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लॉकडाउन 38 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (29 अप्रैल, 2020)
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"एक तरफ जो हम करते हैं उससे तो यही स्पष्ट लगता है कि हम कभी, कहीं नहीं जा रहे हैं, परंतु यह सत्य नहीं है एक दिन सबको जाना है और इसकी क्या तैयारी है ? इस बात को सामने रखते हुए हम किस प्रकार अपने व्यवहारों को बदलते हैं ?" —प्रेम रावत (30 अप्रैल, 2020)


यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज मैं जिस चीज से चालू करना चाहता हूं, एक भजन है वह मेरे दिमाग में बहुत दिनों से चल रहा था तो मैंने सोचा कि उसको — सारा याद नहीं है मेरे को तो मैंने प्रिंट कर दिया है उसको। तो कबीरदास जी का यह भजन है क्योंकि हमारे संसार में जिस संसार में हम रहते हैं हर एक चीज का दिखावा है "हम यह हैं, हम यह हैं, हम यह हैं, कोई यह है, कोई यह है।" सब लोग सूट पहनते हैं, यह करते हैं, वह करते हैं, हम यहां हैं, हम यहां हैं, यहां हैं और सब वर्दी का खेल है। "किसी की कुछ वर्दी है, किसी की कुछ वर्दी है, किसी के यहां कुछ लिखा हुआ है, किसी के यहां कुछ लिखा हुआ है, किसी का यहां कुछ टंगा हुआ है, किसी का" — सबका यह खेल है। हम कई बार नहीं समझते हैं इस खेल को और हमको यही कहा जाता है कि सारे खेल का का आदर करो। हम करते हैं।

परन्तु कबीरदास जी कहते हैं कि यह खेल जो है, बाहर का यह इस संसार में हो रहा है और किस तरीके से उन्होंने रखा है कि —

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।।

जिस चीज को रंगना हैं वह तो मन है। वही तो भागता है "इधर-उधर, कभी यहां, कभी वहां, कभी वहां।" पर उसको तो नहीं रंगा। रंगा किसको, कपड़े को। अब कपड़े रंगने से क्या फायदा ? कपड़े का दोष थोड़े ही है। कपड़े की वजह से मनुष्य इधर-उधर थोड़े ही भटक रहा है। वह भटक रहा है इसलिए कि उसका मन रंगा हुआ नहीं है तो —

मन के बहुत तरंग हैं, छिन छिन बदले सोय।

एकै रंग में जो रहै, ऐसा बिरला कोय ।।

तो यह बदलता रहता है, बदलता रहता है, बदलता रहता है और रंगने की इसको जरूरत है। पर उसको नहीं रंगा कैसे!

आसन मारि जोगी मंदिर में बैठे, (देखा होगा आपलोगो ने)

नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।।

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।।

वैसे तो यह भजन जो है, पॉलिटिकली बिलकुल ठीक नहीं है। पॉलिटिकली बिलकुल इनकरेक्ट है, तो मैं पहले ही माफी मांग रहा हूँ मेरा नहीं है लिखा हुआ, यह कबीरदास जी का है। मैं तो सिर्फ पढ़ रहा हूँ इसको। क्योंकि सुन लें लोग, क्योंकि इसमें जो मूल चीज है वह बहुत ही बढ़िया चीज है। क्यों लगे हैं हम सब बाहर के रंगने में, पोतने में ? जैसे कि किसी की झोपड़ी के अंदर अगर खिड़की भी टूटी हुई है, अंदर दीवार जो बनी हुई है कमरे में वह भी टूट रखी है, छत में छेद हैं। परन्तु बाहर मनुष्य उसको बैठा-बैठा पोत रहा है बाहर से ताकि बाहर से बड़ा सुन्दर लगे। हां, आने-जाने वालों को बड़ा सुन्दर तो जरूर लगेगा। पर उसका फायदा क्या है!

आसन मारि जोगी मंदिर में बैठे।

बैठे हैं ऐसे जैसे कि उनका मन उनके काबू में है। पर नहीं है। पर क्या कर रहे हैं कि जो करना था जो नाम पर, जो सतनाम है, जो अंदर नाम चल रहा है उस पर अपने मन को लगाना था, उसको तो छोड़ दिया और पूजन लागे क्या जिसको- जिसको पूजना था उसको तो नहीं पूज रहे हैं और पूज रहे हैं किस चीज को! पत्थर को पूज रहे हैं।

पूजन लागे पथरा मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

एक समय था कि लोग कैसा करते थे! उसके बाद इसका फैशन कम हुआ अब फिर ज्यादा हो गया है, अब फिर चल दिया है इसका फैशन। क्या फैशन है —

कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले,

दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।।

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

कहने का मतलब उनका यह है, मेरा यह मतलब नहीं है कि दाढ़ी नहीं रखनी चाहिए लोगों को या मूंछ नहीं रखनी चाहिए लोगों को या अपने कान नहीं फड़ाने चाहिए पर जिस चीज को रंगना चाहिए उसको तो कम से कम रंगें। उस मन को तो रंगें उसके बाद फिर किसको क्या कहने की जरूरत है कुछ कहने की जरूरत नहीं है, परंतु वह नहीं रंगा हुआ है तो —

कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले,

अब तो लम्बे-लम्बे सबके बाल होने लगे हैं धीरे-धीरे और इस कोरोना वायरस की वजह से हमारे भी बाल लंबे होने लगे हैं। जो लॉकडाउन में हैं वह नाई के पास तो जा नहीं सकते हैं, तो उनके भी बाल लम्बे होंगें।

कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले,

दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा

तो यही हो जाता है। दाढ़ी बढ़ती है तो बकरे के जैसे बन जाते हैं। और मनुष्य के अंदर तो पहले से ही मैं-मैं तो है ही — “मैं, मैं, मैं, मैं, मेरा, मेरा, मेरा, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं, मैं” इसी पर लगा रहता है, बकरे की तरह हो ही जाता है। और क्या करता है जोगी ?

जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले,

“कभी यहां, कभी वहां, कभी वहां, कभी वहां!”

काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।।

अब जंगल में बैठे हुए हैं तो जब काम जरायेगा तो करेंगे क्या! तो —

काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।।

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

मथवा मुड़ाय जोगी भगवा रंगौले,

यही तो करता है जोगी —

मथवा मुड़ाय जोगी भगवा रंगौले,

गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।।

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

सुना रहे हैं, खुद को नहीं मालूम क्या सुना रहे हैं। पर सुना रहे हैं — "कभी यहां से सुना रहे हैं, कभी वहां से सुना रहे हैं", खुद को नहीं मालूम!

मथवा मुड़ाय जोगी भगवा रंगौले,

गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।।

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

कहत कबीर सुनो भाई साधो

सभी को चेतावनी है कि सुनो हमारी बात क्या होगा, आखिरी में क्या होगा जाकर —

यम दरवाजे पर जायेगा पकड़ा

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।

अंत में पकड़े जाओगे। अंत में पकड़े जाओगे। क्योंकि जो तुम दुनिया के आगे यह सबकुछ डाल रहे हो कि "मैं यह हूं, मैं यह हूं, मैं यह हूं।" असली में तुम क्या हो, क्या तुमको मालूम है कि तुम असली में क्या हो ? क्या कर रहे हो! दुनिया को बेवकूफ बनाने में लगे हुए हो। सभी लोग बना रहे हैं, "कोई कुछ है, कोई कुछ है, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ, मैं यह हूँ।" सबका यही चक्कर है, पर संतुष्ट कौन है ? संतुष्ट तो वही संतुष्ट है जिसने सचमुच में अपने मन को रंग लिया है। जिसने वह बात समझ ली है कि "मैं यहां क्यों हूँ!" अब मैं एक बात सोच रहा था, अब जैसे यह बात है कि अगर एक को शून्य से जोड़ा जाए तो क्या होगा? कुछ नहीं होगा एक, एक रहेगा। परन्तु मैं कल सोच रहा था कि शून्य का मतलब है वह चीज जो अनंत है। जिसको नापा नहीं जा सकता, जिसको कुछ किया नहीं जा सकता और अगर वह अनंत चीज के साथ मैं जुड़ूं तो मैं क्या बन जाऊंगा। अगर मैं एक हूं और वह अनंत जो है वह जीरो है, शून्य है तो एक को शून्य से जोड़ोगे तो मैथ में, गणित में तो यही समझाते हैं कि वह एक ही रहेगा। पर मैं सोच रहा था कि कितनी सुंदर बात हो जाती है जब मैं उस शून्य से, उस अनंत से जाकर मिलता हूं तो मैं भी अनंत बन जाता हूँ, मैं भी, जो मेरे अंदर की चीज है। यह नहीं, यह अनंत नहीं बनता यह तो नाशवान है और यह नाशवान रहेगा। यह मिट्टी का बना हुआ है और मिट्टी का बना हुआ रहेगा यह।

परन्तु जो अंदर चीज है मेरे अंदर जो अविनाशी है, वह बैठा हुआ है और मैं उसके साथ जाकर मिल जाऊं तो मैं भी उसी के साथ मिल गया। मैं भी वही बन गया। जो गणित इस दुनिया की समझाते हैं उसमें तो एक और उसको जोड़ा जीरो के साथ शून्य के साथ तो एक। और सच्ची में इस अंदर की दुनिया में एक (जो मैं हूँ) उसको अगर शून्य के साथ जोड़ा, तो मैं भी शून्य ही बन जाऊँगा। समझने की बात है, मैं हूँ यही — जो मैंने कबीरदास जी का भजन आप लोगों को सुनाया था कि "मैं नहीं मरता, क्योंकि मेरे को कौन मिला है वह जियावन हारा मिला है तो मैं कैसे मर सकता हूँ!”

तो वही वाली बात है कि अगर मैं उसके साथ मिल जाऊं और वह मेरे अंदर है। मैं उसको अगर जान लूँ, पहचान लूं "वह मेरे अंदर है" परन्तु मैं करता क्या हूँ ? इस दुनिया के ऊपर ध्यान देता हूँ — "यह है, यह है, यह है, यह है, यह है!" अखबार पढ़ता हूँ, सवेरे-सवेरे अखबार पढ़ते हैं, सभी लोग पढ़ते हैं, मैं भी पढ़ता हूँ। "उसके साथ क्या हो रहा है, उसके साथ क्या हो रहा है, वहां क्या हो रहा है, वहां क्या हो रहा है, वहां क्या हो रहा है" और सच में वह व्यक्ति, सबसे-सबसे विद्वान वह व्यक्ति है जो कह रहा है "यहां क्या हो रहा है, यहां क्या हो रहा है!" यहां क्या हो रहा है फिर यहां क्या हो रहा है — यहां जो गड़बड़ हो रही है मैं पढ़ रहा हूँ उसको, "वहां इसने यह कह दिया, उसने यह कह दिया, अब यह नहीं होगा, वह नहीं होगा, उसके साथ यह नहीं होगा, उसके साथ यह नहीं हो सकता” और यहां, यहां क्या हो रहा है ? यहां वह लीला हो रही है, यहां वह चीज हो रही है, यहां वह स्वांस की बंसी बज रही है कि —

बिना बजाये निसदिन बाजे, घंटा शंख नगारी रे।

बहरा सुनसुन मस्त होत है, तन की खबर बिसारी रे।।

वह यहां हो रहा है!

बिन भूमी के महल खड़ा है, तामे ज्योत उजारि रे,

अँधा देख-देख सुख पावे, बात बतावे सारी रे।

यहां हो रहा है और यह अखबार में पढ़ोगे नहीं। यह अखबार में नहीं मिलेगा। यह यहां हो रहा है। तो सबसे बड़ी बात है कि मनुष्य इस बात को समझें, इस बात को जानें कि यहां क्या हो रहा है! जो यहां हो रहा है यह सच है। जो यहां हो रहा है, जो बाहर हो रहा है यह सच नहीं है यह बदलता रहेगा, बदलता रहेगा, बदलता रहेगा, बदलता रहेगा, पर जो यहां हो रहा है वह सच है और उस सच के बिना सारी बात अधूरी है, सारा खेल अधूरा है। सब कुछ अधूरा।

अगर मैंने उस बात को नहीं समझा, उस बात को नहीं जाना तो मेरे यहां आने का फायदा क्या हुआ ? "मैं यहां आया हूं और एक दिन मेरे को जाना है" यह बात तो सबको मालूम है। फिर मालूम होते हुए भी — अब यही बात महाभारत में हुई। महाभारत में क्या हुआ ?

एक बार दृष्टांत है कि बहुत गर्मी थी, बहुत गर्मी और युधिष्ठिर ने नकुल को भेजा कि "तुम जाओ पानी देखो कहीं अगर तालाब हो तो हमको बताओ पानी पीयेंगे!"

काफी समय के बाद नकुल नहीं आया। सहदेव को भेजा "तुम जाओ, तुम देखो!" वह भी नहीं आया। तो भीम को भेजा, वह भी नहीं आया। और अर्जुन को भेजा, वह भी नहीं आया तो फिर युधिष्ठिर गए देखने के लिए, "क्यों नहीं आये, क्या हुआ!"

चलते-चलते-चलते एक जगह वह पहुंचे तो वहां देखा कि सारे भाई उनके वहां लेटे हुए हैं, सब मरे हुए हैं और सामने तालाब है। तो सबसे पहले तो उनको प्यास लगी हुई थी, वह बढ़े तलाब की तरफ। जैसे ही पानी पीने के लिए गए तो वहां पर जो जिन्न था वह आया बाहर। उसने कहा कि "तुम पानी नहीं पी सकते! पानी मैं तब तक नहीं पीने दूंगा तुमको जबतक तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं दोगे। अगर तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं दोगे तो तुम्हारी भी यही हालत होगी जो तुम्हारे भाइयों की हुई है।"

तो युधिष्ठिर ने कहा, "पूछो! क्या पूछना है तुमको!"

तो काफी सारे सवाल पूछे गए, बहुत सारे सवाल पूछे गए और एक सवाल यह पूछा गया कि "मनुष्य को यह मालूम होते हुए कि उसको एक दिन जाना है, वह ऐसे क्यों जीता है कि वह कभी नहीं मरेगा।"

यह सबसे बड़ी बात है क्योंकि एक तरफ जो हम करते हैं उससे तो यही स्पष्ट लगता है कि हम कभी, कहीं नहीं जा रहे हैं, परंतु यह सत्य नहीं है एक दिन सबको जाना है और इसकी क्या तैयारी है ? इस बात को सामने रखते हुए हम किस प्रकार अपने व्यवहारों को बदलते हैं ? कुछ नहीं। जैसे हमको कभी नहीं मरना है। परन्तु जाना तो सभी को पड़ेगा। तो यह जो कुछ सच्चाईयां हैं इनको हम स्वीकार नहीं करते हैं अपने जीवन में। और जबतक इन सच्चाईयों को हम स्वीकार नहीं करेंगे तो क्या होगा मेरे साथ! हां, मेरे को जाना जरूर है पर कहां जाऊंगा मैं ? कहां जाना है मेरे को ?

नहीं! एक समय था कि मेरे पास यह नहीं था, यह शरीर नहीं था। आज है! मेरे अंदर एक चीज है वही जो अविनाशी है और अगर मैं उसके साथ जुड़ गया तो फिर मैं सब जगह हूँ, मैं हूं और उसी में मैं लीन हो गया अगर तो मेरे लिए वही सब कुछ है। और उसमें अगर मैं लीन नहीं हो सका और मेरा सारा ध्यान इसी मिट्टी पर ही गया तो इस मिट्टी को तो एक दिन मिट्टी बनना ही है। इस मिट्टी को तो एक दिन इस मिट्टी से जाकर मिलना ही है। चाहे मैं कुछ भी करने की कोशिश करूं इसको इस मिट्टी के साथ मिलना है। और इस मिट्टी से मेरे को कितनी नफरत है और इस मिट्टी से मेरे को कितना प्रेम है! यह भी तो सोचिये! वही मिट्टी है और वह थोड़ी-सी मेरे को लग जाए तो मैं कहता हूँ "धूल लग गयी, धूल लग गयी" और यह मिट्टी यह भी उसी की बनी हुई है। इसी मिट्टी को मैं धोता हूँ, धोता हूँ, धोता हूँ क्योंकि दूसरी मिट्टी को निकालने के लिए, परन्तु यह उसी की मिट्टी है। तो इन सच्चाईयों को तो मैं स्वीकार नहीं कर रहा हूँ और मैं चाहता हूँ कि मेरे जीवन के अंदर सबकुछ स्पष्ट रहे, सबकुछ अच्छा रहे, पर जब मैं सच्चाईयों को ही स्वीकार नहीं कर रहा हूँ तो कैसे यह बात बनेगी!

तो सोचने की बात है, विचारने की बात है। सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!