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लॉकडाउन 41 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित ( 5 मई, 2020)
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"हर सिक्के के दो हिस्से होते हैं। अगर मनुष्य के अंदर बुराइयां हैं, उस हर एक बुराई के लिए उसके अंदर अच्छाई भी है। अगर जीवन में अंधेरा है, तो उजाला दूर नहीं है।" —प्रेम रावत


यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

Anchor Meenal: It is “Drive Pune” with Meenal and I’m your music jockey, MJ Meenal--and I’m going to be in conversation with the global Ambassador for Peace, Mr. Prem Rawat.

Prem Rawat: Thank you, Thank you for having me and my regards to your listeners.

Meenal: It's my honour to have you on the show today and you are the global Ambassador for Peace. Can you tell me what peace means to you?

ऐंकर मीनल : प्रेम जी! मुझे बताइए! एक इंसान अपनी जिंदगी में पीस कैसे प्राप्त कर सकता है ?

प्रेम रावत जी : सबसे बड़ी बात यही है कि हम जब शांति के बारे में सोचते हैं तो हम यही सोचते हैं कि कहीं और से आएगी हमको प्राप्त करना है।

ऐंकर मीनल : जी!

प्रेम रावत जी : सबसे बड़ी बात तो यह है और यही लोगों को बड़ी अचम्भे की बात भी लगती है, जब मैं लोगों से ये कहता हूं कि शांति तो पहले से ही आपके अंदर है। आपको कहीं खोजने की जरूरत नहीं है। आपको अपने आपको पहचानने की जरूरत है कि आप हैं कौन ?

‘‘सॉक्रटीज़ ने कहा था कि — Know thyself.’’ आज उसका मायने क्या है ?

आज मनुष्य हर एक चीज को जानने की कोशिश करता है, पर अपने आपको जानने की कोशिश नहीं कर रहा है। उसके सर्कल में बहुत सारे फ्रैण्ड्स हैं, ट्विटर में हैं, फेसबुक में हैं, व्हाट्सअप में हैं, परंतु उसमें क्या ऐसा भी कुछ है कि जिसमें वो इन्क्लुडेड है ? और अपने आपको समझने की कोशिश कर रहा है, अपने आपको जानने की कोशिश कर रहा है। अगर मनुष्य अपने आपको जानने की कोशिश करे तो उसको शांति अपने ही अंदर मिलेगी।

ऐंकर मीनल : क्या बात है!

प्रेम रावत जी : सबसे बड़ी बात यह है कि कबीरदास जी ने भी यही बात कही है कि — आत्मज्ञान — Self Knowledge — without knowing yourself —

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।

मृग नाभि में है कस्तूरी, बन बन फिरै उदासी।।

ऐंकर मीनल : क्या बात है! क्या बात है प्रेम!

लेकिन प्रेम, मुझे बताइएगा कि क्या आपको लगता है कि आजकल के कॉम्पटीटिव जमाने में कोई पीसफुल रह सकता है ?

प्रेम रावत जी : कॉम्पटीशन तो बाहर है। कॉम्पटीशन अंदर थोड़े ही है मनुष्य के ? जो कुछ भी वो करता है बाहर, जो कुछ भी वो रेस कर रहा है, जो कुछ भी वो दौड़ रहा है जिस चीज के पीछे, वो तो बाहर दौड़ रहा है और अपने से दूर दौड़ रहा है। और मैं जिस चीज की बात कर रहा हूं कि वो एक मिनट रुककर के यह भी सोचे कि ‘‘मैं अपनी तरफ कैसे दौड़ूं ? मैं अपनी तरफ कैसे आऊं ? मैं — जो मेरे अंदर पोटेंशियल है, जो मेरे अंदर चीज है, जो मेरे हृदय के अंदर जो चीज विराजमान है, उस तक मैं कैसे पहुंचूं ? क्योंकि वहां मेरे को शांति मिलेगी।’’ हम सोचते हैं कि जब हम सक्सेसफुल होंगे, तब हमको शांति मिलेगी। पर सक्सेस की जो सीढ़ी है, वह कुछ ऐसी है कि —

कोई कहता है कि ‘‘भाई! दो सीढ़ी चढ़ो, तब आप सक्सेसफुल हो जाओगे।’’

जब आप दो सीढ़ी चढ़ते हैं तो कहते हैं, ‘‘नहीं! दो और चढ़नी पड़ेंगी।’’ और जब दो और चढ़ते हैं, तो कहते हैं, ‘‘नहीं, दो और चढ़नी पड़ेगी।’’

तो चढ़ते ही चले जाते हैं, परंतु ये कभी नहीं सोचते हैं कि क्या सक्सेस हमको मिला है या नहीं ? या सक्सेस हमारे अंदर पहले से ही है। जिस चीज को हम बाहर ढूंढ़ रहे हैं, वो हमारे अंदर है। इसका यह मतलब नहीं है कि हमको बाहर सक्सेसफुल नहीं होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे सिर के ऊपर छत नहीं होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे बच्चों को भूखा मरना चाहिए। नहीं! ये मतलब नहीं है। पर अगर आपको शांति भी चाहिए अपनी जिंदगी के अंदर तो ये बाहर जो कुछ भी हम करते हैं, ये भी कीजिए और अंर्तमुख होकर के आप अपने आपके अंदर जो चीज है, उसको भी महसूस कीजिए।

ऐंकर मीनल : प्रेम! मुझे बताइए, किसी भी टाइटिल के साथ एक प्रेशर आ जाता है। आपको भी एक टाइटिल दिया गया है। यू आर ‘द ब्रांड एम्बेसडर ऑफ पीस!’ क्या इस टाइटिल के साथ आपको पीस मिलती है ?

प्रेम रावत जी : देखिए! मैं सभी से एक ही बात कहता हूं कि हर एक मनुष्य, जो इस संसार में है, Every human being, they are all global Peace Ambassadors. सभी के सभी शांतिदूत हैं। हमको यह समझना चाहिए और इस चीज के साथ जो जिम्मेदारी आती है, वो सिर्फ यह है कि हम अपने आपको समझें कि हम कौन हैं। बाहर जो हो रहा है, हो रहा है।

देखिए! जब आप नौका में बैठते हैं तो आप क्या चाहते हैं कि समुद्र सूख जाए ? अगर समुद्र सूख गया तो फिर नौका में बैठने का मतलब क्या हुआ ?

आप यह चाहते हैं कि नौका के नीचे पानी रहे, परंतु नौका के अंदर पानी न आए। तो जो यह डिस्टिंक्शन है, यह सबसे बड़ी चीज है। हम जो बाहर है, जो होगा बाहर, जो प्रेशर है, जो कुछ है, अगर इनसे हम निपटना चाहते हैं अपनी जिंदगी के अंदर तो उसके लिए कुछ और करना पड़ेगा। अगर हम अपने आपको समझना चाहते हैं अपनी जिंदगी के अंदर तो उसके लिए कुछ और करना पड़ेगा। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके साथ प्रेशर नहीं आता है, इसके साथ प्रिविलेज आता है। और हर एक मनुष्य जो है इस संसार के अंदर, Everybody is fortunate! सभी किस्मत वाले हैं। जैसे कहा है कि —

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल।

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भए कंगाल।।

तो सबसे पास है, परंतु सब खोल नहीं पाते हैं अपनी गठरी को और गठरी को अगर खोलें तो सभी को पता लगेगा कि उनके पास कितनी मूल्यवान चीज है।

ऐंकर मीनल : I always think Prem that whenever we start questioning our passion, talking something about very passionately, it is generally from some sort of experience that has happened with us in life. Is that the same case with you?

क्या आपके साथ भी कोई ऐसा किस्सा हुआ है, जिसकी वजह से आप peace में इतना believe करते हैं ?

प्रेम रावत जी : देखिए! When I was 4 years old, जब मैं चार साल का था तो मैं इस शांति के बारे में लोगों को संबोधित करता था। और जब मैं 9 साल का था तो मेरे पिताजी गुजर गए, उसके बाद मैंने जो वो कर रहे थे, उसकी मैंने बागडोर संभाली। और जब मैं 13 साल का था तो मैं विदेश गया। और मैं इस चीज के बारे में तब से लोगों को संबोधित कर रहा हूं कि —

भाई! जिस चीज की तुमको जरूरत है असली में, वो तुम्हारे अंदर है। शांति को जानो, शांति को पहचानो शांति क्या है।

शांति अलादीन का लैंप नहीं है कि आपको कोई चीज चाहिए तो आप शांति के लैंप को रगड़ेंगे और उसका जिन्न आएगा, जिसे आप कहेंगे कि ‘‘शांति चाहिए!’’ तो बात यह है कि शांति का संदेश — ये ढोल, बहुत सदियों से हमारे साथ चल रहा है। अब चाहे आप राम के जमाने की बात करें, चाहे आप कृष्ण के जमाने की बात करें, चाहे आप किसी भी संत या महात्मा के समय की बात करें तो सभी ने यही संबोधित किया है हमको कि — भाई! जिस चीज की तुमको जरूरत है, वो तुम्हारे अंदर है। उस चीज को जानो, उस चीज को पहचानो तो तुम्हारे जीवन में शांति आएगी। तुम्हारा जीवन सुधर जाएगा। तो यह तो बहुत प्राचीन काल से बात चलती आ रही है। और इसके लिए ट्रेजडी होने की जरूरत नहीं है। मतलब, यह नहीं है कि इसका पैशन ट्रेजडी से आता है। इसका पैशन हर एक मनुष्य के अंदर है।

क्योंकि देखिए! आपको किसी बच्चे को ये सिखाने की जरूरत नहीं है कि तुम भूख कैसे लगाओ! वो तो स्वयं उसके अंदर लगती है। बच्चे को ये सिखाने की जरूरत नहीं है कि तुम कैसे खाओ! उसको मालूम है कि उसको मुंह में डालना है, जो कुछ डालना है। तो ठीक इसी प्रकार से कुछ ऐसी चीजें हैं, जो हमारे लिए innate हैं, जो fundamental हैं। जो एकदम से शुरुआत से ही हमारे साथ हैं। और वह चीज है — इस शांति की प्यास! और इस शांति के लिए excitement और इस शांति के लिए thirst!

ऐंकर मीनल : Prem please tell us a little bit about the Prem Rawat Foundation?

प्रेम रावत जी : कुछ साल पहले we realized the need. देखिए! इस संसार के अंदर billions of dollars खर्च हो रहे हैं और लोग देते हैं। क्योंकि लोगों में अच्छाई है, लोग देते हैं और लोग चाहते हैं कि और लोगों का भी भला हो। परंतु हो क्या रहा है कि ये जो — इतनी सारी charities हैं, फिर भी लोग भूखे जा रहे हैं। इतना पैसा इकट्ठा होता है खाने के नाम पर, फिर भी लोग भूखे जा रहे हैं। तो हमने देखा कि ऐसा क्यों हो रहा है ? तो जब हमने ये देखा तो एक तो यह कि लोगों को जब खाना दिया जाता है तो कुछ इस प्रकार से दिया जाता है कि वो उसको ढंग से खा भी नहीं सकते हैं, क्योंकि ये उनका — उस खाने के वो आदी नहीं हैं। They are not used to that food.

So, मैं एक दिन रांची में था। रांची के बाहर एक गुमला डिस्ट्रिक में एक जगह है, तो वहां मैंने देखा कि बच्चे इतने बेचारे भूखे थे और उनका इतना बुरा हाल था कि मैंने किसी से कहा कि, ‘‘भाई! ये ऐसा क्यों है ?’’ क्योंकि मेरे को मालूम था कि बहुत सारे NGOs आसपास हैं। तो उन्होंने कहा, ‘‘जी! यहां तो इतनी खराब हालत है कि बच्चे चूहे के घोंसले से खाना चुराकर खाते हैं।’’

ऐंकर मीनल : बाप रे!

प्रेम रावत जी : इतनी बुरी हालत थी। तो हमने वहां एक Food for people, जन-भोजन की व्यवस्था की। बहुत सुंदर हॉल बनाया और उस हॉल के अंदर साफ-सुथरा — साफ-सुथरा खाना। और सबसे बड़ी चीज कि हमने वहां जो बच्चे आते थे खाने के लिए, उनको ये सिखाया कि ‘‘भाई! खाने से पहले हाथ धोओ!’’ अब उसके ये आदी नहीं थे। तो जब धीरे-धीरे उन्होंने सीखना शुरू किया तो उनकी — उनके स्वास्थ्य में भी बहुत परिवर्तन आया है। उनको खाना भी वो मिलता है, जिसके वो आदी हैं तो खूब डट के खाते हैं।

और सारी कम्यूनिटी में हुआ क्या ?

क्योंकि एक समय का खाना उस परिवार को बनाना नहीं पड़ता है तो पैसे बचने लगे। तो area में चोरी कम हुई। क्राइम कम हुआ। क्योंकि बच्चों को ये नहीं था कि खाना कहां से आएगा, क्योंकि परिवार उनका सप्लाई नहीं कर पाता था कई बार तो उनका स्वास्थ्य अच्छा होने लगा और पहली बार वो बच्चे ग्रैजुएट होकर के हाई स्कूल गए और हाई स्कूल ग्रेजुएट होकर के यूनिवर्सिटी में गए। पहली बार। पहली बार! ऐंकर मीनल : Wow! that’s amazing, that’s amazing. काफी कमेंडेबल है यह।

Splitting the Arrow, Understanding the business of life — प्रेम! आपने इस बुक में लाइफ को ‘बिज़नेस’ कहा है। यह कैसे हुआ ?

प्रेम रावत जी : नहीं। लाइफ बिज़नेस नहीं है। बिज़नेस ऑफ लाइफ! क्योंकि जो हम — देखिए! एक सबसे बड़ी बात यह है कि हम सौदा कर रहे हैं। अपने जीवन के साथ सौदा कर रहे हैं। जो चीज बहुत ही मूल्यवान है — हर एक स्वांस जो हमारे अंदर आता-जाता है, इसको हम न्योछावर कर रहे हैं उन चीजों के लिए, जिसके बारे में हम अपने सपने बनाते हैं।

ऐंकर मीनल : जी!

प्रेम रावत जी : एक समय आएगा कि ये स्वांस चलता नहीं रहेगा। और फिर क्या करेंगे ? क्योंकि दुनिया तो चलती रहेगी। तो यह जो बिज़नेस हम कर रहे हैं, इस बिज़नेस को बदलने की जरूरत है। और वह बिज़नेस करना चाहिए, जिसमें सचमुच में हमको मुनाफा हो। और कहां का मुनाफा हो ?

सिर्फ मन का ही मुनाफा नहीं, पर हृदय का भी मुनाफा हो। हमारे जीवन के अंदर यह महसूस होना चाहिए कि — I am thankful कि मैं अपने जीवन के बारे में एक चीज जानता हूं कि यह जो जीवन मेरे को मिला है, वह मूल्यवान है और जिसने भी ये मेरे को जीवन दिया, उस शक्ति को मैं नमन करता हूं, उसका मैं thank you अदा करता हूं, धन्यवाद अदा करता हूं। क्योंकि इससे मूल्यवान चीज मेरे पास कोई नहीं है। तो इस बिज़नेस में अगर लग जाएं थोड़ा-सा तो इतना मुनाफा होगा, इतना मुनाफा होगा, इतना मुनाफा होगा — काहे का ?

आनंद का, सुख का, चैन का और शांति का!

ऐंकर मीनल : मुझे बताइए! आपकी जो पैशन्स हैं, क्या-क्या मदद करते हैं आपको पीसफुल रहने में ?

प्रेम रावत जी : So, देखिए न! यह वो वाली बात है कि जैसे कि कमल का फूल गंदे पानी में रहता है, परंतु कमल का फूल गंदा नहीं होता है। और वह अपना separation बनाकर रखता है कमल का फूल और उसकी जो जड़ हैं, वह भले ही गंदे पानी में हो, पर वह कमल का फूल गंदा नहीं लगता है। वह सुंदर लगता है।

ऐंकर मीनल : जी बिलकुल!

प्रेम रावत जी : ठीक इसी तरीके से इस दुनिया के अंदर जो होगा, वो होगा। बात उसकी नहीं है। क्योंकि जो समस्याएं हमारे सामने आती हैं — जो समस्याएं, जिनका हम सामना करते हैं, वो पहले किसी और को सता रहीं थीं। ये तो वो वाली मक्खियां हैं, पहले किसी और को तंग कर रही थीं, अब हमारे पास आ गई हैं और हमारे बाद किसी और को तंग करेंगी।

क्योंकि समस्याएं तो वही हैं। क्योंकि हम समझते हैं कि — नहीं, हमारे पास नई टेक्नोलोजी है तो हमारी नई समस्या होगी। नहीं! समस्याएं वही हैं, चाहे आपका फोन नहीं चल रहा है या आपका टेलीविज़न नहीं चल रहा है या आपकी गाड़ी नहीं चल रही है या आपका घोड़ा नहीं चल रहा है, या आपका गदहा नहीं चल रहा है, या उससे पहले आपका छत नहीं है आपके घर में। तो कुछ न कुछ, कुछ न कुछ जो नहीं हो रहा है, ये तो हमेशा होते ही आया है।

परंतु आपको एक मौका मिला है और आप जिंदा हैं। और इसका मतलब, आपके लिए क्या है ? मतलब, सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि आपके लिए क्या महत्व रखता है कि आपके अंदर यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है ?

ऐंकर मीनल : Right! Right! Absolutely.

ऐंकर मीनल : जाने से पहले हमारे listeners को कोई message देना चाहेंगे ?

प्रेम रावत जी : मेरा तो एक ही message है सबके लिए कि यह आपके पास एक मौका है। यह आपकी जिंदगी है। फिर मिले, न मिले। फिर आप जिसको जानते हैं, उनको मिलें, न मिलें। परंतु जो है आपके जीवन में, इसको आप समझिए, इसका पूरा-पूरा फायदा उठाइए। यह स्वांस आपके अंदर आ रहा है, जा रहा है, शांति आपके अंदर है, आपकी अच्छाइयां आपके अंदर हैं। आप जहां भी जाते हैं, अपना क्रोध भी साथ लेकर जाते हैं, परंतु जहां क्रोध जाता है, वहां करुणा भी जाती है।

एक बात याद रखिए कि सिक्के का एक ही हिस्सा नहीं हो सकता है। उसके दो हिस्से हैं। चाहे अगर उस सिक्के को आप बीच में से काट भी दें, तब भी उसके दो हिस्से रहेंगे। और सबसे बड़ी बात है कि जहां — अगर मनुष्य के अंदर — उसके अंदर जो बुराइयां हैं, उस हर एक बुराई के लिए उसके अंदर अच्छाई भी है। अगर आपके जीवन में अंधेरा है, तो एक बात याद रखिए कि उजाला भी दूर नहीं है। अगर आप उजाला लाना चाहते हैं अपनी जिंदगी के अंदर तो आपको अंधेरा हटाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ उस उजाले को लाने की जरूरत है और जब वो उजाला आएगा तो अंधेरा अपने आप भाग जाएगा।

ऐंकर मीनल : क्या बात है!

And with those words प्रेम! Thank you so much for being on 94.3 रेडियो वन।

प्रेम रावत जी : My pleasure! and सभी आपके श्रोताओं को मैं शुभकामना देना चाहता हूं।

ऐंकर मीनल : Thank you so much. Have a great evening!