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"अपने जीवन में, इस समय में, सबसे बढ़िया मौका है कुछ समझने का, कुछ सीखने का। क्या सीखना है आपको ?" —प्रेम रावत (7 अप्रैल, 2020) 


यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (www.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रेम रावत जी:

मेरे सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

मैं एक चीज आपको सुनाता हूं —

हृदया भीतर आरसी, मुख देखा नही जाय।

मुख तो तबहि देखहि, जब दिल की दुविधा जाय॥

कबीरदास जी कहते हैं कि हम सभी प्राणियों के हृदय में एक आईना है और वह आईना, उसमें हम अपना फेस देख सकते हैं, अपना चेहरा देख सकते हैं, अपने आपको देख सकते हैं इसका मतलब यही है। परंतु उस पर धुंध लगी हुई है, मैल लगा हुआ है और जबतक दिल साफ नहीं होगा तबतक वह आईना ठीक ढंग से आपका जो — आपकी जो छवि है उसको दिखा नहीं पाएगा। तो यह मैला कैसे हो जाता है, क्यों हो जाता है ?

लोगों का यह भी प्रश्न है। देखिये! कोई भी चीज है अगर उसको छोड़ दिया जाए, उस पर कोई अमल नहीं किया जाए, उस पर कोई कोशिश नहीं की जाए, उसको साफ नहीं रखा जाए, तो धीरे-धीरे-धीरे वह मैला होने लगेगा। मनुष्य के साथ भी यही बात है। जो असली चीज है वह क्यों है यहां, वह क्या कर सकता है, क्या पाने की उसकी इच्छा है। अगर वह इन सब चीजों को भूलने लगे कि वह यहां क्यों आया है ? वह जो परमानंद का आनंद है उसको लेने के लिए यहां आया है — अगर वह ये सारी चीजें भूलने लगे तो धीरे-धीरे करके और कोई चीज आ जाती है। और वह क्या आती है — वही धुंध, वही मैल लगने लगता है!

कई बार मैं सुनाता हूँ कि जब हम कपड़े साफ करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि हम सफाई कहीं से लाते हैं, सफाई कहीं से नहीं लाते सफाई तो उस कपड़े में है पर वह सफाई दिखाई नहीं दे रही है और इसलिए नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि उस पर मैल लगा हुआ है। अगर आप उस कपड़े को साफ करना चाहते हैं तो सफाई लाने की जरूरत नहीं है। मैल को निकालने की जरूरत है मैल को अगर आप निकाल देंगे तो कपड़ा अपने आप साफ हो जाएगा।

ठीक इसी प्रकार मनुष्य के अंदर भी जो मैल है, वह मैल जो दुविधा होती है; जो प्रश्न उठते हैं; जो शंकाएं होती हैं; यह वह मैल है। जब वह जान नहीं पाता है, पहचान नहीं पाता है कि मैं क्या हूं और मेरे अंदर क्या है तो उसको वह दिखाई नहीं देता है साफ तरीके से कि असली चीज क्या है! अगर वह असली चीज को जानना चाहता है, अपनी असलियत को समझना चाहता है, तो यह जो भ्रम का मैल है इसको निकालने की जरूरत है। परन्तु दुनिया भर के लोग सफाई को ढूंढ रहे हैं जो, उनको जब मालूम पड़ता है कि यह मन का मैल है इसको निकालने की जरूरत है तो वह सफाई को ढूंढने लगते हैं कि हम सफाई को — सफाई हमारे पास आ जाए तो फिर यह अपने आप चला जाएगा। नहीं! यह मैल को निकालने की जरूरत है और जब मैल को निकालेंगे तो सफाई अपने आप है।

तो भ्रम जो होता है मनुष्य को, वह क्यों होता है ? क्योंकि जो चीज वह जानता है, जो चीज स्पष्ट है उसके लिए वह अस्पष्ट हो जाती है जब भ्रम आता है। जब मनुष्य भ्रमित होता है कि मैं क्यों हूं यहां ? काहे के लिए हूं ? क्योंकि जब दुःख उसके ऊपर पड़ते हैं तब वह सोचता है कि यह क्या हो रहा है, मैं इससे कैसे निकलूं ? मैं इससे कैसे स्वतंत्र होऊं ? क्या होगा मेरे साथ ? जब मनुष्य को आज की कदर कम हो जाती है और कल की कदर ज्यादा हो जाती है तो अपने आप मनुष्य भ्रमित होता है क्योंकि आज में तो वह सही है। आज में तो जो हो रहा है वह उसके साथ हो रहा है पर वह जब कहने लगता है अपने से कि कल क्या होगा; जब वह कहने लगता है अपने से कि कल क्या होगा तब उसका दिमाग जो है चक्कर खाने लगता है। कल क्या होगा ? यह भी हो सकता है, यह भी हो सकता है, यह भी हो सकता है —

सो परत्र दुख पावहि सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।

देखिये बड़ी साधारण सी बात है। इस परिस्थिति में भी आप देख लीजिये — जो कोरोना वायरस की परिस्थिति है इसमें भी आप देख लीजिये।

क्योंकि गवर्नमेंट कुछ कहे न कहे बात आपकी सुरक्षा की है। आप — बात किसी और चीज की नहीं है, बात पॉलिटिक्स की नहीं है; राजनीति की नहीं है किसी और चीज की नहीं है सबसे बड़ी बात है कि आप सुरक्षित रहें। आप बीमार न हों। छोटी-सी बात है इसका जो रिजल्ट है, इसका जो निष्कर्ष वह तो बहुत बड़ी चीज है। आपको जीवन मिलेगा, आप जी सकते हैं। यह तो, परन्तु इसको करना क्या है ? बड़ी छोटी-सी बात है — परहेज करना है!

किसी और से ना मिलें — यह सोचें अपने मन में कि जो कोई भी है बाहर उसको यह बीमारी है और उससे आपको यह बीमारी लग सकती है। तो सब से दूर रहें। 6 फीट का (अभी बताया है सभी लोगों ने कि) 6 फीट की दूरी बनाकर रखें। अपने हाथ धोएं। यह तो समझ लीजिये कि किसी ने आपको बताया। अब जब इस पर अमल करने की बात है, जब अमल करने की इस पर बात आती है तो लोग कहते हैं — ठीक है! 1 दिन ठीक है; 2 दिन ठीक है; 3 दिन ठीक है; 4 दिन ठीक है; पर जैसे-जैसे यह समय बीतता जा रहा है मन और चंचल होता जा रहा है।

जैसे मैंने पहले कहा कि यह जो आवाज है, जो मन की आवाज है यह आपके कानों के बीच की आवाज़ है। आपके कानों के बीच के अंदर लगी हुई है और कान बंद करने से यह आवाज जाएगी नहीं। जो भी आप कर रहे हैं आपके अंदर यह आवाज है और आपको परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, परेशान कर रही है, आप परेशान होते जा रहे हैं। यह तो उल्टी बात हो गई, यह तो उल्टी बात हो गई। मैं एक बात कहता हूं कि जिस घड़े में, जिस मटके में छेद है नीचे उसमें कितना पानी आ सकता है ? उसमें तुम सारे समुद्र का पानी भी डाल दो तब भी वह मटका भरेगा नहीं जबतक उस मटके में वह छेद है, तो तुम सारे समुद्र का पानी उस मटके में डाल सकते हो तब भी वह मटका नहीं भरेगा।

ठीक इसी प्रकार, जिस मनुष्य के अंदर यह भ्रम है, जिसका मन एकाग्र नहीं है, जो अपने आपको नहीं जानता है उस मनुष्य को आप कोई भी चीज कह दीजिए भले से भले चीज कह दीजिए परंतु उस पर वह अमल नहीं कर पाएगा। मतलब, छोटी-सी बात है, छोटी-सी बात है — आशा देखिए!

दूसरी बात, अब लोग यह भी कह रहे हैं कि "यह क्यों हो गया, ऐसा हो गया कि किसी पर यह ब्लेम लगाना चाहिए, किसी को दोषी ठहराना चाहिए।" बाद में, बाद में अभी नहीं। अभी जो करना है वह यह करना है कि आप सुरक्षित रहें और इसका कोई इलाज — जब वैज्ञानिक लोग, डॉक्टर लोग जब इसका इलाज निकाल लेंगे और आप ठीक हो जायें और सब चीजें ठीक हो जायें और कोई आपको बाहर से आकर के यह बीमारी न दे तब और सारी बातें। पर और तब नहीं होगा, तब नहीं होगा! क्यों इसलिए नहीं होगा क्योंकि फिर लोग लग जायेंगे अपने काम में, लग जाएंगे सारी बातों में। और यह जो कुछ भी आपने सीखा है यह सब लोग भूल जायेंगे। मैं ज्योतिषी हूँ जो आपको यह कह रहा हूँ ? नहीं! किसी ने आकर मेरे कान में यह बात कही ? नहीं!

दो-तीन दिन पहले मैं देख रहा था कि अट्ठारह सौ कुछ में, साल 18 सौ कुछ में एक 'स्पेनिश फ्लू' हुआ था ठीक इसी तरीके का। और वह फ्लू भी सारे संसार भर में फैला और जो कुछ भी उस समय हुआ, वह इस समय भी हो रहा है और लोगों ने उस समय से कोई चीज नहीं सीखी, कोई चीज नहीं समझी। अब फिर वही चीज हो रही है। ऐसे ही लड़ाईयां होती हैं, ऐसे ही सबकुछ होता है।

आप अपने जीवन में इस समय में सबसे बढ़िया मौका है कुछ समझने का, कुछ सीखने का। क्या सीखना है आपको ?

एक, सबसे पहली बात यह मनुष्य शरीर जो आपको मिला है, यह समय जो आपके पास है यह बहुत ही दुर्लभ है। इसका कोई मोल नहीं है। इस बात को जानिये! अपने आपको जानिये! सचेत होकर के अपनी जिंदगी को बिताइये। और अपने हृदय के अंदर, पूरी तरीके से आभार प्रकट करने की कोशिश कीजिये कि आपका हृदय आभार से भरे।

आभार किस चीज के लिए ? जो सबकुछ सुंदर है, जो अच्छा है उसके लिए। उसके लिए आपको जानना पड़ेगा कि अच्छा क्या है, आपके लिए अच्छा क्या है ? मैं बताता हूं आपके लिए अच्छा क्या है। आप तो सोचते हैं आपके लिए अच्छा है कि "आपका धन बढ़े, आपका बिजनेस बढ़े, आपका परिवार बढ़े, आपका घर भरे, आपका यह हो, वह हो।" नहीं, मैं बताता हूँ आपके लिए अच्छा क्या है ? अच्छा है "इस स्वांस का आना-जाना।"

नर तन भव वारिधि कहुं बेरो।

सनमुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

यही भगवान कहते हैं कि इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है। यह है आपके लिए अच्छाई — "इस स्वांस का आना-जाना ही मेरी कृपा है।" इस कृपा को स्वीकार कीजिये। जबतक आप कृपा को स्वीकार नहीं करेंगे तब तक यह भ्रम जाएगा कैसे-कैसे यह पता लगेगा कि यह साफ हो गया है और आवाज कहां है कानों के बीच में है बाहर नहीं है, बाहर होती तो इयर-प्लग लगा करके या ऊँगली लगा करके या अंगूठा लगा करके उसको बंद कर लेते। परन्तु यह तो कानों के बीच में है। और कानों के बीच में होने की वजह से यह समझ में नहीं आता है कि कहां जाऊं, क्या करूं, सब अन्धेरा ही अँधेरा दिखाई देता है। सब अन्धेरा ही अँधेरा दिखाई देता है।

अब वो एक प्रश्न था जो किसी ने पूछा कि — "जब मैं अपने दोस्तों को देखता हूं उनके पास नई-नई लेटेस्ट गैजेट होते हैं तो मेरे को ईर्ष्या होती है कि उनके पास नहीं है मेरे पास — मेरे पास नहीं है उनके पास है।"

फिर सोच रहा था रात को — तुम्हारे पास एक ऐसा गैजेट है कि तुम उसकी कदर जान सकते हो। उसको तुम बाहर उभार सकते हो अपनी जिंदगी के अंदर। एक ऐसा गैजेट है कि वह हमेशा लैटेस्ट (latest) होता है, हमेशा लैटेस्ट होता है। और कैसा गैजेट है, क्या गैजेट है ? वही तुम्हारे स्वांस का गैजेट है, यह हमेशा नई आती है — पुरानी नहीं, नई आती है और तुम्हारे को जिंदगी लाती है। ऐसा गैजेट उनके पास नहीं है। तुमको ईर्ष्या की जरूरत नहीं है। तुम समझो कि तुम्हारे पास क्या चीज है और जबतक हम समझेंगे नहीं कि हमारे पास क्या चीज है, क्या संभावना है यह जिसको जीवन कहा जाता है यह संभावना है और संभावना क्या है और कैसी है जबतक हम इस बात को जानेंगे नहीं, समझेंगे नहीं, तबतक सबकुछ अधूरा ही रहेगा। जान नहीं पाएंगे, पहचान नहीं पाएंगे कि क्या है ? और जो दुनिया हमको कहेगी हम उसी को स्वीकार करते चले जाएंगे। यही तो चक्कर है।

सवेरे-सवेरे कितने ही लोग हैं जो अखबार पढ़ते हैं या टेलीविज़न चालू करते हैं या रेडियो चालू करते हैं। काहे के लिए, खबर सुनना चाहते हैं। क्या हो रहा है, क्या हो रहा है यह सुनना चाहते हैं। ठीक है सुनिए! पर क्या हो रहा है, हमसे पूछिए। हमसे पूछिए, दरअसल में क्या हो रहा है। हम देते हैं आपको खबर। क्या हो रहा है ? आपका स्वांस चल रहा है। इस सारे संसार को रचने वाले की आप पर कृपा हो रही है, यह हो रहा है। हॉट न्यूज़, हैडलाइन न्यूज़ क्या है कि "आप जीवित हैं!" यह होनी चाहिए हैडलाइन न्यूज़। यह है असली हैडलाइन न्यूज़ — आप जीवित हैं!

अगर आपके लिए यह हैडलाइन न्यूज़ नहीं है तो, आप तो गए। चाहे आपको कुछ भी ना हो! आप तो गए। क्यों गए ? क्योंकि खाली हाथ आप आये थे, खाली हाथ आपको जाना है। कुछ पल्ले नहीं लगेगा।

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल,

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भये कंगाल

यह भी कबीरदास जी ने कहा है।

दरअसल में गरीब भूखा कोई नहीं है। परन्तु जो गठरी है उसको खोलना भूल गए, क्योंकि जब खोली नहीं तो इसीलिए कंगाल हो रखे हैं। कंगाल होना यह मतलब नहीं है कि कंगाल, कंगाल है। अगर वह अपने आपको कंगाल महसूस करता है तो चाहे कितना से भी कितना धनी आदमी हो, वह कंगाल हो गया। वह महसूस क्या करता है ?

अगर हजारों लोग एक जगह बैठकर खाना खा रहे हैं पर तुम खाना नहीं खा रहे हो और तुमको भूख लगी हुई है तो यह थोड़ी है कि तुम हजारों लोगों के बीच में बैठे हुए हो वह खाना खा रहे हैं, तो तुम्हारी भूख भी खत्म हो जाएगी। ना! जबतक तुम खाना नहीं खाओगे तबतक तुम्हारी भूख कैसे खत्म होगी। तुम अगर नदी के पास चले जाओ नदी में साफ पानी है, नदी में स्वच्छ पानी है, नदी में मीठा पानी है तो क्या तुम्हारी प्यास खत्म हो जाएगी ? जब तक पानी नहीं पियोगे तब तक वह नदी में कितने हजारों-हजारों गैलन पानी बह रहा है, परन्तु तुम्हारी प्यास खत्म नहीं होगी, जबतक तुम उस पानी को पियोगे नहीं। तो बात हो गयी स्वीकार करने की, समझने की, अपनाने की और मैं दूसरी चीज की बात नहीं कर रहा हूं मैं कह रहा हूं कि आप अपने जीवन को अपनाइये। इसमें आपको राहत मिलेगी। इसमें आपको चैन मिलेगा। इसमें आपको सुख मिलेगा। इसी में है वह 'सच्चिदानंद' — सत् चित् और आनंद और जब तक खोजते रहोगे, खोजते रहो। क्या चाहते हो ?

सभी लोग चाहते हैं कि "जी, हम सफाई चाहते हैं, हमको सफाई दे दो, सफाई दे दो, सफाई दे दो, सफाई दे दो, अब मैं कैसे दे दूँ सफाई ? सफाई तो तुम्हारे अंदर है। हां, मैल धोने के लिए साबुन चाहिए —

गुरु धोबी सिस कापडा, साबुन सिरजनहार ।

सुरति सिला पर धोइये, निकसे मैल अपार

इस चीज की जरूरत है। यही कहा है कबीरदास जी ने कि — गुरु तो है धोबी वह धोता है और शिष्य क्या है — कपड़ा है। गुरु धोबी सिस कापडा, साबुन सिरजनहार

— साबुन जो है वह मैल को धोने का साधन है। सुरति सिला पर धोइये — जब उस सुरति को, इस ज्ञान के अंदर लगाएंगे और फिर धोयेंगे, रगड़ेंगे — यह जो स्वांस अंदर आ रहा है, जा रहा है — धोयेंगे — ढ़ंक, ढ़ंक, ढ़ंक, ढ़ंक! देखा होगा आपने, जब धोते हैं। जब वह सुरति चढ़ेगी, तब सारा मैल निकलकर अलग होगा।

तो यह बात समझने की है, सोचने की है और सबसे बड़ी बात घबराने की नहीं है। घबराने से कुछ नहीं होगा, डरने की नहीं है, डरने से कुछ नहीं होगा। अपनी ताकत, जो अंदरूनी अपनी ताकत है आपके पास, अब उसको इस्तेमाल करने की जरूरत है। अभी कितने दिन और लग सकते हैं इसमें। लोग पूछ रहे हैं यह कब खत्म होगा ? कब खत्म होगा ? जब खत्म होगा तब खत्म होगा। यह किसी के लाइसेंस को लेकर तो चलता नहीं है। यह जो वायरस है यह जीती-जागती चीज थोड़े ही है। यह तो जीता-जागता कीटाणु भी नहीं है परंतु यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक बड़े आसानी से पहुंचता है — जब कोई छींकें या थूकें। तो इसलिए कहते हैं मास्क पहनो। ताकि "एक तो तुमको न लगे और तुम किसी को नहीं लगने दो।"

तो यही बात है कि सबसे सुंदर बात, सबसे अच्छी बात यही है कि हम अपने जीवन में इस बात को समझें, डरे नहीं चाहे कुछ भी समस्या सामने आए। कोई भी समस्या बनकर सामने आए। चाहे यही चीज समस्या बन जाए कि "तुम एक जगह रहो, अपने घर पर रहो, बाहर मत जाओ!" कई लोगों के लिए तो यही समस्या बन गया है। जी नहीं सकते वो! परन्तु जो जानता है कि तुम्हारे अंदर वह है बैठा हुआ, उसके साथ कुछ समय बिता सकते हो तो बिताओ। इससे बढ़िया चीज क्या हो सकती है, इससे बढ़िया चीज कुछ नहीं हो सकती है। परंतु जिसको नहीं मालूम है, उसको नहीं मालूम है। जिसको मालूम है, उसको मालूम है और जिसको मालूम है, उसके लिए आनंद ही आनंद है। कहीं भी आनंद है, कहीं भी चले जाओ।

वही मैं सुनाता हूं लोगों को। एक आदमी था साउथ अफ्रीका में, तो वह मेरा सत्संग सुनता था। उसमें मैं कहता था कि "भाई! तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है।” आपलोगों ने भी सुना होगा कितनी बार मैंने लोगों से कहा है कि "तुम्हारे अंदर यह स्वांस आ रहा है, जा रहा है।”

तो एक दिन वह अपने कमरे में गया। अपने बंक (Bunk) पर लेटा हुआ था वह और उसने अपनी आंखें बंद की और वह अपने स्वांस पर ध्यान करने लगा। तो स्वांसपर ध्यान करने लगा। वह जेल में है और यह जेल में हो रहा है और स्वांस पर अपना ध्यान करने लगा और करते-करते-करते वह कहता है कि मेरे अंदर मैं शांति का अनुभव करने लगा और इतनी शांति, इतनी शांति जितना मैं और इसमें मेरा ध्यान गया — “सूरत शिला पर धोइये निकसे मैल अपार”

जैसे-जैसे वह मैल निकलने लगा इतनी शांति का अनुभव किया, इतनी शांति का अनुभव किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इतनी शांति मेरे अंदर मौजूद थी। यह कैसे संभव हुआ जेल में ? जेल में यह हो रहा है! जेल में — आप तो जेल में नहीं अपने घर में हैं। यह जेल में हो रहा है! और ऐसी-वैसी जेल नहीं थी वह, बहुत-बहुत स्ट्रिक्ट (strict) जेल है तो अपने जीवन को सफल बनाइए, आनंद लीजिए। जैसे भी आप ले सकते हैं आनंद लीजिए। सब्र रखिए! एक दिन यह खत्म होगा, होगा और जबतक हो तबतक आप सब्र रखिये और आनंद लीजिये।

सभी को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!