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लॉकडाउन 27 प्रेम रावत जी द्वारा हिंदी में सम्बोधित (19 अप्रैल, 2020)
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"सबसे ताजा खबर, सबसे जरूरी खबर, और सबसे श्रेष्ठ खबर यह है कि तुम जीवित हो और अपना ध्यान उस चीज पर दो जिससे तुम्हारे जीवन में खुशी आए।" —प्रेम रावत (19 अप्रैल, 2020)


यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

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प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार!

अब तो काफी समय भी बीत चुका है और बहुत सारे प्रश्न भी आए हैं और काफी प्रश्नों के उत्तर भी हमने दिए हैं। और सबसे बड़ी बात है कि जब लॉकडाउन चालू हुआ जब हम यहां वापस आए तो हमने यही सोचा कि भाई! अच्छा रहेगा कि सब लोगों के सामने अपनी बात रखें और क्योंकि कई लोग हैं जो, जिनको डर लगा कि यह क्या हो रहा है! क्योंकि यह हर दिन तो होता नहीं है, हर रोज तो होता नहीं है। तो हमने समझाया कि भाई! डरने की जरूरत नहीं है, डरने की की बात नहीं है सबसे बड़ी बात है कि हिम्मत से काम लेना है और जहां तक हमारी समझ है, जो कुछ भी हो रहा है अब लोग तो इसी के पीछे पड़े हुए हैं कि यह क्या हो रहा है, वह क्या हो रहा है, कब छूटेंगे, कब यह होगा, कब वह होगा और अखबार में तरह-तरह के खबर भी छपती रहती हैं, आती रहती हैं।

पर अगर थोड़ा-सा ध्यान दिया जाए और यह जो कुछ भी हो रहा है इससे 2 मिनट, 3 मिनट के लिए मनुष्य की तरफ अगर हम अपना ध्यान दें तो कोई परिवर्तन नहीं है। अभी भी स्वांस तुम्हारे अंदर आ रहा है, स्वांस तुम्हारे अंदर जा रहा है, तुम जीवित हो। समय, समय है! तुम, तुम हो! तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है। सबसे बड़ी कृपा यह है और इससे बड़ी खुशखबरी इस संसार में और कोई नहीं है, “तुम जीवित हो।” तुम्हारे लिए यह सबसे बड़ी खुशखबरी है। अब यह बात तो सही है कि हम इसको खुशखबरी की तरह नहीं लेते हैं। क्योंकि जैसे अंग्रेजी में कहते हैं “ओल्ड न्यूज़ — पुरानी खबर!” तो यह तो पुरानी खबर है कि “हम जीवित हैं।” परन्तु यह पुरानी खबर नहीं है। जो हर नया दिन आता है, जिसमें तुम अपने को जीवित पाते हो। वह सबसे ताजा खबर है, पुरानी खबर नहीं, सबसे ताजा खबर है और सबसे जरूरी खबर है। सबसे जरूरी खबर है। सब खबरों से श्रेष्ठ खबर यह है कि तुम जीवित हो और अपना ध्यान उस चीज पर दो जिससे कि तुम्हारे हृदय में आनंद आए, उस तरफ ध्यान दो अपने जीवन के अंदर जिससे कि तुम्हारे हृदय में खुशी आए, तुम्हारी जिंदगी में खुशी आए।

कई लोग हैं और कहां-कहां उनका ध्यान नहीं जाता है। कोई किसी चीज का ध्यान करता है, कोई किसी चीज का ध्यान करता है। अब यहां तक भी बात हो जाती है कि लोगों की जिंदगी के अंदर इतनी परेशानियां हैं कि वह परेशानियों का ध्यान करते हैं और जो परेशानियों का ध्यान करेगा तो और परेशानी आएगी। अगर वह परमानंद का ध्यान करेगा तो उसकी जिंदगी के अंदर परमानंद आएगा और जो — अब जैसे कई बार, जब बच्चे थे तो अगर बस में सफर कर रहे हैं, कार में सफर कर रहे हैं, तो बच्चे यह देखने लगते हैं कि कौन-कौन-सी कार सफेद है। तो जब वह सफेद कार को ही खोज रहे हैं तो उनको सफेद कार ही मिलेंगी। क्योंकि वह काली कार मिले तो उसको नहीं गिनेंगे। लाल कार हो उसको नहीं गिनेंगे, नीली कार हो उसको नहीं गिनेंगे। पर जो सफेद है उसको गिन रहे हैं। वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है, वहां भी सफेद है।

तो मेरे कहने का मतलब है कि जिस चीज में तुम्हारा ध्यान जा रहा है — और लोग हैं जो प्रश्नों में भी लिखते हैं, "जी! हम इस चीज से परेशान हैं, हम इस चीज से परेशान हैं, हम इस चीज से परेशान हैं।" पर, यह तो अच्छी बात है कि तुम्हारा स्वांस तुमसे नहीं कह रहा है कि "मैं तुमसे परेशान हूं।" तुम्हारी जिंदगी तुमसे नहीं कह रही है कि मैं तुमसे परेशान हूं, तुम हो मेरी परेशानी का कारण।

सबकुछ होते हुए, जो सुंदर-सुंदर चीजें हैं अपनी जिंदगी के अंदर इनको तो गिनते नहीं हो। इनके ऊपर कभी ध्यान जाता नहीं है। परिवार में भी मां हैं, बाप हैं, यह तो खुशी की बात है कि तुम्हारे मां हैं, बाप हैं उस पर तो ध्यान जाता नहीं है। यह जाता है कि वह क्या कह रहे हैं। अरे! कह रहें हैं तो कह रहे हैं, एक कान से सुनो और दूसरे कान से निकाल दो। सारी जिंदगी भर तुम यह करते हो। तो अपने परिवार के साथ भी यह कर सकते हो। एक कान से सुना — जो बुरा तुमको लगता है एक कान से सुना दूसरे कान से बुरा निकाल दिया। भाई हैं, बहन हैं यह नहीं कि हम खुश हैं कि भाई हैं, बहन हैं। वह यह करते हैं, वह यह करते हैं, वह यह करते हैं, वह यह करते हैं। अगर यही सब करते रहे आप अपनी जिंदगी में, नुक्स देखते रहे — भगवान कहते हैं गीता में अर्जुन से कि "मैं तेरे को ज्ञान देता हूं, मैं तेरे को वह दिव्य नेत्र देता हूं जिससे कि तू वह, मेरे असली रूप को देख पाएगा और समझाते हुए उसको कहते हैं कि मैं तेरे को यह ज्ञान जो दे रहा हूं वह इसलिए दे रहा हूं कि तू औरों के अवगुणों को नहीं देखता। इसलिए दे रहा हूं कि तू औरों के अवगुणों को नहीं देखता।" तो हमको भी तो ध्यान करना चाहिए। क्या हम सिर्फ लोगों के अवगुणों को देखते हैं या उनकी अच्छाईयों को भी देखते हैं ? अच्छाई को अगर देखोगे या देखने की कोशिश करोगे तो तुमको अच्छाई मिलेगी।

अब कोई आदमी घर में बैठा हुआ है वह मक्खी गिनना चाहता है तो मक्खी गिनने के लिए अगर वह निकलेगा या अपने घर में ही बैठा रहे तो मक्खी उसको नजर आयेंगी। क्योंकि ध्यान ही उसका मक्खियों पर है। अब पहले किसी और चीज पर ध्यान है तो मक्खी आई भी तो उस पर ध्यान नहीं गया। परंतु जब ध्यान ही मक्खियों पर है, ध्यान ही मुसीबतों पर है, ध्यान ही परेशानियों में है तो परेशानी, परेशानी नजर आएंगी। फिर जब तुम परेशानियों को देखने लगोगे, जब परेशानियां तुम्हारी नजर में आएंगी तो तुम और परेशान होगे। जब और परेशान होगे तो फिर ध्यान तुम्हारा और परेशानियों पर जाएगा। ध्यान और परेशानियों में जाएगा तो फिर तुम और परेशानियों को देखोगे।

यह ऐसे ही जैसे कुत्ता अपनी पूंछ के पीछे भागता है, भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है क्योंकि पूंछ को पकड़ तो सकता नहीं है। देख जरूर सकता है और कुछ पीछे उसके है, जो हिल रही है चीज उसको वह पकड़ना चाहता है और पकड़ तो सकता नहीं है तो फिर भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है, भागता रहता है। यही हाल हो जाता है। जब मैं छोटा था तो श्री महाराज जी के पास, हमारे पिताजी के पास एक छोटा-सा कुत्ता था, उसका नाम था ‘टॉमी।’ इतना चिढ़ा हुआ था वह सबसे, मतलब सबको काटता था वह और भौंकता था। अगर उसको एकदम पागल बनाना होता था तो उसके सामने एक आईना रख दो। बस! वह दूसरे कुत्ते को देखता था, (थी तो उसी की अपनी परछाई) वह दूसरे कुत्ते को देखता था तो वाऊं, वाऊं , वाऊं, वाऊं करके उसके पीछे भागता था। और इतना मतलब, घंटो-घंटो वह भौंकता रहता था अपनी ही परछाई पर और अपनी ही परछाई को काटना चाहता था। मनुष्य के साथ — वह तो कुत्ता था, वह तो कुत्ता था, उसको तो हम मान सकते हैं उसके पास इतना बड़ा दिमाग नहीं था जितना हमारे पास है और भाषा भी पता नहीं उसकी कोई कुत्ते वाली भौं, भौं, भौं, भौं — क्या-क्या कह रहे हैं कुत्ते पता नहीं।

भाई! तुम तो मनुष्य हो। तुम्हारे पास तो भगवान ने यह दिमाग दिया है, यह हृदय दिया है तुमको इस काबिल बनाया है कि तुम बोल सको, तुम सोच सको, तुम्हारे पास भाषा है परंतु हम करते क्या हैं ? फिर वही, आचरण वही हैं, जो हम करते हैं इस संसार के अंदर। अपने आप से ही लोगों को डर है। कई लोग हैं जो इस लॉकडाउन में हैं , घर में अकेले हैं उनको डर लगता है। डर क्यों लग रहा है भाई ? यह वही तो घर है, जहां तुम रहना चाहते हो, यह वही तो घर है। तुमने ही तो इसका प्रबंध किया हुआ है। पर अपने आप से ही डर लगता है।

जेलों में जब कैदी लोग कुछ खराब करते हैं तो उनको एक सजा दी जाती है उसे कहते हैं ‘सॉलिटेरी कन्फाइनमेंट’ (Solitary confinement) और सॉलिटेरी कन्फाइनमेंट का मतलब है उसको अकेले-अकेले कोई कमरे में बंद कर देंगे। वह सबसे बुरी सजा मानी जाती है। क्यों ? क्योंकि मनुष्य अपने आप, अपने आपको नहीं समझता है, वह अपने को ही भौंक रहा है, अपनी परछाई को देखकर ही भौंक रहा है। समझ नहीं आ रहा है उसके कि वह क्या है, क्यों यहां है ?

भगवान सबकुछ चला रहा है या वह चला रहा है ? सारी प्रकृति को चलाने वाला एक ही है। परंतु तुम अपनी जिंदगी में क्या करो। स्वांस का आना-जाना उसकी वजह से है, तुम्हारी वजह से नहीं है, उसकी वजह से है। पर इन हाथों से तुम क्या करो यह तुम्हारे पर निर्भर है। इस मुंह से तुम क्या बोलो यह तुम्हारे पर निर्भर है। तुम कड़वा भी बोल सकते हो, मीठा भी बोल सकते हो, दोनों चीजें हैं। जुबान में कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा। कड़वा बोलोगे तो यह नहीं है कि जुबान को कड़वा लगेगा। ना! वह तो मुँह से आवाज़ आएगी और कड़वा है। और मीठा है, मीठा बोलना चाहते हो, अंदर से बोलो। वह बोलो जो सच है। क्या सच है ? जिससे तुम प्यार करते हो उनको कहो कि तुम प्यार करते हो। मां-बाप आजकल बच्चों से प्यार जरूर करते हैं, परंतु वह कभी कहते नहीं हैं कि हम प्यार करते हैं। बस यही बात है "तैनें यह कर दिया, तैनें यह कर दिया!"

कितने ही मां-बाप होंगे जो पहला शब्द अपने बच्चे को सवेरे-सवेरे गुड मॉर्निंग नहीं बोलते हैं, राम-राम नहीं बोलते हैं, नमस्कार नहीं बोलते हैं, कैसे हो नहीं बोलते हैं, तुमसे प्यार है यह नहीं बोलते हैं। सबसे पहला शब्द क्या है "तुम लेट हो, लेट हो, लेट" — जब उसको यह मंत्र सीखा ही दिया कि "तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो, तुम लेट हो" तो वह सारी जिंदगी भर लेट रहेगा। वह सारी जिंदगी भर लेट रहेगा। तुम चले भी जाओगे, तुम माँ-बाप हो , तुम चले भी जाओगे पर तुम्हारा बच्चा बड़ा होकर के लेट रहेगा। हर एक चीज में लेट। क्यों ? क्योंकि तुमने उसको अच्छी तरीके से समझा दिया है, हर रोज उसको समझा दिया है कि "तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है, तू लेट है।" तैनें यह नहीं किया, तैनें वह नहीं किया, तैनें ऐसा नहीं किया, तैनें वैसा नहीं किया।" यह सब क्यों करते हैं ताकि दुनिया तुम्हारी तरफ देखे और कहे कि जो तुम कर रहे हो, वह ठीक कर रहे हो।

देखो! तुम अगर सवेरे-सवेरे उठ करके अपना स्कूटर या मोटरसाइकिल लो और स्पीड लिमिट से चलाओ और हेलमेट पहनो और सबकुछ ठीक करो और जहां स्टॉपलाइट हो जहां लाल बत्ती हो वहां रुको और जहां हरी बत्ती हो वहां जाओ और हर एक चीज तुम बढ़िया तरीके से करो, बिल्कुल ठीक-ठाक करो जैसे कानून है वैसे ही अपनी मोटरसाइकिल चलाओ। तुम समझते हो कि तुम्हारी पीठ पर कोई हाथ ठोकेगा। नहीं, नहीं! गलत चलाओ तो तुरंत तुम्हारा चालान करने के लिए पहुंच जाएंगे। भाई! यही तो बात है इस संसार के अंदर। जब सब काम तुम ठीक करने की कोशिश करते हो कोई कुछ तुमको नहीं बोलेगा। गड़बड़ करोगे तब बोलेगा। तो सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि तुम अपनी जिंदगी में क्या चाहते हो ? तुम्हारी जिंदगी है। स्वांस का आना-जाना यह तुम पर निर्भर नहीं है। कब तुम पैदा हुए यह तुम पर निर्भर नहीं था। कब तुम जाओगे यह तुम पर निर्भर नहीं है, परंतु यह तुम पर निर्भर है क्या तुम इस, जो तुमको जीवन मिला है इसमें क्या करो! इसीलिए संत-महात्माओं ने पहले से ही कहा है कि —

बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद्ग्रन्थन गावा।

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा, पाइ न जेंही परलोक संवारा।

समझाया है तुमको कि यह साधना का धाम है और मोक्ष का दरवाजा है। कैसी मोक्ष ? सारे झंझटों से परे — हटना और उठना और वह है असली मोक्ष। जीते जी जो मोक्ष मिले इन सारी चीजों से। जैसे यह एक उदाहरण है जो बहुत-बहुत बार दिया जाता है — जैसे कमल का फूल गंदे पानी में भी रहकर गंदे पानी से ऊपर रहता है वह स्वयं गंदा नहीं होता है, चाहे गंदे पानी में जरूर वह है, परंतु अगर कमल का फूल, उसको देखो तो वह तो इतना सुंदर है कि ऐसा नहीं लगता कि इस पानी में उसका जन्म हुआ है। पर हुआ है, हुआ है परन्तु फिर भी उससे ऊपर रहता है।

जो कुछ भी समस्याएं हैं, आएंगी समस्या तो आएंगी, परंतु अगर आपके पास ज्ञान रूपी छाता है तो आपको भीगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बारिश को आप नहीं रोक सकते। लोग यही सबसे बड़ी गलती करते हैं वह बारिश को रोकना चाहते हैं। हमारे पास आते हैं हमसे कहते हैं कि "जी! हम बारिश को कैसे रोक सकते हैं ?" बारिश को तुम नहीं रोक सकते सिर्फ क्या कर सकते हो तुम — अगर तुम्हारे पास छाता है तो उसको खोलो और तुम भीगने से बच सकते हो! बस! भीगने से बच सकते हो!

थोड़ा-सा ध्यान दो, अपनी तरफ ध्यान दो, अपने जीवन की तरफ ध्यान दो, ध्यान दो तुम क्या कर रहे हो, ध्यान दो किस तरीके से तुम — जिनसे तुम प्यार करते हो उनको किस तरीके से ट्रीट करते हो, उनको किस तरीके से, उनके साथ कैसा सलूक करते हो। प्यार का सलूक करो! समय लगेगा। लोग चाहते हैं कि अगर मैं कुछ आज मीठा बोल दूँ तो सभी मेरे लिए मीठा बोलें। नहीं! तुम अगर कुछ मीठा बोल दोगे तो लोग सोचेंगे "क्या हो गया इसको, आज अच्छी बात कर रहा है यह!" उनको भी समय लगेगा यह जानने में कि तुमने अपने जीवन में कोई परिवर्तन किया है। हर एक चीज में समय लगता है।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, जब ॠतु तब फल होय।

धीरज तो रखना ही चाहिए। और जो कर सकते हो, अच्छा करो उसकी मिठास तुम्हारे जीवन के अंदर जरूर आएगी।

सभी श्रोताओं को मेरा नमस्कार! फिर आगे मिलेंगे!

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