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लॉकडाउन 34 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (26 अप्रैल, 2020)
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"जब समस्या रुपी पहाड़ आपके सामने आता है, आपको उसके ऊपर से जाने की ज़रुरत नहीं है, पहाड़ के बगल से भी जा सकते हो।" —प्रेम रावत (26 अप्रैल, 2020)


यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

आशा है आप सब कुशल-मंगल होंगे और काफी संदेश आ चुके हैं मेरी तरफ से और यह लॉकडाउन अभी भी चल ही रहा है। और जब तक यह चलता रहेगा किसी न किसी रूप में आप तक यह संदेश पहुंचता रहेगा कि — "जिस चीज की आपको तलाश है वह आपके अंदर है। जो चीज आप चाहते हैं अपने हृदय से वह आपके अंदर है।" हां इतनी बात मैं जरूर कहूंगा कि कुछ प्रश्न मेरे सामने आए ज्यादा नहीं बहुत थोड़े-से तो उनमें लोग बड़े व्याकुल हैं, उनको डर लग रहा है, उनको कुछ — अपने परिवार को लेकर उनके पास समस्या है। मतलब, उनके पास कोई ना कोई, कोई ना कोई, कोई ना कोई समस्या है।

देखिए बात समस्या की नहीं है, बात है आपकी। समस्या तो समस्या हैं, समस्या तो कुछ ऐसी चीजें हैं जो पहले किसी और को सता रही थीं अब वह आपके पीछे लगी हुई हैं, आपके बाद किसी और को पकड़ेंगी। उनका काम है जैसे, मक्खी होती है कभी इधर परेशान कर रही है, फिर कहीं जो सामने वाला है उसके पास चली जाती है उसको परेशान करती है, फिर जब वह परेशान हो जाता है तो फिर वह ऐसे-ऐसे करता है तो फिर वह आपके पास वापिस आ जाती है। परेशानियां भी समस्या जैसी हैं।

पर आपके पास क्या यंत्र हैं इन समस्याओं को हल करने का ? हल का मतलब यह नहीं है कि आप इन समस्याओं का समाधान कर दें। हल का मतलब हुआ कि इन समस्याओं को आप अपने से अलग रखें, थोड़ा-सा दूर कर दें ताकि यह आपको परेशान ना करें। क्या चीजें हैं आपके पास ? आपके अंदर शांति है, आपके अंदर स्पष्टता है, आपके अंदर धीरज है। यह आपकी शक्तियां हैं और जबतक आप इन शक्तियों को इस्तेमाल नहीं करेंगे — डरना तो आपको आता है यह बात तो बिल्कुल स्पष्ट है। कुछ इधर हुआ, कुछ उधर हुआ — डर! "अरे क्या हुआ ?" डरने में तो आप माहिर हैं। जो चीज हम सबसे ज्यादा करते हैं उसमें हम माहिर हो जाते हैं।

आपको अगर याद है वह, एक मैं कहानी सुनाता हूं। एक व्यक्ति था और वह धनुष चलाने में बड़ा ही माहिर था। वह धनुष चलाता था और ऐसी-ऐसी जगह उसके तीर का निशाना लगता था जो एकदम सही निशाना हो। इतना माहिर था वह कि एक तीर को चला करके दूसरे तीर से उस पहले वाले तीर को फाड़ देता था, इतना माहिर था। तो वह जगह-जगह गांव में जाता था और अपने इस धनुष चलाने के चीज का वह प्रदर्शन करता था। जब गांव में जाता था तो लोग आते थे और ऐसी चीज उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी कि — "कोई इतना माहिर जो एक तीर चलाए फिर उस पहले वाले तीर को दूसरे वाले तीर से फाड़ दे।" तो ऐसे करके लोग ताली बजाते थे, उसको पैसा देते थे और उसका गुजारा चलता था।

एक दिन वह बड़े शहर में गया और वहां बहुत सारे लोग इकट्ठा हो रखे थे और वह अपना प्रदर्शन वहां करने लगा। तो लोग बड़े खुश हुए, तालियाँ बजीं, खूब तालियाँ बजीं। फिर चलाये वह तीर और फिर पहले वाले तीर को फाड़ दे और ऐसा देखने में लोगों को बड़ा अचम्भा लगे। फिर लोग और ताली बजाएं। और जब तालियों की आवाज थोड़ी कम हो जाए तो पीछे से एक आवाज आती थी कि "यह तो अभ्यास का खेल है।" पहली बार जब उसको यह आवाज सुनाई दी कि "यह तो अभ्यास का खेल है" तो उसको अच्छा नहीं लगा। पर उसने सोचा कोई बात नहीं। फिर उसने तीर चलाया लोगों ने ताली बजाई और जैसे ही ताली की आवाज कम हुई तो फिर वही आवाज आई सामने, उसको सुनाई दी कि "यह तो सिर्फ अभ्यास का खेल है।" उसको अच्छा नहीं लगा। कौन है यह ? "मैं इतना बढ़िया तीर चलाने वाला हूं इतने सारे लोग देखने के लिए आए हैं मेरी कारीगरी को और यह बैठकर सिर्फ कह रहा है कि अभ्यास का खेल है, अभ्यास का खेल है।" फिर उसने तीर चलाया फिर लोगों ने ताली बजाई और जैसी तालियों की आवाज कम हुई फिर वही बात — "अभ्यास का खेल है।"

तो जब उसका प्रदर्शन पूरा हो गया, जब उसका प्रदर्शन खत्म हो गया, तो वह उस आदमी को खोजने के लिए गया पीछे। "कौन है यह आदमी, कौन है यह शैतान, कौन है यह बदमाश आदमी जो मेरी इतनी बड़ी कला को छोटा बना रहा है ?" तो वहां गया वह तो देखता है कि एक आदमी वहां बैठा हुआ है, कंधे पर उसके बांस है बहुत लंबा, बैठा हुआ है वह नीचे और बांस में आगे एक मटका बंधा हुआ है जमीन पर रखा हुआ है और पीछे भी एक मटका बंधा हुआ है वह भी रखा हुआ है और काफी सारी खाली बोतलें उसके पास हैं। तो वह तीर चलाने वाला उसके पास जाता है और कहता है कि "तू ही था जो यह कह रहा था कि यह सिर्फ अभ्यास का खेल है, अभ्यास का खेल है ?”

तो उस आदमी ने कहा, “हां मैं ही कह रहा था।”

कहा — तेरा दिमाग खराब है, तू जानता नहीं है कि यह सब लोग मेरे को देखने के लिए आये! मैं इतना बड़ा कलाकार हूं। मैं ऐसा तीर चलाता हूं — यहां ऐसा कोई नहीं है जो मेरे जैसा तीर चला सके। तू समझता है कि "तू मेरे जैसा तीर चला सकता है!"

उसने कहा — "भाई! मैं जो कह रहा हूँ, वह तो सत्य है, यह तो अभ्यास का खेल है !"

जो तीर चलने वाला था वह और गरम हुआ — क्या मतलब है तेरा, "अभ्यास का खेल है!" मैं तो इतना बड़ा कलाकार हूँ, तू कैसे कह सकता है कि "यह सिर्फ अभ्यास का खेल है।"

तो तेल वाले ने कहा — "देख! मैं दिखाता हूं तेरे को। तो उसने कहा कि मैं तेल बेचता हूं और इन दोनों मटके में तेल है। और यह है खाली बोतलें, तो उसने एक खाली बोतल रखी और एक बड़े से मटके को उठाया, अपने कंधे पर रखा और उस मटके से तेल उस बोतल में डाला और एक बूंद भी इधर से उधर ना हो और सारी बोतल को तेल से भर दिया।

तब वह कहता है तीर चलाने वाले से कि "तू अब यह कर!"

तो तीर चलाने वाला कहता है — "मैं तो नहीं कर पाऊंगा।"

तो उसने कहा, यही बात। "तेरे जैसा मैं तीर नहीं चला सकता हूँ और जैसा मैं करता हूँ, इस मटके से सारी बोतल भर देता हूँ तेल से, तू नहीं कर सकता है। क्योंकि तू तीर चलाने का अभ्यास करता है और मैं इस मटके में रखे तेल से इस बोतल को भरने का अभ्यास हर रोज करता हूं इसलिए मैं इसमें माहिर हूं और तू उसमें माहिर है।"

तब जो तीर चलाने वाला था उसकी आँखें खुली, उसको समझ आया कि "हाँ बात तो सच कह रहा है !"

क्या तुक हुआ इस कहानी का ? इस कहानी का तुक यह हुआ कि जो भी हम करते हैं उसमें हम माहिर बन जाएंगे तो अगर डरना — डरना अगर हमारी प्रकृति बन गया है कोई भी चीज आए सामने और हम डर जाएं उससे तो फिर क्या होगा ? डरने में और माहिर हो जाएंगे, और माहिर हो जाएंगे, और माहिर हो जाएंगे और फिर क्या होगा थोड़ी-सी भी बात इधर से उधर हो — "डर!" डरने से क्या होता है, डर में बुराई क्या है ?

देखिये! आप में सुनने की क्षमता है पर जब डर लगता है तो कान बंद। आप में देखने की क्षमता है पर जब डर लगता है आंख बंद। आप में सोचने की क्षमता है, पर जब डर लगता है तो बुद्धि भी काम नहीं करती है। तो जब इन चीजों ने काम करना छोड़ दिया है और डर तो लोगों को यहां इतना भी लगता है कई बार कि वह चिल्ला भी नहीं सकते हैं। मतलब, इतना डर लगता है, इतना डर लगता है कि चिल्ला भी नहीं सकते, मुँह भी बंद, आँख भी बंद, कान भी बंद। यहां तक कि लोगों को इतना डर लगता है, इतना डर लगता है कई बार कि वह बेहोश हो जाते हैं, होश भी नहीं है। तो जब यह सारी चीजें बंद हो गई तो आपके पास बचा क्या ? कुछ नहीं, कुछ नहीं बचा। इसलिए डरना जरूरी नहीं है।

कोई भी समस्या हो सोच के, विचार करके आगे आप बढ़ सकते हैं। कई जगह हैं मनुष्य के पास जब समस्या आती है तो पहाड़ की तरह दिखाई देती है, परंतु यह मेरे को नहीं मालूम कि क्यों मनुष्य यह समझता है कि उसको पहाड़ के ऊपर से ही जाना है ? जब समस्या का पहाड़ उसके सामने होता है तो पता नहीं क्यों उसके दिमाग में यह बात आती है कि उसको ऊपर से ही जाना है। मैं लोगों से कहता हूं ऊपर जाने की क्या बात है जो तुम्हारी मंजिल है, वह उस समस्या रूपी पहाड़ के दूसरी तरफ है तो तुमको जाना कहां है ? पहाड़ के दूसरी तरफ तो ऊपर से जाने की कोई जरूरत नहीं है, तुम बगल से जा सकते हो बड़ी आसानी से। जहां पहाड़ होगा, दो पहाड़ जहां मिलेंगे, वहां एक नदी जैसी चीज होगी, चाहे वह सूखी भी हो उस पर बड़े आराम से चलकर के तुम दूसरी तरफ जा सकते हो। पर इसके लिए डरना नहीं, सोचना, विचारना बहुत जरूरी है। और जब तक यह नहीं होगा — कोई भी समस्या है, मैं नहीं कह रहा कि बड़ी समस्या है, छोटी समस्या है, नहीं! कोई भी समस्या है। समस्या एक समय नहीं थी, समस्या आयी तो समस्या जाएगी भी। अगर तुमको उसमें परिश्रम करने की जरूरत है तो परिश्रम इस प्रकार करो ताकि उस समस्या का अच्छी तरीके से समाधान हो सके। सोचने की बात है।

जहां तक परिवार की बात है, जब मां-बाप में वह चीज नहीं रह जाती है "एकपना" — बाप आता है सारे दिन नौकरी करके घर आता है। उसका दिमाग वैसे ही खराब है इसलिए क्योंकि सारे देना माथापच्ची, माथापच्ची करके आता है। जब घर आता है तो उसको यह नहीं मालूम कि उसकी बीवी के साथ क्या गुजरी है — घर को साफ रखना, घर में खाना बनाना, वह एक टाइम नहीं, दो टाइम, तीन टाइम खाना बनाना, चाय बनाना, यह तैयार करना, वह तैयार करना, यह साफ करना, वह साफ करना, यह आसान काम नहीं है तो बीवी भी उसी हाल में है, पति भी उसी हाल में है। और पत्नी क्या ठानी हुई है ? पत्नी यह ठानी हुई है कि "आने दो, आने दो, घर आने दो मैं सुनाऊंगी उनको — मेरे को यह चाहिए, मेरे को यह चाहिए, मेरे को यह चाहिए, मेरे को यह चाहिए।" और पति है वह बेचारा घर आया कि "क्या करूँ?"

नहीं! दोनों को कम से कम चाहे आधा घंटा हो, चाहे एक घंटा हो आराम से बैठ करके, आराम से बैठ करके, चैन की सांस, समस्याएं नहीं "यह करना है, वह करना है, यह है, वह है।" ना! आराम से बैठकर — "कैसे हैं आप ? आप कैसे हैं ?" बढ़िया समय हो एक कप चाय मिल जाए। चाय पी करके, आराम करके, जो गर्दन पर वजन लादा हुआ है उसको नीचे रख दो। उसकी जरूरत नहीं है। तुम अब घर आ गए हो, उसकी जरूरत नहीं है। उसके बाद अगर कोई समस्या है तो उसका टाइम निकाल करके अच्छी तरीके से उस पर बात की जा सकती है। लोग खाना खाने के लिए साथ में बैठते हैं। मैं सोच रहा था एक "प” — पॉलिटिक्स, पॉलिटिक्स के बारे में टेबल पर बैठकर बात नहीं करनी चाहिए। दूसरा "प" — प्रॉब्लम्स, समस्याएं उनके बारे में बात नहीं करनी चाहिए। क्या बात करनी चाहिए ? या तो चुप या फिर किसके साथ अच्छा क्या हो रहा है ? सिर्फ "अच्छा!" किसी के साथ अच्छा हुआ वह बोले।

देखिये! जबतक लोगों के सामने यह आदत नहीं डाली जाएगी कि वह मीठा बोलें और कोई सुनने वाला है — जब कोई भी आपके परिवार में मीठा बोले तो कोई सुनने वाला है ? जबतक यह आदत नहीं होगी, वह अभ्यास की बात जो मैं कह रहा था तब तक काम कैसे चलेगा ? जो भी माहौल हम चाहते हैं वह तभी संभव होगा जब हम कोई परिश्रम करें उस माहौल को सामने लाने का, उसको साक्षात्कार करने का।

आपके जीवन में सबसे बड़ी बात है यह मौका है। आपका जीवन है अंधेरापन नहीं उजाला। आपको क्या चाहिए— उजाला! आपको क्या चाहिए — आनंद और वह सबकुछ आपके पास है। जैसा मैंने पहले कहा, सबकुछ, सबकुछ जो आपको चाहिए इन समस्याओं से लड़ने के लिए वह आपके पास है। बस बात यह है कि आपको उसका इस्तेमाल करना है।

कुछ एक दिन पहले, दो दिन पहले किसी ने पूछा कि "क्या मैं पीस एजुकेशन प्रोग्राम उसका हिंदी में भी वर्ज़न लाऊंगा ?"

तो हाँ! उसका हिंदी में भी वर्ज़न आएगा। और मैं यही चाहता हूं कि जो लोग पीस एजुकेशन प्रोग्राम को करना चाहते हैं, जो एजुकेशन प्रोग्राम है उसको कंप्लीट करना चाहते हैं तो वह लोग कर सकते हैं। अब उसके लिए रजिस्ट्रेशन नहीं होगा, वह ओपन (open) है। कोई भी, कोई भी कर सकता है, जो भी चाहे कर सकता है। क्या है उसमें ?

जो मैं सुनाता हूं लोगों को वैसे ही सुना रहा हूं, बस उसमें सिर्फ एक बात है और वह बात यह है कि "उस पर ध्यान देना है क्या कहा जा रहा है!" बस! तो आधे घंटे के लिए वह वीडियो चलती है उसके बाद लोगों को यह लिखना है कि उन्होंने उस वीडियो को देख करके क्या प्राप्त किया ? क्या हासिल किया ? क्या समझ में आया उनको ? प्रश्न नहीं, क्या समझ में आया ? फिर वह मेरे को भेजेंगे और उसके लिए एक-दो दिन लगेंगे। जब सारी इन्फॉर्मेशन आएगी, जब सब रिफ्लेक्शंस आएंगे मेरे पास तब उनको मैं सब के सब नहीं, कुछ रिफ्लेक्शंस होंगे जिनको मैं पढूंगा। वीडियो पर सब आप देख सकेंगे और फिर जब वह कंप्लीट हो जाएगा तो फिर दूसरी वीडियो पर जाएंगे। ऐसे करके दस वीडियो हैं और उनका आनंद लेना है और उससे अगर उनको समझ में आ गई बात तो मैं सच में कहता हूं कि लोगों की जिंदगी बदल गई है इस पीस एजुकेशन प्रोग्राम की वजह से।

मेरे को तो बहुत हर्ष है कि सभी लोग हिंदुस्तान के जो यह देखना चाहते हैं वह देख सकेंगे और बहुत जगह है — मॉरीशस है, साउथ अफ्रीका है कई जगह हैं जहां लोग देख रहे हैं, जहां-जहां हिंदी लोग बोलते हैं। तो जैसे मैंने लिस्ट उस दिन सुनाई थी लोगों को तो बहुत सारे लोग हैं और इसका मज़ा ले सकते हैं।

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!