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लॉकडाउन 44 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित ( 8 मई, 2020)
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"आज के मनुष्य की जरूरतें क्या हैं और उसकी चाहतें क्या है ? इसमें वो फर्क नहीं देख रहा है। वो अपनी चाहतों को अपनी जरूरतें समझ रहा है। और इस पृथ्वी पर हमारा जन्म इसीलिए मुनासिब हुआ, क्योंकि जिन चीज़ों की हमको सख्त जरूरत है, वो सब उपलब्ध हैं।" —प्रेम रावत


प्रेम रावत जी "पीस एजुकेशन प्रोग्राम" कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे। 

संवाद : पी.टी.सी. न्यूज के साथ

ऐंकर : एक पंजाबी में ये कहावत है — "पेट ना देइयां रोटियां, त सबे गलां खोटियां।" इसका मतलब यह है कि आपके पास खाना नहीं है, आपके पास रोजगार नहीं है, आपके पास एजुकेशन नहीं है, आपके पास घर नहीं है तो आप जितनी मर्जी शांति की बातें, पीस की बातें, प्यार-मोहब्बत की बातें करो, वो उसको बेमायने सी लगेंगी। क्योंकि जो मुझे चाहिए — आज मुझे भूख लगी है, मुझे रोटी चाहिए। अगर मेरे को बोलो कि तुम शांत रहो, अंदर से शांत हो जाओ, वो कैसे हो सकता है ? How is it possible?

प्रेम रावत जी : देखिए! कुछ चीजें हैं, जो शरीर की जरूरत है। जो शरीर की जरूरत है। एक तो है स्वांस। बिना हवा के आप ज्यादा मिनटों में यहां से चल बसेंगे। खाने की जरूरत है, पानी की जरूरत है, गर्मी की जरूरत है — ये तो हैं जरूरतें। और इन जरूरतों को पूरा होना बहुत जरूरी है। परंतु एक और जरूरत है। अब मैं जरूरत की बात कर रहा हूं, अपने सपनों की बात नहीं कर रहा हूं। क्योंकि अगर आपके पास — अगर आप एक रेगिस्तान में खो गए और आपको प्यास लगी है। प्यास तो लगेगी! पानी की आपको जरूरत है। और आपके पास सोने की घड़ी है। तो वह सोने की घड़ी करेगी क्या ? वह तो पानी देने से रही! तो जो जरूरतें हैं मनुष्य की, वह पूरी होनी चाहिए।

परंतु मनुष्य — आज का जो मनुष्य है, उसकी जरूरतें क्या हैं और उसकी चाहत क्या है ? इसमें वो फर्क नहीं देख रहा है। वो अपनी चाहतों को अपनी जरूरत समझ रहा है। परंतु जो चाहत हैं, वो पूरी हों या न हों, जीवित रहने के लिए वो चीजें, जो बिल्कुल जरूरी हैं, वो चाहिए। और इस पृथ्वी पर हमारा जन्म इसीलिए मुनासिब हुआ, क्योंकि वो जो चीजें, जिनकी हमको सख्त जरूरत है, वो सब उपलब्ध हैं।

ऐंकर : हूं! शांति का पैमाना क्या है ? मतलब, for example, हम कहते हैं न कि यह बंदा बहुत शांत स्वभाव का है। मौन रहना या आप चुपकर के बैठे हो, किसी की बात सुन रहे हो। उसके अंदर जो खलबली मच रही है, वह कोई नहीं देख रहा, "यह बंदा बहुत शांत स्वभाव का है।"

मतलब, वह अंदर से मर रहा है, कुछ भी हो रहा है उसको। शक्ल से लगता है कि ‘‘यह तो बंदा बहुत गऊ है जी! यह तो बहुत शांत है।’’ वह पैमाना कौन सेट करता है या क्या पैमाना है वो ?

प्रेम रावत जी : ये समाज ने सेट किया है। ये मनुष्य सेट करेगा तब, जब वो अपनी तरफ देखना शुरू करेगा। जब मनुष्य अपने आपको ही नहीं जानता है तो फिर वो इन्हीं चीजों की तरफ जाएगा कि "ये ज्यादा बोलता नहीं है। बड़ा शांत प्रवृत्ति का आदमी है!"

पर उसके मन में क्या हो रहा है ? उसके मन में क्या चल रहा है ? वहां होती है न अशांति! क्योंकि जब अंदर सब — उसको मालूम है! उसको मालूम है कि क्या उसकी चाहतें हैं, क्या पूरी नहीं हुईं हैं ? और वह ये बता नहीं पा रहा है कि चाहत क्या है और जरूरत क्या है कि मैं क्या चाहता हूं अपनी जिंदगी में ?

मैं चाहता हूं कि मेरी जिंदगी में सुकून हो। मेरी जिंदगी में चैन हो! मैं — जो मेरे अंदर चीज है — जिसके लिए कहा —

मृग नाभि कुंडल बसे, मृग ढूंढ़े बन माहिं।

ऐसे घट घट ब्रह्म हैं, दुनिया जानत नाहिं।।

तो मेरे अंदर वो जो चीज बैठी है, जो इस स्वांस को चला रही है, उसको मैं जानना चाहता हूं। उसको मैं समझना चाहता हूं। क्योंकि अगर मैं उसको समझूंगा, उसको जानूंगा तो मुझे सचमुच में सुकून आएगा। अब इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे को — मेरी जरूरतें पूरी नहीं होनी चाहिए। वो तो होनी चाहिए।

ऐंकर : बिल्कुल ठीक है!

प्रेम रावत जी : चाहत बदलती रहती है।

मन के बहुतक रंग हैं, छिन छिन बदले सोय।

एक ही रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय।।

तो मन तो कभी इधर भागता है, कभी इधर भागता है। इसीलिए तो हमारे घर में इतनी सारी चीजें पड़ी हुई हैं और जिनको हम चाहते भी नहीं हैं, वो भी पड़ी हुई हैं।

ऐंकर : वो भी पड़ी हैं!

प्रेम रावत जी : क्योंकि एक समय था, "नहीं, नहीं! ये बड़ा अच्छा रहेगा, ये बड़ा अच्छा रहेगा, बड़ा अच्छा रहेगा", और अब उनसे चाहत खत्म हो गई।

तो ये तो हुआ खिलौना। बच्चा बाजार में जाता है, अपनी मां के साथ जाता है। खिलौनों को देखता है, खिलौनों की तरफ आकर्षित होता है। परंतु उसको खिलौने चाहिए या मां चाहिए ? मां है........

ऐंकर : तो खिलौना अच्छा लग रहा है।

प्रेम रावत जी : .........तो खिलौना ठीक है। मां हटा दो, तो रोने लगेगा, खिलौना भी काम नहीं करेगा। तो ये मनुष्य ने जो बाहर खिलौने बना रखे हैं, जिनके पीछे वो आज भाग रहा है। यह भी नहीं समझ रहा है कि मैं कहां हूं, किधर जाऊं, क्या करूं ? सपने बढ़ रहे हैं और उन्हीं के पीछे वो लगा हुआ है।

ऐंकर : अक्सर ये भी देखने और सुनने में मिलता है। आमतौर पर यह बात बोली जाती है कि यह अभी young है। इसकी बड़ी उम्र है। इसके अंदर बहुत बुलबुले हैं। अभी इससे शांति की बात मत करो। एक उम्र का पड़ाव आएगा, जब यह शांत हो जाएगा। मगर जिंदगी का तज़ुर्बा मेरा भी 14-15 साल हो गए मीडिया में, आज भी 80 साल के बुजुर्ग के अंदर भी शांति नहीं मैंने देखी कभी। तो ये उम्र का तकाज़ा और अंदर शांति लेकर आना और ये पदार्थवादी चीजें — Materialism से, इनका कोई लेना-देना होता है ?

प्रेम रावत जी : देखिए! जवान हैं, बुड्ढा है। अगर किसी के पैर के नीचे ऐसी कोई तारीख लिखी हुई है कि उसने इस दिन जाना है तो उस हिसाब से उसको जवान कहा जा सकता है।

ऐंकर : वो प्लान कर ले अपना फिर।

प्रेम रावत जी : फिर वो अपना प्लानिंग कर ले! तो किसके पैर के ऊपर या पैर के नीचे वो तारीख लिखी हुई है ? तो जवान क्या हुआ ? जब कोई लड़का है 18 साल का है, किसी वजह से चले गया। सब लोगों को दुःख होता है। ‘‘वो तो बहुत जवान था!’’

भाई! बात ये है कि इसी चीज के बारे में, महाभारत में भी यही बात हुई कि जब युधिष्ठिर — उनको प्यास लगी। युधिष्ठिर ने भेजा तो नकुल गया, सहदेव गया। फिर उसके बाद भीम गया। उसके बाद अर्जुन गया। ये सब गए।

तो युधिष्ठिर ने पूछा अपने से कि "कहां गए वो लोग ? पानी अब तक लेकर नहीं आए ?"

प्यास से बहुत व्याकुल हो रहा था वह पानी के बिना। तो जब वह गया तो उसने देखा कि वहां एक तालाब है और उसमें बड़ा अच्छा पानी है। और सारे उसके भाई मरे पड़े हैं। तब युधिष्ठिर पानी की तरफ गया पहले। उसको इतनी प्यास लगी थी कि पानी की तरफ गया पहले। तो जैसे ही वह पानी को छूने लगा तो उसका जो देवता था उस तालाब का, वह बाहर निकला।

उसने कहा कि "पानी को हाथ मत लगा। तू अगर यह पानी पीएगा तो मर जाएगा। तेरा यही हाल होगा, जो तेरे भाइयों के साथ हुआ है। पहले मेरे प्रश्नों का जवाब दे।"

तो उसने खूब सारे प्रश्न पूछे। पर एक प्रश्न उसने पूछा युधिष्ठिर से कि "सबसे विचित्र चीज क्या है ?"

युधिष्ठिर जवाब देता है, "सबसे विचित्र चीज है कि मनुष्य को मालूम है कि एक दिन उसको जाना है, पर वो जीता ऐसे है, जैसे कभी मरेगा नहीं। यही सबसे बड़ा चक्कर है।"

जो चीज — अगर आप हवाई जहाज में बैठे हैं, आराम से बैठे हैं, सबकुछ ठीक है। और हवाई जहाज अपनी मंजिल पर जाकर उतर जाता है तो आप उसमें बैठे रहेंगे ?

ऐंकर : उतरेंगे।

प्रेम रावत जी : पर मनुष्य के साथ यही चक्कर है। वो बैठना चाहता है। अब उसको निकालने — कहा जा रहा है कि "भाई! चलो यहां से, तुमको जहां पहुंचना है, तुम पहुंच गए।"

तो जहां तक कोई वृद्ध हो, कोई जवान हो, इसका जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है।

ऐंकर : जो यूथ है आज का, उसमें पोटेंशियल है, वो एग्रेसिव भी है, उसके पास स्किल्स भी हैं, मगर कुछ कारणों की वजह से न उसके पास जॉब है, न उसके पास कुछ ढंग का घर-बार है, तो उसको आप कैसे कह पाएंगे कि आप अभी भी शांत रहो ?

प्रेम रावत जी : शांति का मतलब यह नहीं हुआ कि वह एक बैंगन का भरता बन जाए या सरसों का साग बन जाए। बस पड़ा है तो जहां पड़ा हुआ है। जिनके पास शांति है, उनके पास भी वो डाइनैमिक्स है। वो भी उत्साह से इस जीवन को जी सकते हैं। जो जवान हैं, वो चाहते हैं ये सबकुछ उनकी जिंदगी में हो, परंतु उनकी असली शक्ति — ताकि ये सबकुछ संभव हो सके — तभी आएगी, जब वो अंदर से शांत हों। क्योंकि देखिए! जब कोई भी दुःख आता है हमारे जीवन में तो वह ऐलान करके नहीं आता है।

ऐंकर : बिल्कुल ठीक!

प्रेम रावत जी : हम जब उसको expect ही नहीं कर रहे होते हैं, तब आ जाता है।

ऐंकर : तब आ जाता है।

प्रेम रावत जी : तो उसके लिए क्या चाहिए ? उसके लिए चाहिए — अंदर से शक्ति! जिसके पास अंदर से शक्ति नहीं है, वो हिल जाता है। जब उसके सपने पूरे नहीं होते हैं, वो हिल जाता है।

अब आप enthusiasm की बात कर रहे हैं, जवानों की बात कर रहे हैं और ये अखबार में भी आता है कि उस जवान ने अपनी जान ले ली। क्या हुआ ?

जिस परिस्थिति से वो हिला, वह अंदर तक हिल गया। तो अगर अंदर तक हिल गया तो इसका मतलब है कि अंदर की जो शक्ति है, उसके पास नहीं थी और वो होनी चाहिए।

ऐंकर : मैंने कहीं पढ़ा है कि आप सुधार-घर, जो जेल होती हैं, वहां पर भी जाते हैं। कैदियों के साथ भी आप विचार-विमर्श करते हैं। तो आमतौर पर भी आप seminars वगैरह लगाते हैं। क्या फर्क आपको दिखता है ? क्योंकि वो आपसे बात भी करते होंगे, communication भी होता है। जो अंदर लोग हैं उनमें और जो बाहर लोग हैं उनमें — अंदर की परिस्थिति का क्या अंतर है ?

प्रेम रावत जी : देखिए जी! बड़ी गलतफहमी है कि जो लोग बाहर हैं, वो समझते हैं कि वो स्वतंत्र हैं.....

ऐंकर : मैंने इसीलिए सवाल ये पूछा।

प्रेम रावत जी : ....बहुत ही बड़ी गलतफहमी है। क्योंकि बात यह है कि अगर हमारे घर में, बाहर जाली नहीं लगी हुई है ढंग की तो, हम सो नहीं सकेंगे रात को कि कोई चोर आ जाएगा। बस, इतनी बात है.......

ऐंकर : अंदर वाले को तो पता ही नहीं, कौन आ गया ?

प्रेम रावत जी : हां! उनके पास तो गार्ड भी हैं। मैं तो कहता हूं उनसे कि तुम्हारे पास तो गार्ड भी हैं, तुम्हारे पास तो जाली भी है। तुम्हारे पास प्रोटेक्शन है।

पर वो खुश क्यों नहीं हैं ? वो भी खुश नहीं हैं और जो बाहर वाले हैं, वो भी खुश नहीं हैं। वो समझ रहे हैं कि —

‘‘हम जेल में हैं, ये कितनी बुरी बात है!’’

और जो बाहर वाले हैं, वो समझ रहे हैं कि ‘‘मेरे पास ये नहीं है, ये नहीं है, ये नहीं है, ये कितनी बुरी बात है!’’ और बात यह है कि जब कोई जेल में जाता है, किसी वजह से कुछ हुआ, कोई हादसा हुआ उसके साथ, जेल में जाता है। तो वह पुलिस को blame करता है। दोष पुलिस ने — अगर पुलिस नहीं होती तो मैं यहां नहीं होता। वह अपने दोस्तों को दोष देता है, अपने परिवार को दोष देता है, जज को दोष देता है, गवर्नमेंट को दोष देता है। परंतु अपने से वह कुछ नहीं कहता है।

ऐंकर : बिल्कुल ठीक।

प्रेम रावत जी : और जब मैं जाता हूं और उनको सुनाता हूं कि तुम अपने बारे में जानो! और जब वो जानते हैं — जब जानने लगते हैं अपने बारे में, तब उनको सही में अहसास आता है कि —

‘‘नहीं, ये उनका दोष नहीं है, ये मैंने किया। और सबसे बड़ी बात कि जब मैंने किया तो मैं तो अपने आपको बदल सकता हूं। मैं गवर्नमेंट को नहीं बदल सकता, मैं पुलिस वालों को नहीं बदल सकता, मैं जज को नहीं बदल सकता। पर मैं अपने आपको बदल सकता हूं।’’

और जिस दिन ये होता है, उस दिन उनकी सारी — जो समय वहां पर है — सारी कहानी उनकी बदलने लगती है। अपने आपको जानने लगते हैं। और यही हालत बाहर वालों की भी है कि ‘‘ये हो, तब अच्छा होगा। ये हो, तब अच्छा होगा। ये हो, तब अच्छा होगा।’’

ऐंकर : उसके पास है, मेरे पास नहीं है ये। वो इसलिए अच्छा है।

प्रेम रावत जी : तो जिस दिन उनको पता लगने लगता है कि ‘‘नहीं, मैं, मैं कौन हूं ?’’ यही नहीं मालूम कि मैं कौन हूं ?

अभी मैं सुना रहा था कि किसी से पूछा जाए कि तुम कहां से आए ? कहां जाओगे ? तुम हो कौन ? और अगर तीनों प्रश्नों का जवाब मिले, ‘‘पता नहीं, मैं कहां से आया! पता नहीं, मैं कहां जा रहा हूं! और पता नहीं, मैं हूं कौन!’’

तो हम तो सोचेंगे, ‘‘ये पागल है।’’

परंतु हमारे साथ भी तो यही हो रहा है ?

‘‘कहां से आए?’’ किसी को नहीं मालूम।

‘‘कहां जाएंगे ?’’ किसी को नहीं मालूम।

‘‘कौन हो ?’’ ये भी नहीं मालूम।

तो इसलिए ये बहुत जरूरी है कि हम अपने आपको जानें! और ये है शांति की सबसे पहली सीढ़ी। जो शांति की पहली सीढ़ी है, वो यहां से शुरू होती है।

ऐंकर : ठीक है! बिल्कुल ठीक है! एक आखिरी question! मैं थोड़ा-सा पर्सनल आपसे पूछूंगा। ये हमारे समाज की एक प्रवृत्ति बन गई है कि कोई भी बंदा कुछ अच्छा काम कर रहा है या कोई noble cause कर रहा है तो दिमाग automatically पूछने लगता है — ‘‘ये प्रेम रावत जी क्यों ऐसा कर रहे हैं ? ये प्रेम रावत जी शांति के दूत क्यों बने हुए हैं ?’’

ऐसा phenomena हमारे दिमाग में जरूर आता है। इसके पीछे उनकी क्या मंशा हो सकती है ? मैं डाइरेक्ट आपसे पूछ लेता हूं।

प्रेम रावत जी : बात यह है कि जब मैं छोटा था तो मैंने देखा कि लोग, जो उनके जीवन में असली चीज थी — असली चीज, जिसके लिए कहा है कि —

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल।

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भए कंगाल।।

तो मैं देख रहा था कि सारा संसार कंगाल हो रहा है, परंतु उसके अंदर की जो गठरी है, वो कोई नहीं खोल रहा है। मैं आपको एक बात बताऊं। जब मैं लोगों को यह बात सुनाता हूं, उन लोगों को मेरी बात समझ में आती है। उनके मुंह में मुस्कान आती है, उनको होंठों पर मुस्कान आती है।

ऐंकर : इससे अच्छी कमाई कोई हो नहीं सकती।

प्रेम रावत जी : तो उससे आपको जो मिलता है न! आपको जो मिलता है, वो एक ऐसा उपहार है कि पूछिए मत! और ये मैं करता रहूंगा। जबतक ये स्वांस मेरे अंदर आ रहा है, जा रहा है, मैं करता रहूंगा।

ऐंकर : हूं! जिंदगी का कोई गोल, जहां पर लगे कि बस! अब ठीक है ?

प्रेम रावत जी : नहीं। जबतक आनंद है, तबतक आनंद है। उसके बाद...

ऐंकर : हमारा भी कोई पता नहीं।

प्रेम रावत जी : किसी का नहीं पता।

ऐंकर : बहुत-बहुत धन्यवाद प्रेम रावत जी! हमसे बातचीत करने के लिए।