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"जो असली चीज है वह आपके अंदर है और अगर आप चाहें तो आपके अंदर स्थित उस खान को खोदिये। तब आपको वह चीज मिलेगी जो सचमुच में मनुष्य को रईस बनाती हैं, अमीर बनाती हैं।" (2 अप्रैल, 2020)
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प्रेम रावत जी:

मेरे सभी श्रोताओं को मेरा हार्दिक नमस्कार!

मुझे आशा है कि आप सब लोग आनंद में हैं और आनंद मंगल में हैं आप। क्योंकि यह जो भी परिस्थिति है कोरोना वायरस की इसका यह मतलब नहीं है कि आपको दुखी होना चाहिए। आप जहां भी हैं, जैसे भी हैं, जो असली खुशी है वह आपके अंदर है। उसका बाहर से क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है इससे कुछ लेना-देना नहीं है। जो असली चीज है वह आपके अंदर है और अगर आप चाहें तो उस खान को जो आपके अंदर है उसको खोदिये। अगर उस खान को आप खोदेंगे तो उसमें से आपको क्या मिलेगा ? वह चीज जो सचमुच में मनुष्य को रईस बनाती हैं, अमीर बनाती हैं।

एक लोग हैं इस दुनिया में, जो समझते हैं कि अगर उनको अमीर बनना है, तो उनको पैसे की जरूरत है और एक वह लोग हैं, जो अच्छी तरह से जानते हैं कि अमीर अगर बनना है तो हृदय उसके लिए होना चाहिए। उसके लिए ज्ञान होना चाहिए। उसके लिए हृदय के अंदर आनंद होना चाहिए। उसके अंदर जो स्थित दिव्य चीज मौजूद है, उसका उससे परिचय होना चाहिए। उसको वह जाने, उसको वह पहचाने तब जाकर के वह असली रईस, रईस बनेगा। यह जो पैसे का रईस है, यह पैसे को अपने साथ नहीं ले जा सकता। आप आनंद को अपने साथ ले जा सकते हैं पर पैसे को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तो अगर आनंद आपको चाहिए तो कैसा आनंद होना चाहिए आपके जीवन में — सच्चा आनंद या झूठा आनंद ? सच्चे आनंद के लिए आपको क्या करना पड़ेगा ? अपने आपको जानना पड़ेगा। अपने आप को पहचानना पड़ेगा।

कई बार मैं विचार करता हूं कि एक तरफ मनुष्य के लिए एक चीज मौजूद है, एक संभावना है और वह संभावना है कि वह खुशी से भरा हुआ है, आनंद से भरा हुआ है, उसके अंदर जो दिव्य है उसको वह जानता है, उसको वह पहचानता है और वह — जब भी उसको समय मिलता है तो वह एकदम व्यस्त है इस जीवन में जो ज्ञान की खान उसके अंदर है उसको खोदने में। आनंद ही आनंद लेने में वह व्यस्त है। और आनंद से उसका जीवन भरा हुआ है। उसको फिक्र नहीं है अगर उसको कोई है —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास

और जो चितवे नाम बिनु, सोई काल की फांस

उसका चिंतन — चिंता अगर वह करता है, तो वह सतनाम की चिंता करता है। सिर्फ! जब भी उसको समय मिलता है। मेहनत करता है ताकि उसका पेट भी भरे। लेकिन बिना पेट के तो वो वाली बात है कि —

बिन भोजन भजन न होय गोपाला।

ये लो अपनी कंठी माला।।

तो करता है वह मेहनत करता है। और उस मेहनत में कभी वह सफल भी होता है कभी वह जो कुछ भी करता है उसकी उसको सफलता नहीं मिलती है। परन्तु उसका उद्देश्य "सफल होना इस दुनिया में न सफल होना" यह उसका उद्देश्य नहीं है। उसका उद्देश्य है कि उसके अंदर जो खान है — आप मेरी बात सुन लीजिए आप क्योंकि ऐसा कई बार लगता है कि लोग वहां बैठे-बैठे कह रहे हैं कि " फिर हम खायेंगे कैसे, ये कैसे करेंगे !"

सुन लीजिये मेरी बात कि मैं यह कह रहा हूँ कि — नहीं! खाने की जरूरत है। ठीक है! घर होना चाहिए, कपड़ा होना चाहिए ये सारी चीजें होनी चाहिए इसके लिए कुछ ना कुछ मेहनत करनी पड़ती है। परन्तु जो भी उसको समय उस चीज में लगाना है, वह लगाता है पर जो भी उसको समय मिलता है वह उस — अंदर की जो खान है उसमें से वह खोद, खोदकर के और एक ऐसी चीज निकाल रहा है जो सोने से भी ज्यादा है, जो हीरों से भी ज्यादा है। वह आनंद की खान को खोद रहा है। तो एक तो यह संभावना है उसकी, मनुष्य की।

एक दूसरी संभावना है और दूसरी संभावना क्या है ? दूसरी संभावना है कि वह परेशान है — सुबह भी परेशान है, शाम को भी परेशान है, दोपहर में भी परेशान है; हर घंटे परेशान है। वह इतना परेशान है, इतना परेशान है और इस दुनिया में कुछ बनने की कोशिश कर रहा है और कुछ हो नहीं रहा है उसके साथ। फिर भी उसको अच्छी तरीके से मालूम है कि सारी परेशानी उसके जीवन के अंदर है और फिर भी उसको मालूम है कि खाना तो कहीं से खाना है। तो परेशान होने के बावजूद भी वह खाना खाता है। कहीं से कुछ प्रबंध करता है। मकान का प्रबंध है, किराए का प्रबंध है; यह सारी चीजों का प्रबंध है। परन्तु वह हमेशा परेशान रहता है दुखी रहता है, दुखी, दुखी।

दो संभावना है। एक में, एक संभावना है उसके लिए उसमें वह जानता है कि और हमेशा पहचानने की कोशिश करता है कि उसके अंदर जो स्वांस आ रहा है उसकी — वह कितना अमूल्य है। और दूसरी तरफ स्वांस आ रहा है, जा रहा है उसको कोई मतलब नहीं है। उसको यह भी मतलब नहीं है कि उसके अंदर जिस चीज को वह सचमुच में खोज रहा है, क्या है वह चीज और वह उसके अंदर विराजमान है। उसको इससे भी मतलब नहीं है। होगा क्या — दोनों लोगों में होगा क्या ? एक दिन इस व्यक्ति को भी जाना है और एक दिन इस व्यक्ति को भी जाना है। जब यह व्यक्ति जाएगा तो कहा है कि —

जब तुम आये जगत में जग हंसा तुम रोय

अब कुछ ऐसा कीजिये तुम हंसो जग रोय

तो यह, जब यह जाएगा तो यह अपने साथ यह कहकर जाएगा कि "तेरा बहुत-बहुत धन्यवाद तैनें यह मौका दिया; यह जीवन दिया — हर एक स्वांस का धन्यवाद अदा करेगा!" जब यह जायेगा, दूसरा वाला तो इसके लिए तो यह होगा कि "अच्छा हुआ छुट्टी मिली यह भी कोई जिंदगी होती है!"

अब आप देखिये इन दो व्यक्तियों में से आपको कौन सा पसंद है ?

एक तो वह जिसने सबकुछ भर लिया — भरा हुआ है, हृदय भरा हुआ है। आनंद है और एक वह जो खाली है। एक वह है, जो इस संसार में आया तो था खाली हाथ पर खाली हाथ जा नहीं रहा है उसके हाथ में क्या है? उसके हाथ में आनंद भरा हुआ है, उसके हाथ में ज्ञान भरा हुआ है; उसके हाथ में उसके जीवन की वाह-वाह भरी हुई है; उसके हाथ में क्या भरा हुआ है ? उसके हाथ में आभार भरा हुआ है।

जो दूसरा है, उसके हाथ खाली हैं, गया कुछ नहीं रह गया उसके पास। अब इन दो लोगों में से आप कौन सा होना चाहते हैं ? अगर आप वह व्यक्ति होना चाहते हैं, जो जब जाए तो आभार उसके हाथ में है; आनंद उसके हाथ में है इसके लिए, वह आदमी बनने के लिए, वह मनुष्य बनने के लिए आपको अब काम करना शुरू करना पड़ेगा। और अगर यह दूसरा वाला आपको पसंद है, जो खाली हाथ आया था खाली हाथ तो लगे रहो, लगे रहो इस दुनिया में। क्योंकि परेशान होते रहो। आभार कहाँ से आएगा ? परेशान होने से कौन हमारी बनता है ? कोई नहीं। लगे हुए हैं — “लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो, लगे रहो।“ कैसे लगे हुए हैं ? जैसे बैल! और बैल सोचता होगा, जब वह कुएं के चारों तरफ घूमता है। उसकी आँखें बंद कर देते है और घूम रहा है, घूम रहा है, घूम रहा है तो पता नहीं क्या सोचता होगा कि कहाँ से कहाँ पहुंच गया मैं । पर जब उसकी आंख की पट्टी खुलती है तो उसको मालूम पड़ता है कि मैं तो वहीं का वहीं हूँ। कुछ नहीं बदला।

तो अब यह समय आया है, लॉकडाउन का समय आया है। तो जो लोग वो हैं, जो परेशान होते रहते हैं वह अब भी परेशान हैं। वह अपनी सारी परेशानी से दूर हैं फिर भी परेशान हैं। और वो लोग जो अंदर जाना चाहते हैं, अपने अंदर उस दिव्य चीज का अनुभव करना चाहते हैं वह परेशान नहीं हैं, वह आनंद में हैं। तो, अब यह तो अपनी-अपनी बात होती है। क्योंकि कुछ लोग तो होंगे जो कहेंगे कि "नहीं हमको परेशानी पसंद है।"

परन्तु जहाँ तक मेरी बात है — मैं तो वह आदमी बनना चाहता हूं। मैं वह बनना चाहता हूं जिसके हाथ में हमेशा आभार है। आभारी हूं मैं कि मुझको यह मनुष्य शरीर मिला। आभारी हूं मैं कि यह स्वांस मेरे अंदर आया। आभारी हूं मैं कि मुझको यह मौका दिया गया। मैंने कोई बटन नहीं दबाया कहीं से। मैंने कुछ नहीं किया। मुझको यह मनुष्य शरीर मिला। जबतक है मैं आभारी रहना चाहता हूँ। मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ; मैं आनंद लेना चाहता हूं और ऐसा-वैसा आनंद नहीं उस दिव्य शक्ति का जो मेरे अंदर मौजूद है, मैं उसका आनंद लेना चाहता हूं, क्योंकि उसका आनंद अटूट आनंद है।

मैं कहीं भी हूं, कुछ भी कर रहा हूं मैं उस आनंद को पा सकता हूं। यह मेरे लिए एक संभावना है। अब इसमें से किस संभावना को मैं पसंद करता हूं, किस संभावना को लेता हूँ, यह तो मेरे ऊपर है। यह किसी और के ऊपर नहीं है। अब लोग कहते हैं — "वही होगा जो भगवान चाहता है!" भगवान ने तो अपने आप को तुम्हारे अंदर रख दिया और क्या करें कि अगर जानना चाहते हो तो जानो, पहचानना चाहते हो तो पहचानो। कितने नजदीक कि तुमसे कभी दूर हो ही नहीं सकते। यह है नजदीकी — अगर किसी को नजदीक होना है, तो नजदीक होना है तो ऐसे नजदीक होना चाहिए कि तुम दूर हो ही नहीं सकते — यह कर दिया है, यह बना दिया है। यह हो गया है। यह हो रहा है इस समय — तुम जो बैठे इस वीडियो को देख रहे हो, तब भी तुम्हारे अंदर यह स्वांस चल रही है। और वह दिव्य शक्ति तुम्हारे अंदर मौजूद है। जैसे कहा है कि —

ज्यों तिल माहीं तेल है ज्यों चकमक में आग,

तेरा सांई तुझमें जाग सके तो जाग

तेरा साईं तुझ में जाग सके तो जाग

है घट में पर दूर बतावें, दूर की बात निरासी,

कहै कबीर सुनो भई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।

मोहे सुन सुन आवे हाँसी।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी।

यह मीन तुम हो और कबीरदास जी को आ रही है हंसी तुम पर कि हो तुम प्यासे और पानी — सब जगह पानी ही पानी, पानी ही पानी, पानी ही पानी, पानी ही पानी।

तो अगर हम इस बात को समझ गए और इस बात पर अमल करने की हम कोशिश करें, थोड़ी सी भी कोशिश करें और कितना सुंदर यह समय है, कितना सुंदर यह समय है कि हम इस बात पर अमल करें, इस बात को समझें। इन दो संभावना से एक संभावना को हम चूज़ (choose) करें, एक संभावना को पसंद करें और उस संभावना के साथ आगे चलें।

दूसरी संभावना, परेशान वाली इसके लिए तो कुछ करने की जरूरत ही नहीं। मनुष्य अपने आप ऑटोमेटिकली परेशान होते रहता है — हर एक चीज पर परेशान होता रहता है। उसका तो हाल ही यह है। कभी इस चीज की परेशानी, कभी — पहले जब उसकी शादी नहीं होती है, तो उसको शादी की परेशानी लगती है "कब शादी हो।" जब शादी हो जाती है तो उसको यह परेशानी है कि "यह शादी कब टूटे।" फिर जब बच्चे हो जाते हैं, छोटे होते हैं जब बच्चे तो बड़ी खुशी होती है। जब बड़े होने लगते हैं तब “फिर क्या होगा इनका!”

तो सुख-दुःख इसमें सब लगे हुए हैं। इस संसार के सुख-दुख में सब लगे हुए हैं। पर एक असली सुख है और वह सुख है — तुम्हारे अंदर, तुम्हारे हृदय का। जबतक तुम उस सुख को नहीं समझोगे, उस सुख को नहीं जानोगे, उस सुख को नहीं पसंद नहीं करोगे, चूज़ (choose) नहीं करोगे तब तक तुम्हारे हाथ में आभार नहीं आएगा, तुम्हारे हृदय में आभार नहीं आएगा; तुम्हारी जिंदगी में आभार नहीं आएगा। और जैसे आए थे वैसे ही तुम एक दिन जाओगे। परन्तु संभावना यही है कि तुम अपने जीवन को पूरा करो।

तो सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार और अपना ख्याल रखो और आनंद लो!

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