‘अपने आपको जानो’’ — इसलिए जरूरी है, ताकि आपको पता लगे कि आपके अंदर दया की खान है।

ऐंकर : ...जिसको हम पहचान नहीं पा रहे हैं।

प्रेम रावत जी : जिसको — क्योंकि खुद को नहीं जानते हैं, क्या है ? ‘‘मैं कौन हूं’’, नहीं जानते हैं। जब नहीं जानते हैं तो ये नहीं मालूम कि मेरे पास क्या-क्या है ? मेरे औजार क्या हैं ? इस लड़ाई को लड़ने के लिए, जो मैं अपने जीवन की लड़ाई को समझ रहा हूं, मेरे पास पहले ही क्या-क्या औजार हैं ?

क्योंकि लोग तो ये है कि ‘‘नहीं, हमको तो सरेंडर कर देना चाहिए। हमको तो पहले ही — हमारे पास कुछ नहीं है लड़ने के लिए।’’ हैं! आपके पास ज्ञान है लड़ने के लिए। आपके पास इस अंधेरे को दूर करने के लिए आपके हृदय के अंदर प्रकाश है। जो कुछ भी आपको चाहिए, वो आपके अंदर है। परंतु अगर आप अपने को नहीं जानते हैं तो आपको नहीं मालूम कि आपके पास क्या-क्या है!

ऐंकर : बहुत अच्छी बात आपने बताई कि सबसे बड़ी बात है कि खुद को जानना बहुत जरूरी है। हमारे अंदर की क्या क्वालिटीज़ हैं, क्या गुण हैं, उसको जानकर ही अपने जीवन में हमें आगे कदम बढ़ाते रहना चाहिए। तो बहुत अच्छी जानकारी आपने दी है। फिर से एक बार हम आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं। नमस्कार!

प्रेम रावत जी : नमस्कार!